: नाम मुलायम है, गुंडई कायम है : मायावती के जाने और मुलायम के आने के मायने : कभी धूमिल ने लिखा था कि भाषा में भदेस हूं/ इतना कायर हूं कि/ उत्तर प्रदेश हूं। अब धूमिल नहीं हैं। होते तो आज क्या लिखते भला? गुंडा प्रदेश? या भ्रष्ट प्रदेश? अभी तो सूर्य कुमार पांडेय बता रहे हैं कि धूमिल होते तो क्या लिखते पता नहीं, पर हम तो कह रहे हैं कि, कभी मायावती हूं, कभी अखिलेश हूं/ अभी न सुधरुंगा, मैं उत्तर प्रदेश हूं! तो सवाल एक यह भी है कि जैसे अभी सड़कों और शहरों में बसपा वर्सेज सपा का उत्पात चल रहा है, गुंडई चल रही है, क्या सरकारी आफ़िसों में भी यह उत्पात विस्तार लेगा? क्यों कि है तो यह वास्तविकता कि दलित अफ़सरों ने अन्य लोगों के साथ अति तो खैर छोटा शब्द है, आग बहुत मूती है। उत्तर प्रदेश सचिवालय और शक्ति भवन जैसी जगहों पर तो जैसे सेनाएं आमने-सामने हों, दलित और सवर्ण अफ़सर ऐसे ही थे मायावती राज में।
सचमुच आने वाले दिन बहुत कठिन हैं उत्तर प्रदेश के लिए। क्यों कि मुलायम एंड कंपनी का यह हल्ला बोल फ़िलहाल बहुत आसानी से रुकने वाला है नहीं। बहरहाल मायावती के उत्तर प्रदेश की सत्ता से विदा होने और मुलायम के आने के मायने तलाशने में कोई बहुत मशक्कत करने की ज़रुरत नहीं है। मायावती और मुलायम दरअसल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ठीक वैसे ही जैसे तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि। मान लिया गया है कि अब उत्तर प्रदेश का भी तमिलनाडुकरण हो गया है। खैर बात यहां माया और मुलायम की हो रही है। मयावती की माया और मुलायम की माया में कुछ बहुत फ़र्क नहीं है। दोनों ही मायावी हैं। जातीय राजनीति में आकंठ धंसे, भ्रष्टाचार में सिर से पांव तक सने और तानाशाही का मुकुट पहने अहंकार के समुद्र में लेटे दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। उत्तर प्रदेश की जनता यह भली भांति जानती है कि एक नागनाथ है तो दूसरा सांपनाथ। पर चूंकि उस के पास विकल्प भी कुछ और नहीं है तो ऐसे में जनता करे भी तो क्या। रही बात भाजपा और कांग्रेस की तो वह दोनों भी कुछ दूसरी विशेषताओं के साथ ही सही नागनाथ और सांपनाथ की ही भूमिका में भारतीय राजनीति में उपस्थित हैं। सो हैरान-परेशान जनता करे तो आखिर क्या करे?
क्यों कि सच तो यह है कि इन में से किसी भी एक दल का लोकतंत्र या लोकतांत्रिक मूल्यों में यकीन एक पैसे का भी नहीं रहा। सभी प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों मे तब्दील हैं। बल्कि करपोरेट कल्चर में लथ-पथ। सब के सब जनता के दम पर जनता पर राज करने की फ़िराक में रहते हैं। सेवा-सुशासन आदि इन के लिए पुरातात्विक महत्व की बातें हो चली हैं। पर यह मसला अंतहीन बहस का है। सो इसे ज़रा मुल्तवी कर हम ज़रा ठहर कर मायावती के विदा गीत या कहें विदा बयान पर गौर करें तो बेहतर। मायावती ने साफ कहा है कि भाजपा के डर से ७० प्रतिशत मुस्लिम मतदाता समाजवादी पार्टी में शिफ़्ट हो गए। चलिए मान लिया मोहतरमा कि आप ठीक कह रही हैं। लेकिन मुस्लिम मतदाताओं को ऐसा करने के लिए पहली बीन बजाई किसने? याद है आप को?
