आज थाना चौक का सिपाही मुझे फ़ोन करके कहा कि आपसे मिलना है… मैंने अपनी व्यस्तता बताते हुए कहा कि मैं वाराणसी कचहरी पर हूं, आप वहीं आ जाइए. जब सिपाही हमसे मिला तो उसने मुझे थाना चौक के प्रभारी वाईपी शुक्ला द्वारा जारी 160 सीआरपीसी की नोटिस थमाई. इसमें लिखा है-
''आपको सूचित किया जाता है विभिन्न टीवी न्यूज़ चैनलों पर प्रदर्शित एवं चित्रित समाचार 'वाराणसी के मर्निकर्णिका घाट पर लाशों पर सट्टेबाजी' के परिपेक्ष्य में आप दिनांक 12.06.2013 को सुबह 11 बजे दिन थाना चौक वाराणसी पर उपस्थित होकर प्रदर्शित समाचार उपरोक्त के सम्बन्ध में अपना साक्ष्य प्रस्तुत करें ताकि थाना चौक पर पंजीकृत अभियोग अपराध सख्या 84/13 धारा 420,467,468,177,295A,298 भादवि की विवेचना में अग्रेतर विधिक कार्यवाही की जा सके.''

मैंने भी बड़े प्यार से उस नोटिस को प्राप्त किया और साफ तौर से लिख दिया कि इस सम्बन्ध में मुझे कोई जानकारी नहीं है. अब देखना ये है कि पुलिस अपनी कार्यवाही क्या करती है. दरअसल मुझे नोटिस जारी करने के पीछे मात्र कप्तान साहब का नाराजगी है क्योकि मैंने कप्तान की तानाशाही का विरोध किया था. कप्तान साहब के निर्देश पर थाने के सिपाहियों और दरोगाओ ने काशी नाथ शुक्ला की गर्भवती पत्नी, मां और बहन के साथ बदसलूकी व मारपीट की थी जिसकी शिकायत मैंने काशी की पत्नी के कहने पर और पत्रकार होने के कारण राष्ट्रीय महिला आयोग में की. इसका परिणाम रहा कि पुलिस ने काशी के घर दिन रात दबिश देना बंद कर दिया.
उसके बाद से ही मुझे पुलिस की तरफ से तरह तरह की धमकियां मिलने लगीं. इसी दौरान लखनऊ की सोशल एक्टिविस्ट श्रीमती नूतन ठाकुर ने दिनांक 08.06.2013 को इस पूरे प्रकरण की शिकायत प्रेस काउंसिल से कर दी. फिर क्या. कप्तान साहब आखिर कैसे बर्दाश्त कर पाते कि उनकी शिकायत हुई है. थानों के सूत्रों ने मुझे जानकारी दी है कि– ''भैया आपकी गिरफ़्तारी के लिए कप्तान साहब का दबाव थाना प्रभारी पर बहुत है क्योंकि आपही सबसे ज्यादा विरोध कर रहे हैं. सहारा वाले 4 घंटे तक खबर चलायी थी उसी से कप्तान साहब नाराज हैं और उनकी नाराजगी तब और बढ़ गयी जब सहारा वाले निमेश राय ने साहब का सीधा संवाद जनता के बीच ला दिया. तभी से कप्तान साहब बेहद नाराज हैं और रोज थाना प्रभारी साहब से पूछते हैं कि इस मामले में क्या हुआ. इनकी-उनकी गिरफ़्तारी क्यों नहीं हुई.''
अब आप समझ सकते हैं कि बनारस के कप्तान कितने ईमानदार हैं. क्या चाहते हैं कि ऐसे कप्तान को वाराणसी का प्रतिनिधित्व करना चाहिए जिन्होंने पूरे प्रदेश में ईमानदारी का ढिंढोरा तो पीटा है लेकिन उनके काम में कहीं ईमानदारी नाम की चीज दिखती नहीं है. वैसे मैं अब कप्तान साहब के अगले आदेश का इंतजार करुंगा लेकिन बता देना चाहता हूं कि कप्तान साहब, आप मुझे चाहे जेल भिजवा दें, लेकिन औरों की तरह आपके आगे घुटने नहीं टेकुंगा क्योंकि उससे ज्यादा आप मेरा कुछ कर नहीं सकते हैं.
जय पत्रकारिता
जय परशुराम
रामसुंदर मिश्रा
पत्रकार
वाराणसी
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