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कम पैसों में पत्रकारों से ज्‍यादा काम कराने का चरित्र यहां भी है

: विदेश डायरी : कब समझेंगे हम जीवन का सच : आज कई महीनों बाद भडास4मीडिया के लिए कुछ लिखने की बेचैनी बनी है। ऐसा नहीं है कि लिखने का मन नहीं था। पर कुछ ऐसी स्थितियों में फंसा रहा कि कुछ भी लिखने के लिए मन केंद्रित नहीं कर पा रहा था। इस बीच यहां के एक चर्चित अंग्रेजी अखबार द मोनिटर के लिए कुछ करता रहा पर ज्यादातर काम डेस्क का रहा इसलिए वहां मन स्थिर नहीं हो पा रहा था।

: विदेश डायरी : कब समझेंगे हम जीवन का सच : आज कई महीनों बाद भडास4मीडिया के लिए कुछ लिखने की बेचैनी बनी है। ऐसा नहीं है कि लिखने का मन नहीं था। पर कुछ ऐसी स्थितियों में फंसा रहा कि कुछ भी लिखने के लिए मन केंद्रित नहीं कर पा रहा था। इस बीच यहां के एक चर्चित अंग्रेजी अखबार द मोनिटर के लिए कुछ करता रहा पर ज्यादातर काम डेस्क का रहा इसलिए वहां मन स्थिर नहीं हो पा रहा था।

लिखने का भी जो काम रहा वह उगांडा में रहने वाले भारतीयों पर ही केंद्रित रहा इसलिए बार बार लगता रहा कि पत्रकारिता के जीवन के लिए यह कोई उपलब्धि नहीं हो सकती। थककर मैंने वहां नमस्ते करके अपनी फाइनेंस की दुनिया में वापस आने का फैसला कर लिया। वैसे भी मैं केवल तीन महीनों की छुट्टी लेकर ही अखबार में काम कर रहा था।

यहां की अखबारी दुनिया भी कमोवेश भारत की ही तरह है। संपादक और मालिक लोग कम से कम पैसों में काम कराना चाहते हैं। शायद किसी भी व्यापार के लिए कम पैसों में ज्यादा से ज्यादा काम लेने का एक जैसा चरित्र पूरी दुनिया में है। अखबार निकालना यहां भी शुद्ध व्यापार ही है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो कहीं कोई मिशन या आम जनता के प्रति समर्पण का कोई भाव नहीं दिखता। शाम को किसी पब या रेस्तरां में बियर पीना वैसे भी यहां आम चलन है, इसलिए सौ प्रतिशत पत्रकार ऐसा करते हैं तो इसपर कोई टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए। अपने देश में भी तो ज्यादातर पत्रकारों को शराब की ऐसी ही आदत है! बहरहाल यह सब ऐसी बातें नहीं हैं जिनपर कोई टिप्पणी की जानी चाहिए।

अपनी पूरी स्थिति को देखते हुए पिछले कुछ महीनों से ऐसा लगने लगा था कि फिलहाल यहां से जाने की कोई गुंजाइश निकट भविष्‍य में है नहीं। उम्र बढ़ने के साथ कई बार आदमी को अकेलेपन का ज्यादा अहसास होने लगता है, यह मैंने यहां आकर कुछ ज्यादा ही महसूस किया है। इसलिए मैंने कुछ माह पूर्व अपनी पत्नी और बेटे को भी यहीं बुला लिया है। मैं नहीं जानता कि मैंने यह अच्छा किया या बुरा क्योंकि बेटा इंजीनियर है और भारत में उसके लिए ज्यादा अच्छा रास्ता बन सकता है। फिर भी वह पिता का मान रखने के लिए यहां आ गया है और एक निजी स्टील कंपनी में नौकरी भी करने लगा है।

