आदरणीय संपादक, भड़ास4मीडिया पोर्टल, यूं तो जब से इंटरनेट क्रांति आई है, हर कोई तीरंदाज हो गया है। किसी के भी बारे में कुछ भी कहीं भी छप रहा है। संयोग से आप भी इसका फायदा उठा रहे हैं। हाल के दिनों में आज समाज अंबाला की कई खबरें इन पोर्टलों पर दिखीं। खासकर दिसंबर-जनवरी-फरवरी महीनों में। खबरें इससे पहले भी छपती थीं, आज समाज के बारे में और संपादक रवीन ठुकराल व डीएनई आशुतोष के बारे में। डेढ़ साल मैंने भी उस संस्थान में काम किया है।
जब आशुतोष जी मेन-एडीशन इंचार्ज हुआ करते थे। उस समय एसोसिएट एडिटर राजशेखर मिश्रा दिल्ली से वहीं गए थे। पीछे बैठे ही बैठे उन्होंने कहा-यह लड़का संपादक बनेगा। मैंने पूछा आप क्या कह रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि मैं नहीं कह रहा हूं। लड़के की लगन और तेवर बताते हैं। उसके बाद आशुतोष सर को नहीं रुकना था और वो नहीं रुके। वो उस संस्थान में पहले शख्स रहे जिसने ताबड़तोड़ 14 एडिशन लांच कराए और हर एडिशन हिट कर दिया। जो उनके धुरविरोधी थे वे भी दूसरों के सामने तारीफ करने को मजबूर हुए। अजय शुक्ला जो तब चंडीगढ़ ब्यूरोचीफ हुआ करते थे और संपादक के सबसे करीब माने जाते थे, उनको अगर किसी ने टांग रखा था तो आशुतोष सर ही थे। उनकी खुद्दारी-ईमानदारी का आलम यह था कि छह-छह महीने बिना थके उस शख्स ने काम किया।
जब उन्हें डीएनई प्रमोट किया गया तो मैंने उन्हें फोन किया और शिकायत की कि आपने बताया नहीं। उन्होंने कहा इसमें कौन-सी उपलब्धि है। भगवान थोड़ी मिला है उलटा दुश्मन ही बढ़ेंगे। हुआ भी यही, जो उनके साथ कभी आए थे वे ही जलने लगे। समय बीतता गया। इसी भड़ास पर एक दिन खबर छपी कि लड़कियों को खाना बनाने घर बुलाता है डीएनई। मैंने उनसे पूछा कि सर आपके बारे में यह क्या छप रहा है। तो उन्होंने कहा कि यह मत पूछ क्या छप रहा है ये देख कि कौन छाप रहा है। मेरे बारे में कहानियां वे छाप रहे हैं जो न कभी मिले न मुझे जाना। फिर उन्होंने एक और हैरानी जनक बात बताई। आलोक पांडेय ने भड़ास पोर्टल पर छपी खबर का प्रिंट लेकर हर डेस्क पर रख दिया था। उन्होंने बताया कि कैसे दिल्ली में बैठे एक एसोसिएट एडिटर महोदय एक चीफ सब के जरिए ब्लैकमेलिंग करवा रहे हैं। वो चीफ सब यही आलोक पांडेय थे।
हिंदुस्तान वाले अशोक पांडेय की चमचागिरी के चलते एसोसिएट एडीटर राजशेखर मिश्रा ने ही आलोक पांडेय को भेजा था। वहां जाने के बाद पांडेय ने उन लोगों से हाथ मिला लिया जो आशुतोष सर की प्रमोशन से असंतुष्ट थे। फिर शुरू हुई उन्हें डैमेज करने की कोशिश। कोई दिल्ली से तो कोई अंबाला से लगा रहा। सुनने में तो ऐसा आया कि शिकायतें प्रबंधन तक की गईं। एक दिन ऐसा भी आया जब उन्होंने अपना इस्तीफा प्रबंधन को भेज दिया। बाद में पता चला कि प्रबंधन ने उनका इस्तीफा नहीं स्वीकार किया। आज फिर दोनों पोर्टलों पर फिर आशुतोष सर का जिक्र देखा तो रहा नहीं गया। कुछ सच्चाइयां ऐसी हैं जिनकी पड़ताल एक पत्रकार होने के नाते आपको भी करनी चाहिए थी मगर आपने नहीं किया। जाहिर है कि आप भी पेशे के प्रति ईमानदार नहीं हैं बल्कि ब्लैकमेल करने का खेल खेल रहे हैं।