बहुत पुरानी मान्यता है और हकीकत भी कि जब दिया बुझने को होता है तो बहुत ज़ोर से भभकता है। तो अपने राज के आखिरी दिनों में जब मायावती राज बुझने की राह पर चला तो भभकने लगा। मनुवादी मीडिया से इस की शुरुआत हुई। पांच करोड़ रुपए रोज के विज्ञापन के रुप में जो चैनलों पर माया सरकार के यशोगान में लस्त-पस्त थे। यह वही मायावती थीं जो कभी कहते अघाती नहीं थीं कि मीडिया मनुवादी है और कि फ़ुल बेशर्मी से कहती थीं उन का वोटर न अखबार पढ़ता है न चैनल देखता है। कभी बीते ज़माने में यही डायलाग मुलायम सिंह यादव भी बडे़ नाज़-अदा-अंदाज़ से मतलब फ़ुल लंठई और अभिमान में डूब कर दिया करते थे। लेकिन बाद के दिनों में वह मीडिया को कुत्ता बना कर अपने तलुए चाटने में लगा बैठे। और सत्ता से अंतत: बेदखल हो बैठे। बावजूद इस के उन का यह शौक; मीडिया से तलवे चटवाने का गया नहीं। चालू रहा। मायावती भी अपनी कुछ हेकडीबाज़ी के साथ मीडिया से तलवे चटवाने की शौकीन हो गईं। और प्रेस कांफ़्रेंस में लिखित बयान पढ़ने भर से जी नहीं भरा तो रोज प्राइम टाइम पर अपना यशोगान गवाने लगीं चैनलों पर। करोड़ों रुपए रोज खर्च कर के।
सोचिए कि आरटीआई कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने चैनलों पर चल रहे विज्ञापन के बारे में सूचना मांगी तो पता चला कि २० सितंबर, २०१० से २० सितंबर, २०११ के बीच सिर्फ़ एक साल में साढे़ अठारह करोड़ रुपए का विज्ञापन दिया गया था। अगले चरण में वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, दलित, मुस्लिम आदि रैलियों के आयोजन पर आ गईं। इस सब से भी पेट नहीं भरा तो उत्तर प्रदेश के बंटवारे की बीन बजा कर चिट्ठी लिख कर कांग्रेस को घेरने लगीं। बताने लगीं कि कांग्रेस का युवराज तो दलितों के घर ठहरता ज़रुर है पर खाना बाहर से मंगा कर खाता है। आदि-आदि। इस से भी जी नहीं भरा तो गरीब सवर्णों खास कर ब्राह्मणों को भी आरक्षण देने की चिट्ठी केंद्र को लिख बैठीं। इन चिट्ठियों को ले कर कांग्रेस मुस्कुराती रही चैनलों पर। इस के पहले भी कागजी राजकुमार को वह भट्ठा-परसौल में नकली हीरो बनवा कर सपा और भाजपा को मुंह चिढ़ाती रही थीं। कुछ-कुछ ऐसा स्वांग भरती रही थीं कि उन की लड़ाई सपा या भाजपा से नहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ कांग्रेस से ही है।
और यह लीजिए कांग्रेस ने भी दिन में सपने देखने शुरु कर दिए। उत्तर प्रदेश में जहां उस के पांव के नीचे ज़मीन तक नहीं थी बहुमत की सरकार बनाने के कागजी जहाज उड़ाने लगी। गोया सरकार नहीं बनानी हो, नागपंचमी या रक्षाबंधन के दिन पतंग उड़ानी हो। खैर माया थीं कि भभकती जा रही थीं। अब उन्हों ने एक आखिरी ब्रह्मास्त्र छोडा। मुस्लिम आरक्षण का। राष्ट्रीय राजनीति का दम भरने वाली कांग्रेस भी इस लपेटे में आ गई। और अगर मगर करते न करते चुनावी अधिसूचना के बावजूद मुसलमानों को साढे़ चार परसेंट आरक्षण का मालपुआ खा बैठी। यह नहीं सोचा कांग्रेस ने कि वह यह मालपुआ नहीं जमालगोटा खा बैठी है। राहुल ने दावों, आदर्शों आदि की जो अफ़ीमी खेती