संसदीय लोकतंत्र की यह मान्य परंपरा है कि नेता प्रतिपक्ष को भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जाता है, मगर चूंकि आरएसएस की संसदीय प्रणाली में आस्था नहीं है इसलिए वह इस परंपरा का पालन नहीं करता। संघ की आस्था अमेरिका जैसी राष्ट्रपति प्रणाली में है इसलिए वह नेता प्रतिपक्ष के स्थान पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर रहा है, जबकि लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज हैं तथा राज्यसभा में श्री अरुण जेटली हैं और आडवाणी जी के तुष्टीकरण के लिए भाजपा ने एक नया नेता पद संसदीय दल के नेता के नाम से भी सृजित कर रखा है। मगर संघ और संतों ने इन तीनों को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर कर रखा है।
श्रीमती स्वराज का नाम केवल शिव सेना ने आगे बढ़ाया था, मगर अन्य समर्थक न मिलने के कारण यह नाम आगे न बढ़ सका। आडवाणी जी तो वेटिंग के बाद ही रेस से बाहर हो गए और जेटली जी का कहीं नाम ही नहीं आता। संघ, विहिप और संत समाज का सारा फोकस नरेंद्र मोदी पर है। मीडिया का एक बड़ा भाग भी नरेंद्र मोदी में वह सारे गुण देख रहा है जो भारत के प्रधानमंत्री में हो सकते हैं। भारत के बडे औद्योगिक घरानों को भी मोदी का नाम खूब रास आ रहा है। बस कमी यह है क इन में से किसी का भी बस नहीं चल रहा अगर चलता तो ये सारे मिल कर मोदी को बिना चुनाव के ही प्रधानमंत्री बना देते।
नरेंद्र मोदी के समर्थन में जारी जब इस प्रचार अभियान पर गंभीरता से विचार करते हैं तो एक बात साफ नजर आती है कि आगामी लोकसभा चुनाव के लिए संघ को एक चमकदार साम्प्रदायिक चेहरे की आवश्यकता है, जिसे विकास पुरुष का मुखौटा पहना कर मतदाता के समने प्रस्तुत किया जा सके, क्योंकि भाजपा के लिए आडवाणी जी उमा भारती आदि ने जो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण राम मंदिर आंदोलन के दौरान किया था इन चेहरों की चमक अब फीकी पड़ गई है। इसलिए अब संघ की नजर मेादी पर टिकी है तथा योजनाबद्ध ढंग से मोदी का प्रचार किया जा रहा है। सब जानते हैं कि संघी हाथी के खाने ओैर दिखाने के दांत अलग अलग होते हैं, इस लिए उनके साम्प्रदायिक चेहरे को विकास का मुखौटा लगा कर पेश किया जा रहा है तथा मोदी की साम्प्रदायिक छवि को बदलने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है। मगर अतीत की घटनाएं उनका पीछा नहीं छोड़ रही हैं।
नरेंद्र मोदी एक साम्प्रदायिक व्यक्ति हैं इस बारे में अनेक प्रमाण दिए जा सकते हैं। गुजरात में हुए 2002 के भयानक दंगों में उन्होने बकौल तत्कालीन प्रधानमंत्री के अनुसार राज धर्म का पालन नहीं किया। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने एक भी मुसलमान को प्रत्याशी नहीं बनाया। हद तो यह हो गई कि उन्होंने अल्पसंख्यक छात्र छात्राओं को मिलने वाली छात्रवृति भी यह कह कर नहीं दी कि इस से समाज में भेद भाव पैदा होता है। इस मामले में हाई कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए छात्रवृति जारी करने का आदेश हाल ही में दिया है। गत वर्ष अपने सद्भावना उपवास के दौरान भी वह अपनी साम्प्रदायिक सोच को सामने लाने से नहीं चूके इस दौरान मुसलमानों का एक प्रतिनिध मंडल उन से मिलने आया था। उन्हें सदभावना स्वरूप मुस्लिम टोपी पहनानी चाही थी मगर मोदी जी ने यह टोपी स्वीकार न कर अपने समर्थकों को संदेश दे दिया था कि उनकी सदभावना का मतलब मुसलमानों के प्रति उदार होना न समझा जाए। 2002 के संम्प्रदायिक दंगों के 11 साल बाद आज भी हजारों परिवार स्वयंसेवी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे राहत शिविरों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। मोदी की इन्हीं साम्प्रदायिक नीतियों के चलते अमेरिका उन्हें आज तक वीजा देने को तैयार नहीं है। चुनाव के समय अगर आपने गौर किया हो तो नरेद्र मोदी बड़ी चालाकी से साम्प्रदायिक कार्ड का इस्तेमाल भी करते हैं। 