आज जब देवानंद के निधन की खबर आई तो हमलोग घंटों उन्हीं की बात करते रहे। मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया… जैसे गानों वाली उनकी फिल्में भला कौन भूल सकता है। वैसे तो देवानंद की मृत्यु परिपक्व समय पर ही हुई है और उनके अपने पूरे जीवन जी लेने के बाद हुई है पर फिर भी यह एक घटना तो है ही। वह लंदन में मरे, अपने देश से दूर। हमलोग आज इसी के बारे में चर्चा कर रहे थे। आदमी अगर अपने देश्‍ा से बाहर मरे तो अनेक कारणों से यह अच्छा होता है। दोस्तों और रिश्‍तेदारों को अनेक औपचारिकताओं से छुट्टी मिल जाती है। जब हम खबर देख रहे थे तो यह भी सूचना देखी कि देवानंद ने अपने लोगों को पहले ही कह रखा था कि उनकी मौत के बाद कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं होंगे। मुझे यह बात बहुत अच्छी लगी। आदमी के जीवन का क्या ठिकाना! कब कौन कहां से चल देगा कोई नहीं कह सकता। ऐसे में जीवन के इस सबसे बड़े सच को स्वस्थ मन से स्वीकार कर लेना चाहिए। हमने भी तय कर लिया है। और मेरा पुत्र इस हिसाब से बहुत व्यावहारिक है। अभी क्योंकि मुझे यहां कई साल बिताने पड़ सकते हैं इसलिए यह भी हो सकता है कि मैं भी यहीं आप सबको आखिरी नमस्ते भी कर लूं। ऐसे में मुझ जैसे को भी कोई छद्म परंपरा के पीछे नहीं रहना चाहिए। वैसे भी मैंने अपने जीवन में बार बार प्रयास किया है कि मैं पुरानी और अव्यावहारिक परंपराओं को तोड़ता चलूं। मैंने अपना विवाह भी लीक से हटकर किया था।

जब मैं भारत में था तो मेरे एक पड़ोसी कुछ महीनों के लिए विदेश गए थे और उसी बीच उनकी पत्नी का निधन दुबई में हो गया। उनकी इच्छा के अनुसार उनके पार्थिव श्‍रीर को भारत ले जाया गया था। इससे उनके पूरे परिवार को कितनी परेशानी हुई थी, यह मैंने काफी करीब से देखा था। किसी एक रिश्‍तेदार ने यहां तक कह भी दिया कि दुबई में ही सब कुछ कर देते तो आसानी होती। यही सच है। हम तो मौत के आगोश में चले गए पर दूसरे तमाम लोगों को अंतिम क्रिया तक भी परेशान करते रहे। आज यह सब चर्चा करते हुए हमने भी तय कर लिया कि अगर मेरा भी यहीं निधन हो गया तो केवल शरीर यहां के विद्युत श्‍ावदाह गृह में जला दिया जाय और सबको सूचना दे दी जाय। उसके बाद किसी तरह का कोई भी आयोजन बिल्कुल नहीं किया जाय। मुझे खुशी है कि मेरे पुत्र ने इस व्यावहारिक स्थिति को समझा और स्वीकार भी कर लिया। यह तो सबको पता है कि आदमी अकेला आता है और अकेला ही जाता है। बहुत करीबी लोग कुछ दिनों तक दुःखी रहते हैं, पर धीरे धीरे समय सबकुछ सामान्य कर देता है। जिंदा रहते हुए आदमी के खिलाफ अनेक शिकायतें बनती हैं, उसने यह किया, वह किया, वह बहुत बुरा है, अच्छा है आदि इत्यादि। पर जब जीवन समाप्त हो जाता है तो क्या शिकवा, क्या शिकायत!

अगर आदमी केवल इतनी छोटी सी बात को ठीक से समझ ले और मन में बैठा ले तो किसी को किसी से कभी कोई शिकायत रहेगी ही नहीं और बचा खुचा जीवन खूब मौज मस्ती में काटा जा सकता है। पर कितने लोग इस सच को स्वीकारते हैं! ज्यादातर लोग केवल शिकायतें रखकर ही जीते हैं और बाकी का समय भी ऐसे ही काट देते हैं। अगर आदमी हर फिक्र को धुएं में उड़ाते हुए समय काटने को तय कर ले तो जीवन कितना आसान हो जाय। देवानंद के पूरे जीवन का यही तो सच है। राजकपूर भी इसी मानसिकता से जीते थे। इसीलिए उनकी फिल्मों में आम आदमी के प्रति केवल प्यार ही दिखता था। कोई नफरत और किसी के प्रति घृणा का कोई भाव नहीं था। मुकेश और मो. रफी के गाए तमाम गीत कई बार मेरे जैसों के लिए इसीलिए अनेकों बार बहुत उर्जा देने का काम करते हैं। उनमें जीवन का सच है। व्यावहारिक जीवन का सच।

लेखक अंचल सिन्हा बैंक के अधिकारी रहे, पत्रकार रहे, इन दिनों उगांडा में बैंकिंग से जुड़े कामकाज के सिलसिले में डेरा डाले हुए हैं. तीन महीने तक स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट के रूप में एक अखबार को सेवा देने के बाद फिर से बैंकिंग का कामकाज संभाल लिया है. अंचल सिन्हा भड़ास4मीडिया पर अपनी विदेश डायरी के जरिए समय-समय पर उपस्थित होते रहते हैं. अंचल सिन्‍हा से सम्‍पर्क उनके फोन नंबर +256759476858 या ई-मेल – [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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