की थी उत्तर प्रदेश में इस एक मुस्लिम आरक्षण के जमालगोटे ने उन की सारी चूनावी चूनर का गोटा उतार कर बेरंग कर देगा। और तो और मायावती के लिए यह जमालगोटा डबल डोज बन गया। और जो बेगम अख्तर गा गई हैं न कि उलटी पड़ गईं सब तदवीरें, कुछ न दवा ने काम किया। भाजपा की सांप्रदायिक अफ़ीम की खेती पहले ही सूख चुकी थी, बाबू सिंह कुशवाहा ने उसे और सुखा दिया। इतना कि देखिए न कि अटल बिहारी वाजपेयी के गढ़ लखनऊ तक में भाजपा लगभग पूरी तरह न सही बुरी तरह साफ हो गई। भाजपा अयोध्या तक नहीं बचा पाई। राम को तो खैर वह नहीं ही बचा पाई। और भाजपा के डर ने मुलायम की ताजपोशी करवा दी। इस कदर बहुमत मिला कि इतना तो मुलायम और उन के लोगों को सपने में भी उम्मीद नहीं थी।
अपने देश में राजा का बाजा बजाने की पुरानी परंपरा है। अब मुलायम का, अखिलेश का गुणगान शुरु है। तो क्या मुलायम पर भ्रष्टाचार के आरोप उन के शासनकाल में उन पर नहीं लगे? लखनऊ में यही लोहिया पथ एक किलोमीटर तब पांच करोड़ में बना था। क्या लोग भूल गए हैं? लोग भूल गए हैं क्या कि लोहिया पार्क में लगाए गए एक-एक पौधे दो-दो हज़ार में खरीदे गए थे? कि लोग भूल गए हैं कि ब्राह्मणों को खुश करने के लिए परशुराम जयंती पर सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा जाते-जाते तब मुलायम सिंह ने ही की थी? क्या लोग भूल गए हैं कि इसी लखनऊ में दो युवकों ने एक सीओ रैंक के पुलिस अफ़सर को जीप के बोनट पर बांध कर दो घंटे तक सड़कों पर घुमाते रहे थे। और उन की हिम्मत देखिए कि जीप पर सीओ को बांधे वह सीधे एसएसपी के घर में घुस गए थे। क्या तो वह लोहिया के परिवार के हैं। वह तो जनेश्वर मिश्र तब जीवित थे। खुल कर सामने आए। कहा कि वह लोहिया के परिवार के नहीं हैं।
मुलायम राज में उत्तर प्रदेश में तब अपहरण भी एक उद्योग बन चला था, लोग क्या भूल गए हैं? आज़मगढ में कैसे रमाकांत यादव ने लोगों को बस से खींच कर गोली मार दी थी, यह भी लोगों को याद होगा ही। अखंड प्रताप सिंह और नीरा यादव जैसे महाभ्रष्ट अफ़सरों को मुख्य सचिव की कुर्सी भी बारी-बारी थमाने वाले भी मुलायम ही थे। मुलायम ने तो तरकीब लगा कर अपने खिलाफ़ चल रहे आय से अधिक आय के मुकदमे की सर्वोच्च न्यायलय में सुनवाई भी नहीं होने देते, मायावती भी यही कर रही हैं। बल्कि मुलायम मामले की सुनवाई करने वाले एक जज तो रिटायर भी हो गए। सो अब तक हुई सभी सुनवाई पानी में गई। अब सारी प्रक्रिया फिर से शुरु होगी। मतलब साफ है कि अब तक कुछ नहीं हुआ तो आगे भी खैर क्या होगा? पर यह दोनों अफ़सर जिन्हें मुलायम ने मुख्य सचिव बनाया था, जेल भी हो आए।
