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एसएनबी भंग, अनिल राय कारपोरेट रिलेशन में भेजे गए, मनोज मनु के भी पर कतरे

सहारा समूह से खबर है कि एसएनबी को तात्‍कालिक तौर पर भंग कर दिया गया है. अब तक इसकी जिम्‍मेदारी अनिल राय के जिम्‍मे थी. बताया जा रहा है कि उपेंद्र राय के नजदीकी माने जाने वाले अनिल राय से यह जिम्‍मेदारी ले ली गई है. उन्‍हें एसएनबी से हटाकर कारपोरेट रिलेशन में भेज दिया गया है. हालांकि इस बारे में जब अनिल राय से बात की गई तो उन्‍होंने बताया कि न तो एसएनबी को भंग किया गया है और ना ही वे अपने पद से हटे हैं.

सहारा समूह से खबर है कि एसएनबी को तात्‍कालिक तौर पर भंग कर दिया गया है. अब तक इसकी जिम्‍मेदारी अनिल राय के जिम्‍मे थी. बताया जा रहा है कि उपेंद्र राय के नजदीकी माने जाने वाले अनिल राय से यह जिम्‍मेदारी ले ली गई है. उन्‍हें एसएनबी से हटाकर कारपोरेट रिलेशन में भेज दिया गया है. हालांकि इस बारे में जब अनिल राय से बात की गई तो उन्‍होंने बताया कि न तो एसएनबी को भंग किया गया है और ना ही वे अपने पद से हटे हैं.

एक अन्य सूचना के मुताबिक मनोज मनु से ग्रुप एंकर्स हेड का काम लेकर इसे संबंधित चैनलों के हेड को दे दिया गया है. अभी तक मनोज मनु ग्रुप के सभी चैनलों के एंकर्स की ड्यूटी लगाया करते थे और छुट्टी आदि के काम को देखते थे. पर यह काम उनसे लेकर संबंधित चैनलों के हेड को दे दिया गया है. मनोज मनु सहारा के मध्य प्रदेश और छ्त्तीसगढ़ चैनल के हेड हैं. इस फैसले को अच्छा फैसला माना जा रहा है.

उधर, खबर है कि राव वीरेंद्र सिंह से भले ही सहारा समय यूपी और उत्तारखंड का प्रभार लेकर स्वतंत्र मिश्रा को दे दिया गया हो लेकिन उनके पॉवर में कटौती नहीं हुई है बल्कि वृद्धि कर दी गई है. उन्हें सहारा मीडिया को हैंडल करने का फुल टाइम का काम दे दिया गया है. संदीप वाधवा के बिहाफ पर वह सहारा मीडिया के दिन-प्रतिदिन के कामों व नीतिगत निर्णयों को देख कर रहे हैं. इसके तहत राव वीरेंद्र सिंह चुन-चुन कर उपेंद्र राय के लोगों को निशाना बना रहे हैं. उपेंद्र राय ने भी अपने कार्यकाल में पूरे ग्रुप में राय लोगों को खूब तवज्जो दी थी.

उपेंद्र को जहां जहां भूमिहार दिखा, उसे तुरंत प्रमोट किया. पटना से लेकर दिल्ली तक का हाल यही है. इस एकपक्षीय कृत्य से सहारा मीडिया के आम कर्मियों में भी रोष था. वैसे सहारा का यह इतिहास रहा है कि जो भी सत्ता में आता है, अपनी लाबी को मजबूत करने के लिए ऐसे ऐसे कदम उठाता है कि कुछ ही समय बाद उसका असली चेहरा एक्सपोज हो जाता है और प्रबंधन को अंततः उसे फिर साइडलाइन करना पड़ता है. संभव है, कल को फिर कोई नई लाबी सत्ता में आए और संदीप वाधवा व राव बीरेंद्र के निर्णयों को पलटने का काम शुरू कर दे. फिलहाल तो चांदी का सिक्का बाधवा और राव बीरेंद्र का चल रहा है.

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