2005 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बार बार यह कहा कि उनकी हार से परवेज मुशर्रफ को प्रसन्नता होगी आखिर इस सब का मतलब क्या था? 2012 चुनावों में अगर आपने मेादी के आरंभिक भाषण गौर से सुने हों तो उन्होंने कई बार यह कहा था कि कांग्रेस अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाना चाहती है, जबकि कांग्रेस में अहमद पटेल का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए कहीं नही था, मगर मोदी ने एक सोची समझी रणनीति के अनुसार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए अहमद पटेल का नाम उछाल दिया जिसका उन्हें साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में लाभ तो मिलना ही था।
इस सारे अभियान के बीच नरेंद्र मोदी बड़े औद्योगिक घरानों के लाड़ले हो गए हैं। मुकेश अंबानी सरीखे उद्योगपति तो उन्हें महात्मा गांधी और सरदार पटेल के बराबर खड़ा करने में भी नहीं हिचकिचाते। उद्योगपतियों को सस्ती दर पर भूमि चाहिए, सस्ती बिजली चाहिए और करों में छूट चाहिए मोदी अगर ये सारे सुविधाएं दे रहे हैं तो ये उद्योगपति उन्हें गांधी और पटेल तो क्या भगवान के बराबर भी खड़ा करने में संकोच नहीं करेंगे। इन सब का प्रयास यह बताने का होता है कि मोदी ने ही गुजरात सही अर्थों में विकास किया है, जबकि वास्तविकता यह है कि गुजरात पिछले तीन सौ सालों से एक विकसित प्रदेश रहा है। दिल्ली के श्रीराम कालेज आफ कामर्स में मोदी बड़े गर्व से कहते हैं कि पूरा देश गुजरात का दूध पी रहा है, मगर इस की भी वास्तविकता यह है कि गुजरात में दुग्ध तथा अन्य क्षेत्रों में सहकारिता आंदोलन सफल रहा है और सहकारिता की सफलता में नरेंद्र मोदी का केाई येागदान नहीं रहा। मीडिया की खबरों और एक एनजीओ के सर्वेक्षण पर अगर गौर किया जाए तो पता चलता है कि पूरे देश को दूध पिलाने वाले मोदी के राज्य में 38 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है।
यूरोपीय यूनियन के सदस्य समय-समय पर भारत के उद्योगपतियों और नेताओं के साथ भोजन करते रहते हैं, मगर मादी के साथ इनके भेाजन करने जैसी सामान्य घटना का ऐसे प्रचार किया या मानो योरोपीय यूनियन ने मोदी को कोई विशेष लाइसेंस दे दिया हो । इस सामान्य मुलाकात को भी मोदी के विकास से जोड़ कर प्रचारित किया गया। संघ का पूरा प्रयास है कि 2014 के लाकसभा चुनाव में मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया जाए, मगर संघ के लिए यह सब इतना आसान नहीं दिख रहा। माना संघ भाजपा पर अध्यक्ष थोप देता है, मगर प्रधानमंत्री का सम्बंध केवल भाजपा से न हो कर पूरे देश से है। चूंकि भाजपा को सरकार में शामिल होना होगा इसलिए वह इस मामले में संघ की नहीं मानेगी। अगर संघ के दबाव में भाजपा ऐसा कदम उठाती है तो उसे कई वर्तमान और भविष्य के सहयोगियों से अलग होना पड़ेगा। सब से पहले जदयू भाजपा से किनारा कर लेगा, नवीन पटनायक भी भाजपा से दूरी बना कर रखेंगे और ममता बनर्जी जो आगामी गठबंधन में एनडीए में शामिल हो सकती है, मोदी के चलते वह भी भाजपा से दूरी बना कर रखेगी। भाजपा अब इतनी सक्षम भी नहीं है कि वह अपने बूते सरकार बना सके।