अब की बार भी मुख्यमंत्री चाहे मुलायम बनें, चाहे अखिलेश यह अलग बात है। पर यह तो अभी से तय है कि मुख्यमंत्री सचिवालय में अनीता सिंह बैठेंगी ही। क्या पता मुलायम तमाम वरिष्ठ अफ़सरों को किनारे लगा कर मुख्य सचिव ही न बना दें। शैलेष कृष्ण तो बैठेंगे ही। एक पूरी सूची है ऐसे अफ़सरों की। पर अब क्या होगा फतेह बहादुर सिंह और बृजलाल जैसे अफ़सरों का? क्या यह लोग भी निलंबित होंगे? जैसे कि मायावती ने मुलायम के खास अफ़सरों को किया था? मुलायम सिंह से अभी यह सब पूछना जल्दबाज़ी होगी। वैसे भी अभी वह एक साथ दो सपने देख रहे हैं। आज़म खां या शिवपाल सिंह आदि जैसे बैरियर हटा कर अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने का। दूसरे, तीसरा मोर्चा या चौथा मौर्चा बना कर खुद प्रधानमंत्री बनने का। याद कीजिए अभी बीते लोकसभा चुनाव में मायावती ने भी प्रधानमंत्री बनने का सपना बुना था और कि वाम मोर्चे ने तो उन्हें भावी प्रधानमंत्री घोषित भी किया था। अब मुलायम की फिर से बारी है। एक बार तो लालू ने उन का पैर घसीट लिया था, गुजराल बन गए थे। अब क्या होता है देखना बाकी है।
अभी तो हम एनआरएचएम जैसे तमाम-तमाम भ्रष्टाचार के असीम आरोपों और पत्थरों के किले से घिरी मायावती के उस विदा बयान कहिए, विदा गीत कहिए को गुन रहे हैं जिस के एक अंतरे में उन्हों ने कहा था कि प्रदेश की जनता जल्दी ही हमारे सुशासन की याद करेगी। फ़िलहाल तो अभी नई सरकार ने शपथ नहीं ली है पर संदेश हर जगह पहुंच गया है। और जगह जगह से मिल रही खबरों के चलते बदस्तूर एक नया नारा आ गया है कि नाम मुलायम है, गुंडई कायम है! सोचिए कि जब मुलायम पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो जिस कठोरता से अंग्रेजी हटा कर हिंदी को लागू किया था तब कहा गया था कि नाम मुलायम, काम कठोर! तब मुलायम पर लोहिया की छाप भी थोड़ी बहुत थी। बाद में वह आज़म खां के फेरे में आए और फिर जल्दी ही अमर सिंह की जहाज पर सवार हो गए। और सारे समाजवादी साथियों को पैराशूट थमा-थमा कर पार्टी के जहाज से उतारते गए। फ़िल्मी लोगों और कारपोरेट या उद्योगपतियों को प्राथमिकता में रखने लगे। एक से एक बेनी, एक से एक मधुकर दीघे किनारे होते गए। और यह देखिए कि जाने क्या हुआ कि अमर सिंह भी इस जहाज से उतार दिए गए। मोहन सिंह भी किनारे कर दिए गए। अब पूरा परिवार और चहेते लोग ही हैं।
खैर यह सब बहुत विस्तार की बातें हैं। अभी तो जाने किस अधिकार से अखिलेश लगातार ज़िलाधिकारियों को निर्देश देने लगे हैं। मुलायम लगातार कार्यकर्ताओं को अनुशासन में रहने की बात कह रहे हैं। और देखिए कि अभी मुलायम ने डीजीपी को बुला कर कडे़ निर्देश दे दिए हैं। किस अधिकार से भाई? लेकिन गुंडई है कि फिर भी सर चढ़ कर बोल रही है। जाने अभी उत्तर प्रदेश को कितने और कैसे दंश देखने हैं और झेलने हैं। सच तो यह है कि उत्तर प्रदेश और देश में भी किसी अखबार या किसी चैनल में न मायावती के खिलाफ़ न मुलायम के खिलाफ़ कुछ कहने या लिखने की हैसियत रह गई है। जो भी कोई मायावती या मुलायम या उन के अधिकारियों या परिजनों के खिलाफ़ लिखेगा या कहेगा वह हर हाल में मारा जाएगा। हल्ला बोल का दौर फिर लौट ही आया
है। एक समय जब वह मुख्यमंत्री थे तब अखबारों से नाराज हो कर भोर में बिचारे हाकरों पर ही हल्ला बोल गए थे। लोग भूल गए हैं क्या?
लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. इनका यह लेख इनके ब्लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.






