Om Thanvi : प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच आज कँवल भारती के हक में प्रेस क्लब में एक मंच पर इकठ्ठा हो रहे हैं। आशा करनी चाहिए कि कँवल भारती को न्याय मिल पाएगा, उनके साथ और अन्याय नहीं होगा। लेखक संगठनों के इस इस मिलाप पर मैं निजी तौर पर भी थोड़ा खुश हो सकता हूँ। क्योंकि कई बार लिख चुका कि तीनों संगठन मार्क्स में आस्था रखते हैं, पर किसी मार्क्सवादी लेखक की मृत्यु पर शोकसभा तक मिलकर नहीं कर पाते।
कँवल भारती की गिरफ्तारी पर भी सिर्फ जसम की ओर से तुरंत बयान जारी हुआ था। आज का सम्मिलन भी, बताते हैं, जसम की पहल पर मुमकिन हुआ है। उम्मीद करनी चाहिए कि यह मिलाप आगे भी तीनों सगठनों को, कम से कम जीने-मरने के मामलों में, एक छत एक मंच देता रहेगा।
हालाँकि मैं अब भी समझ नहीं पाता हूँ कि एक मार्क्स के नाम पर इतने राजनीतिक दल आखिर बने क्यों? और विभिन्न मार्क्सवादी दलों की पटरी पर लेखक संघ (सीपीआइ=प्रलेस; सीपीएम=जलेस; सीपीआइ-एमएल=जसम) चल क्यों पड़े? जैसा कि Khurshid Anwar पूछते हैं: क्या एक प्रगतिशील लेखक के भीतर जनवाद नहीं होता? क्या कोई जनवादी लेखक प्रगतिशील विचार का नहीं होता? क्या ये दोनों जन संस्कृति के पक्षधर नहीं होते? अगर होते हैं तो उसी एक मार्क्स देव के नाम पर लेखकों के बीच अलग-अलग ठिकानेदारी पनपाई ही क्यों गई है?
वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.