सच तो यह है कि आशुतोष सर के कारण अखबार के लोग नहीं भाग रहे….हकीकत यह है कि अखबार का सारा दारोमदार पूर्व संपादक रवीन ठुकराल के कंधे पर था या फिर आशुतोष सर पर। ये वे लोग हैं जिन्होंने 18-18 घंटे काम करके अखबार को ब्रांड बनाया। दरअसल उस अखबार में कानपुरियों की भरमार हो गई थी। राजशेखर मिश्रा ने कानपुरिया ब्राह्मणों की पूरी फौज भेज रखी थी। कोई मिश्रा तो कोई दुबे, कोई द्विवेदी तो कोई त्रिवेदी चतुर्वेदी, शुक्ला, पांडेय। कुल मिलाकर उस अखबार को भाइयों की अखबार बना दिया था। जैसे ही यूपी में चुनावी अखबार लांच होने शुरू हुए सब कुकुरमुत्तों की तरह वहां से भाग लिए। आलोक पांडेय ने भी आज समाज से इस्तीफा नहीं दिया। जैसे ये हिंदुस्तान जमशेदपुर से भगाए गए थे वैसे ही इन्हें वहां से भी भगाया गया। डीएनई आशुतोष के खिलाफ ही नहीं इन्होंने षड्यंत्र रचे बल्कि उस अखबार में जितने भी कानपुरिया ब्राह्मण थे उनको भी उकसाया। इन्हीं सब कारणों से प्रबंधन नाराज था।
अच्छा यह हुआ कि जनाब पांडेय जी निकल भागे वरना सस्पेंड तो किया ही जाना था। चार माह पहले तक आज समाज की अंबाला यूनिट में अकेले कानपुर के 18-20 लोग थे। मजेदार बात तो यह है कि अब सारी कानपुरिया टीम बाहर हो चुकी है। जो दो-चार बचे खुचे हैं वे भी जल्द भागेंगे। कुछ लोगों को फोन करके आलोक पांडेय ने जनसंदेश में ज्वाइन कराने का न्यौता भी दिया है। जहां तक आलोक पांडेय के हरफनमौला होने की बात है तो ये तो आज समाज के उन एडिशनों को देखकर ही पता किया जा सकता है कि किस कदर अच्छे खासे चल रहे अखबार का कबाड़ा करके ये जनाब निकले हैं। जिस फन के ये मौला हैं वो है चाटुकारी और बकचोदी। यह अलग बात है कि इनकी बकचोदी वहां काम नहीं आई तो आप लोगों से करने लगे। कड़वा सच यह है कि कोई दो माह पूर्व जब रवीन ठुकराल ने कोई नया संस्थान ज्वाइन कर लिया तो कुछ लोगों की निगाहें अंबाला की कुर्सी पर जम गईं।
चूंकि वहां पर सीनियर एसोसिएट एडिटर संजय शुक्ल पहले से काबिज हैं और रवीन ठुकराल का करीबी होने के कारण उनसे पंगा लेना आसान नहीं था। काम प्रभावित करके दफ्तर में अराजकता पैदा करना और बाद में यह सिद्ध करने के लिए कि डैमेज कंट्रोल के लिए कोई दमदार संपादक बुलाया जाए इसके प्रयास किए जाने लगे। एक महोदय जो पाला बदलने में माहिर रहे और दिल्ली में बैठते हैं, वे सबसे ज्यादा सक्रिय थे। जब खुद से बात न बनी तो आलोक पांडेय को मोहरा बना कर चाल चलने लगे। नाम आलोक काम अंधेरा। इन्हों ने अखबार में तो प्रतिभा नहीं दिखाई, हां कानपुरिया लोगों का असली रंग अव्वल उजागर कर दिया। जहां तक आशुतोष सर की बात है तो उनकी बुलंद आवाज और आक्रामक तेवर के आगे न तो कोई टिकता है न ये पंडे-पुंडे टिकने वाले थे। अलबत्ता अपनी नीच हरकतों से पांडेय ने कानपुर के पत्रकारों का नाम रोशन कर दिया है। कानपुरिया पंडितों की जय हो।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.






