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सुख-दुख...

कमलेश्वरजी, पत्रिका स्त्री होती है और अखबार पुरुष होता है

कुछ लोग शाहनवाज राणा से मिल कर बार बार आग्रह कर रहे थे कि अगर मुजफ्फरनगर से प्रकाशित अखबार 'शाह टाइम्स' को दिल्ली में जमाना है तो कमलेश्वर जी को प्रधान संपादक बना दें। अखबार की दिल्ली में लांचिंग का प्रोग्राम बन रहा था। शाहनवाज ने मुझ से पूछा तो मैंने कहा कि लेखन में उनका अच्छा नाम है, रख लें तो अखबार की प्रतिष्ठा ही बढेगी। कमलेश्वर जी दिल्ली कार्यालय आ गए अपने पूरे ताम झाम के साथ। जिस प्रकार दुल्हन अपने साथ दहेज का सामान ले कर आती है उसी प्रकार कमलेश्वर जी भी अपने साथ सहायक संपादक, समाचार संपादक, पत्रिका संपादक, रिपोर्टर और ब्यूरो चीफ ही नहीं, विज्ञापन मैनेजर भी साथ ले कर आए। वेतन भी सब का ठीक ठाक तय कराया।

कुछ लोग शाहनवाज राणा से मिल कर बार बार आग्रह कर रहे थे कि अगर मुजफ्फरनगर से प्रकाशित अखबार 'शाह टाइम्स' को दिल्ली में जमाना है तो कमलेश्वर जी को प्रधान संपादक बना दें। अखबार की दिल्ली में लांचिंग का प्रोग्राम बन रहा था। शाहनवाज ने मुझ से पूछा तो मैंने कहा कि लेखन में उनका अच्छा नाम है, रख लें तो अखबार की प्रतिष्ठा ही बढेगी। कमलेश्वर जी दिल्ली कार्यालय आ गए अपने पूरे ताम झाम के साथ। जिस प्रकार दुल्हन अपने साथ दहेज का सामान ले कर आती है उसी प्रकार कमलेश्वर जी भी अपने साथ सहायक संपादक, समाचार संपादक, पत्रिका संपादक, रिपोर्टर और ब्यूरो चीफ ही नहीं, विज्ञापन मैनेजर भी साथ ले कर आए। वेतन भी सब का ठीक ठाक तय कराया।

उनके आते ही अखबार में पहला बदलाव यह हुआ कि अगले दिन प्रिंट लाइन में प्रधान संपादक के साथ सहायक संपादक, समाचार संपादक और पत्रिका संपादक और ब्यूरो चीफ का नाम जाने लगा। मैं कार्यकारी संपादक था, इन सबके नीचे मेरा नाम डाल दिया। मैंने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। हां, प्रिंट लाइन में इतने नामों का जाना चर्चा का विशय अवश्य बन गया। अब पहले पेज का निर्माण दिल्ली में होने लगा। समस्या यह थी कि इन सबमें अखबार का कोई आदमी नहीं था। लगभग सभी रेडियो पत्रकार थे। पहला पेज दिल्ली में बना तो उसका शेष इतना होता कि एक पूरा पेज भर जाता। पेज का मेकअप भी ठीक से नहीं बन पाता। केलकर समिति की रपट आई। सब अखबारों ने पहले पेज पर केलकर के सिंगल कालम या आधे कालम के फोटो के साथ रपट को लिया मगर कमलेश्वर की सेना के लोगों ने केलकर का सिंगल फोटो तीन कालम में लिया जिसने लगभग चौथाई पेज घेर लिया। इस पर सबने आपत्ति की मगर वे लोग तरह-तरह की दलील दे कर अपना बचाव करते रहे। कमलेश्वर जी कार्यलय कभी कभार ही आते थे। थोड़ी बहुत देर बैठते और अपने लोगों से गपिया कर चले जाते।

अखबार की लांचिंग की जिम्मेदारी कमलेश्वर जी ने ले ली और इसके लिए इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक लॉन बुक करा लिया गया। अखबार मालिक और उनका परिवार चाहता था कि इस अवसर पर किसी बड़े नेता को बुलाया जाए मगर कमलेश्वर जी ने बताया कि वह चीफ जस्टिस आफ इंडिया को बुलाएंगे। उनकी बात मान ली गई। जैस जैसे लांचिंग का दिन समीप आता गया, कमलेश्वर जी बताते कि बस चीफ जस्टिस से समय मिलने वाला है। मैंने मालिकान को बताया कि यह संभव नहीं लगता क्योंकि चीफ जस्टिस को ऐसे किसी निजी प्रोग्राम में शामिल होते नहीं सुना।