इस सब के अतिरिक्त भाजपा में भी प्रधानमंत्री पद के अनेक दावेदार हैं। आडवाणी जी भले ही इस बारे में मौन हैं मगर उन्होंने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी छोड़ दी है यह मानना भूल होगी। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी स्वयं इस दौड़ में शामिल हैं। राजनाथ सिंह को लगता है कि जैसे दोबार अध्यक्ष पद का छींका टूट कर उनकी गोद में आ गिरा है, ऐसे ही प्रधानमंत्री पद का छींका भी उनकी गोद में गिर सकता है। राजनाथ सिंह पहली बार अध्यक्ष तब बने जब आडवाणी जी से जिन्ना की तारीफ करने पर अध्यक्ष पद से त्यागपत्र ले लिया गया था और इस बार नितिन गडकरी अध्यक्ष बनने जा ही रहे थे कि चुनाव से एक दिन पहले आर्थिक घपलों के आरोपों के चलते उन्हें मजबूरन दौड़ से बाहर होना पड़ गया। राजनाथ सिंह के भाग्य से अध्यक्ष पद का छींका टूट कर उनकी झोली में आ गिरा। भले ही भाजपा के कुछ लोग राजनाथ सिंह की अपील पर गौर नहीं कर रहे हों, मगर राजनाथ सिंह बार बार अपील कर रहे हैं कि भाजपा नेता प्रधानमंत्री पद के लिए किसी की दावेदारी पेश न करें, मगर भाजपा की सिन्हा लाबी राजनाथ सिंह की बात नहीं मान रही है। इस लाबी को राजनाथ सिंह का अध्यक्ष बनना भी नहीं सुहा रहा है तो फिर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी भला कैसे स्वीकार होगी। मोदी को भाजपा प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश नहीं करेगी और भाजपा अपने में से भी किसी को दावेदार नहीं बनाएगी क्योंकि ऐसा होने पर भाजपा में सिर फुटौवल की नौबत आ जाएगा और जो आक्रोश अभी अंदरखाने पनप रहा है उसे सतह पर आने में देर नहीं लगेगी।
नरेंद्र मोदी तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने हैं। उनके तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने को प्रधानमंत्री बनने की पहली शर्त के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, मानो उन्होंने कोई बहुत बड़ा मोर्चा फतह कर लिया हो। मगर तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने को उपलब्धि मानने वाले यह भूल जाते हैं कि उड़ीसा में नवीन पटनायक तीन बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं। पटनायक मोदी से अधिक वोट ले कर चुनाव जीतते रहे हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी तीन बार मुख्यमंत्री बन कर सब के सामने हैं। पश्चिम बंगाल में वामपंथी तीस साल तक जीतते रहे मगर कभी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी नहीं की और जब ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने की पेशकश की गई तो माकपा ने इस पेशकश को ठुकरा दिया। और तो और लालू यादव भी तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने मगर कभी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी नहीं की। अगर किसी का तीन बार मुख्यमंत्री बनना प्रधानमंत्री बनने की शर्त हो सकती है तो मोदी से पहले कई और दावेदार भी हैं, मगर मोदी के बारे में किया जा रहा भयानक प्रचार इन सब बातों पर गौर करने को तैयार ही नहीं है।
अगर गंभीरता से विचार किया जाए तो मोदी नामक इन कथित विकास पुरूष की सब से बड़ी उपलब्धि यही है कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद राज्य में हुए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को मोदी ने ढीला नहीं होने दिया है। समय समय पर इसे और मजबूत करने के उपाय करते रहते हैं और उनके संघी प्रचारक इस साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पर पर्दा डालने के लिए विकास का ढोल इतनी तेज आवाज में बजा रहे हैं कि अन्य कोई आवाज सुनाई ही नहीं दे रही। अगर यह कहें कि नरेंद्र मोदी के साम्प्रदायिक चेहरे पर विकास का मुखौटा लगा कर देश और विदेश में उनकी छवि को चमकाने का प्रयास किया जा रहा है। मोदी का यह मुखौटा गुजरात में तो चल जाता है मगर पूरे देश में नहीं चल पाएगा।
लेखक महरउद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे जागरण, हिंदुस्तान समेत कई अखबारों में काम कर चुके हैं.






