सेवा में, श्री यशवंत सिंह जी, सम्पादक महोदय, भड़ास डॉट कॉम, दिल्ली। विषयः एसएन विनोद ने किया साधना न्यूज के स्ट्रिंगरों के भरोसे का क़त्ल : महोदय, साधना न्यूज के ग्रुप एडिटर एसएन विनोद ने बड़े जोर-शोर ऐलान किया था कि वे साधना न्यूज में व्याप्त भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करेंगे। पत्रकारों पर हो रहे अत्याचार और शोषण के खिलाफ कार्रवाई करेंगे। उन्होंने इसके लिए अपने स्तर से जांच शुरू करने के लिए हम सभी से सुबूत भी मांगे थे।
हम उनके इस कदम से काफी खुश भी हुए थे। हमें भी लगा था कि मीडिया में अब भी ‘संपादक’ जैसी कोई हस्ती है। जो मालिकों और मैनेजमेंट के ज़ुल्मों के खिलाफ और फील्ड के पत्रकारों और स्ट्रिंगरों के हक में कुछ कर गुज़रने की हिम्मत रखता है।
इसीलिए जहां तक मेरी जानकारी है हम स्ट्रिंगरों ने, हमारे पास जो कुछ भी प्रमाण-सुबूत थे वे सब श्री एसएन विनोद को उनकी ईमेल पर भेजे भी थे। एसएन विनोद ने ऐलान किया था कि वे जांच के बाद जांच रिपोर्ट को सरेआम खुलासा भी करेंगे।
हम लोगों को उनके इस ऐलान से खुशी के साथ थोड़ा शक भी हुआ था। इसीलिए हमने एसएन विनोद साहब से दरख्वा़स्त भी थी जांच में हम लोगों को व्यक्तिगत रूप से बुलाया भी जाए और शामिल किया जाए। जहां तक मेरी जानकारी है एसएन विनोद साहब ने किसी भी पत्रकार को व्यक्तिगत नहीं बुलाया और न कोई जांच की। सिर्फ जांच का ढकोसला खड़ा किया।
हमें लगता है कि इसी ढकोसले की बिसात पर एसएन विनोद साहब ने साधना न्यूज के मालिकों के साथ सौदेबाज़ी कर ली। एसएन विनोद साहब ने इसके बाद चुपचाप इस्तीफा दे दिया और न्यूज एक्सप्रेस के मराठी चैनल के हेड बन गये हैं। इस तरह उन्होंने हम स्ट्रिंगरों के भरोसे का क़त्ल किया। एक शेर याद आ रहा है- क़त्ल हुआ हमारा कुछ इस तरह किश्तों में, कभी खंज़र बदल गए तो कभी क़ातिल बदल गए!
एसएन विनोद साहब ने जब हम स्ट्रिंगरों को मेल भेजा था उस वक्त हम लोगों को लगा था कि एसएन विनोद साहब वरिष्ठ पत्रकार ही नहीं बेईमान मीडिया मालिकों के बीच हम स्ट्रिंगरों के मसीहा हैं। हम लोगों को अहसास हुआ कि मालिकों और बेईमान संपादकों के खिलाफ शुरु हुए महाभारत में एसएन विनोद साहब हमारे ‘श्री कृष्ण’ और हम सब उनके अर्जुन हैं। एसएन विनोद साहब की हरकत पर दीपक भारत दीप की एक गज़ल शायद ठीक बैठती है-
उनकी अदाओं को देखकर
वफाओं का आसरा हमने किया.
उतरे नहीं उम्मीद पर वह खरे
फिर भी कसूर खुद अपने को हमने दिया.
दिल ही दिल में उस्ताद माना उनको
अपनी बेवफाई से उन्होंने
वफ़ा और यकीन को मोल हमें बता दिया.
अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए
कदम कदम पर जंग लड़ते लोग
किसी को भरोसा कैसे निभाएँगे.
मयस्सर नहीं जिनको चैन का एक भी पल
किसी दूसरे की बेचैनी क्या मिटायेंगे.
वादे कर मुकरने की आदत
हो गयी पूरे ज़माने की
नीयत हो गयी दूसरे के दर्द पर कमाने की
ऐसे में कौन लोग किसके खिलाफ
धोखे की कहाँ शिकायत लिखाएंगे.
यशवंत जी, हम लोगों को लगा था कि एसएन विनोद साहब भरोसे के आदमी हैं। हमारे हक के लिए लड़ाई शुरु कर रहे हैं। हमें अफसोस उनकी सौदेबाज़ी का भी नहीं है। वो चाहते तो साधना के मालिकों की कोई भी कमज़ोर नब्ज़ पकड़ कर सौदा कर लेते, लेकिन उन्होंन हम स्ट्रिंगरों के बीच एक उम्मीद जगाई थी। वह उम्मीद टूट गई है। यहां वीरेंद्र खरे अकेला की एक गज़ल और सुनाना चाहुंगा और कम से कम आपसे ये उम्मीद रखना चाहुंगा कि हमारे इस ख़त के मार्फत आप हमारी बात जरूर एसएन विनोद साहब के पास पहुंचा दें।
उम्मीद कुछ जगा के भरोसे के आदमी
लौटे नहीं हैं जा के भरोसे के आदमी
ग़ैरों के लूटने का कभी दुख नहीं हुआ
चूना गए लगा के भरोसे के आदमी
सबको ख़बर है क़त्ल किया जा रहा हूँ मैं
बैठे हैं मुँह छुपा के भरोसे के आदमी
फुरसत कहाँ कि घाव पे मरहम रखे कोई
निबटे हैं दुख जता के भरोसे के आदमी
बरबादियों को मेरी तमाशा बनाए हैं
ख़ुश हैं मुझे चिढ़ा के भरोसे के आदमी
नमस्कार, आदाब.
आबिद ख़ां
पूर्व स्ट्रिंगर
साधना न्यूज
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