एक दिन शाम को कमलेश्वर जी आए। उनके साथ एक आदमी और था। उन्होंने बताया कि चीफ जस्टिस तैयार हो गए हैं। साथ आए आदमी के बारे में बताया कि इनकी कृपा से चीफ जस्टिस से समय मिला है। मैंने उस आदमी को गौर से देखा तो मेरी समझ में आ गया कि यह तो नवभारत के जमाने में मेरे साथ चिपक कर शराब वाले पत्रकार सम्मेलनों में जाता था। मैंने उससे पूछा कि क्या आप मुझे जानते हैं। इस पर वह सकपका गया और कमलेश्वर से चलने का आग्रह करने लगा। कमलेश्वर जी भी उठ गए और दोनो चले गए। उनके जाने के बाद मैंने शाहनवाज राणा को कहा कि चीफ जस्टिस आने वाले नहीं हैं। जिस आदमी को कमलेश्वर साथ लाए हैं इसकी हैसियत जिला जज को बुलाने की भी नहीं है। आप अगर प्रोग्राम करना ही चाहते हैं तो कुछ और प्रबंध कर लें और प्रबंध करने का समय नहीं बचा था। हां, इतना अवश्य किया कि लान बुकिंग के लिए जो चैक दिया था, उस की पेमेंट रुकवा दी।

इस बीच कमलेश्वर की टीम के आग्रह पर मुझे भी दिल्ली बुला लिया गया। यहां आकर मैंने देखा कि संवाददाताओं के बीच कोई कार्य विभाजन नहीं था। दरअसल उन लोगों को पता ही नहीं था कि ऐसा भी कुछ होता है। मैंने कार्य विभाजन के बारे में कहा तो सब एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। एक पुराने संवाददाता को मैंने बताया तो उसने सबका काम बांट दिया। यहां एक और गंभीर समस्या मिली। वह यह कि इस टीम ने तीन महीने से किसी को कोई अवकाश नही दिया था। मैंने साप्ताहिक अवकाश के लिए सबके दिन तय कर दिए तो सारे लोग बहुत प्रसन्न हुए। मगर कमलेश्वर के चेलों ने इसको लेकर मेरी शिकायत शाहनवाज से कर दी मगर शाहनवाज ने मुझसे कुछ नहीं कहा। मैंने सहायक संपादक से संपादकीय लिखने को कहा मगर उन्होंने कभी नहीं लिखा। बस एक काम वह यह करते कि चार बजते ही सारे लोग सिर जोड़ कर बैठ जाते और डमी बनाने लगते। इसके साथ ही बहस करने लगते कि यहां सिंगल कालम खबर ठीक रहेगी या डबल कालम। इसी में शाम हो जाती और पेज बनाते समय तक डमी बनती रहती। मुझसे भी इन्होंने डमी निर्माण प्रक्रिया में शामिल होने का आग्रह किया तो मैंने बताया कि डमी कागज पर नहीं समाचारों को संभालने वालों के दिमाग में बनती है। जब मैंने देखा कि अखबार का मजाक उड़ने लगा है तो मुजफ्फर नगर के साथियों को कह दिया कि अगर पेज पसंद न आए तो उसे दोबारा बना दें और ऐसा ही होने लगा तो उन लोगों को बुरा लगा मगर कहा कुछ नहीं क्योंकि जो पेज छप कर आता वह उनके बनाए पेज से बेहतर ही होता।

एक दिन ऐसे ही बात चल रही थी तो मैंने कह दिया कि कमलेश्वर जी अच्छे लेखक हो सकते हैं मगर अच्छे पत्रकार नहीं हैं। यह बात कमलेश्वर तक पहुंच गई और अगले दिन कमलेश्वर जी आ विराजे। मीटिंग आरंभ हुई तो सबसे पहले उन्होंने यही मुद्दा उठाया। मैंने कहा कमलेश्वर जी मैंने आपके बारे में गलत नहीं कहा। आप यह बताएं कि क्या आप अपने को बुद्धिजीवी मानते हैं। बेशक, कमलेष्वर जी ने कहा तो मैंने बताया कि पत्रकार तो बुद्धिजीवी नहीं होता उसे तो कानून श्रमजीवी मानता है और उसके लिए श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम है। अब आप स्वयं तय कर के बता दें कि आप बुद्धिजीवी हैं या श्रमजीवी। इस पर वह मौन हो गए तो मैंने कहा कि कोई जल्दी नहीं है, आप सोच कर बता देना।

कमलेश्वर और उनके लोगों ने एक नया प्रयोग यह किया कि अखबार के पहले और आठवें कालम में टाप पर एक-एक पाकेट कार्टून देने लगे। इस पर आपत्ति की तो उनके एक सहायक संपादक ने बताया कि कमलेश्वर जी ने यह प्रयोग एक पत्रिका में किया था जो काफी पसंद किया गया। कमलेश्वर जी ने भी इसे उचित बताया तो मैंने कहा कमलेश्वर जी पत्रिका स्त्री होती है और अखबार पुरुष होता है। स्त्री साड़ी बांध सकती है, सूट सलवार पहन सकती है, गरारा पहन सकती है, स्कर्ट पहन सकती है और कुर्ता पाजामा तथा पैंट शर्ट भी पहन सकती है मगर पुरुष के लिए कुछ खास वेश भूषा होती है अगर वह साड़ी बांधेगा या सूट सलवार पहनेगा तो लोग उसे किन्नर समझेंगे। बात यहीं समाप्त हो गई मगर इसका परिणाम यह हुआ कि अगले दिन से केवल एक कार्टून पहले कालम में नीचे की ओर रह गया।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां


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