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सुख-दुख...

करनी किसी और की, जिम्‍मेदार ठहराए गए गिरीश गुरनानी जी

यशवंत जी नमस्कार के साथ ही पत्रकारों का दर्द उठाने के लिए ढेर सारी बधाई भी। उम्मीद भी कि आप हर बार की तरह खबर को जगह देंगे। मैं उत्तराखंड हिन्दुस्तान अखबार के एक शहर में स्ट्रिंगर के रूप में बीते पांच साल से कार्यरत हूं। तीन संपादकों के साथ काम करने कर चुका हूं। भड़ास में नए संपादक गिरीश गुर्रानी के बारे में छपे लेख से थोड़ा व्यथित था तो सोचा मन की बात वहीं कह दूं जहां से मुझे परेशानी हुई। चापलूसी नहीं कर रहा अपने मन की बात कह रहा हूं।

यशवंत जी नमस्कार के साथ ही पत्रकारों का दर्द उठाने के लिए ढेर सारी बधाई भी। उम्मीद भी कि आप हर बार की तरह खबर को जगह देंगे। मैं उत्तराखंड हिन्दुस्तान अखबार के एक शहर में स्ट्रिंगर के रूप में बीते पांच साल से कार्यरत हूं। तीन संपादकों के साथ काम करने कर चुका हूं। भड़ास में नए संपादक गिरीश गुर्रानी के बारे में छपे लेख से थोड़ा व्यथित था तो सोचा मन की बात वहीं कह दूं जहां से मुझे परेशानी हुई। चापलूसी नहीं कर रहा अपने मन की बात कह रहा हूं।

दिनेश जुयाल के जैसे तेवर वाले व्यक्ति भले ही अब मिलने में थोड़ा समय लगे, मगर गिरीश गुर्रानी के तेवर भी उनके कमतर नहीं हैं। वह अच्छा काम करने वाले की पीठ थपथपाना नहीं भूलते। चापलूसों व कामचोरों पर कार्रवाई भी करते हैं। जैसा उन्होंने पिछले दिनों में किया भी है। अब बात करते है खबर की। जिन तन्हा साहब ने खबर लिखी है वो भी मेरे अच्छे परिचित हैं। उनके साथ जो हुआ वह किसी भी नजर से ठीक नहीं ठहराया जा सकता। मगर दोष जिसका हो, उसको ही कटघरे में खड़ा करना चाहिए ना। पूरे मामले में मार्केटिंग विभाग के अधिकारियों की कारस्तानी है। जबकि शायद ही संपादक का ताल्लुक विज्ञापन के लोगों को रखने में होता है।

वैसे भी नए संपादक को आए ही कुल दो माह भी नहीं हुए हैं। रही बात विज्ञापन प्रतिनिधि की तो एए साहब आप तो खबर से मतलब रखा कीजिएगा। विज्ञापन तो अलग चीज है। मुझे बुरा इसलिए भी लगा कि क्यों ऐसे इंसान पर दोष मढ़ा गया जिसका पूरे प्रकरण में रोल ही नहीं था। कई बार हम खबरें लिखते समय भी निर्दोष को दोषी मानकर छपान कर देते हैं। ऐसा ही इस खबर को लेकर हुआ है। हालांकि पत्रकारिता बेहद खराब दौर में चली गई है तो गलत व सही का फैसला भी कौन करे। फेसबुक का कमेंट बुरा लगा तो पत्रकार भिड़ गए। दूसरों की खबरें लिखने वालों की खबरें छपी। प्रमुख चैनलों के रिपोर्टर पर जान से मारने का प्रयास सहित संगीन मुकदमे तक लग गए। चापलूसी की पत्रकारिता ही रह गई है। सरोकार को खोजने से नहीं मिलते। घिन्‍न सी आती है पत्रकारिता पर। मगर क्या करें फंस गए तो किधर जाएं। यशवंत जी मेरी खबर को जगह मिलेगी तो अच्छा लगेगा। वैसे क्या अच्छे दौर लौटेंगे? उम्मीद टिकी तो है मगर मध्यम सी लौं की तरह।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र. उन्‍होंने ने नाम न छापने की गुजारिश की है.

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