पिछले दिनों न्यूज एजेंसी वार्ता ने एक रिलीज की. ''1100 प्रतिशत मुनाफा कमा रही हैं दवा कंपनियां'' शीर्षक से. यह खबर अगले दिन नवभारत टाइम्स, मुंबई में फर्स्ट पेज पर नन्द किशोर भारतीय की बाइलाइन से छपी है. यह तो वही बात हो गयी अंडा दे मुर्गी, आमलेट खाए फकीर. दूसरों की न्यूज़ पर कुछ किये धरे बैगर क्रेडिट लेने को क्या कहेंगे. एनबीटी में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. अक्सर ऐसा होता है. दूसरे अखबारों में छपी खबरों पर बाइलाइन रहती है. नीचे वार्ता की मूल खबर और उसके बाद एनबीटी में प्रकाशित खबर है… खुद देखिए और सोचिए…
1100 प्रतिशत मुनाफा कमा रही दवा कंपनिया
वार्ता, नई दिल्ली। भारत जैसे देश में जहां दूरदराज के क्षेत्रों में लोग दवाओं की कमी के चलते दम तोड़ रहे हैं। वहीं बड़ी-बड़ी दवा कंपनियां दवाओं को लागत से 1100 फीसदी अधिक कीमत पर बेचकर खुलेआम लूट खसोट मचा रही है। कारपोरेट मामलों के मंत्रालय के एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।
मंत्रालय की लागत लेखा शाखा ने अपने अध्ययन में पाया है कि ग्लेक्सोस्मिथलाइन की कालपोल फाईजर की कोरेक्स कफ सीरप, रैनबैक्सी ग्लोबल की रिवाइटल, डॉ. रेड्डी लैब्स की ओमेज, एलेमबिक की एजिथराल और अन्य कंपनियों की दवाओं को उनके लागत मूल्य से 1123 फीसदी अधिक कीमत पर बेचा जा रहा है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने दवा कंपनियों की इस लूट खसोट को रोकने के लिए रसायन एवं ऊवर्रक मंत्री एम के अलागिरी और स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी अजाद को पत्र लिखे हैं। उन्होंने इस अध्ययन की प्रतियां इन मंत्रियों को भी भेजी है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित. भड़ास से संपर्क के लिए [email protected] पर मेल करें.





