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दिल्ली

कर्ण, केजरीवाल और कार्पोरेट की अकथ कहानी

: अरविंद केजरीवाल ने एक पत्थर तो तबीयत से आकाश में उछाल ही दिया है, आकाश में सुराख होते देखना अभी शेष है! : जैसे महाभारत गडमड हो कर नए संस्करण और नए तेवर में हमारे सामने उपस्थित है। अब तक की स्थितियां यह तो बता ही रही हैं कि अरविंद के्जरीवाल अब इस नई महाभारत में कर्ण की भूमिका में आ चुके हैं। उन के आचार्य अन्ना हजारे परशुराम बन चुके हैं। अब यह देखना शेष है कि अरविंद केजरीवाल के रथ का पहिया कब फंसता है, परशुराम का श्राप कब फलीभूत होता है, और कि अर्जुन बन कर उन्हें कौन 'विदा' करता है।

: अरविंद केजरीवाल ने एक पत्थर तो तबीयत से आकाश में उछाल ही दिया है, आकाश में सुराख होते देखना अभी शेष है! : जैसे महाभारत गडमड हो कर नए संस्करण और नए तेवर में हमारे सामने उपस्थित है। अब तक की स्थितियां यह तो बता ही रही हैं कि अरविंद के्जरीवाल अब इस नई महाभारत में कर्ण की भूमिका में आ चुके हैं। उन के आचार्य अन्ना हजारे परशुराम बन चुके हैं। अब यह देखना शेष है कि अरविंद केजरीवाल के रथ का पहिया कब फंसता है, परशुराम का श्राप कब फलीभूत होता है, और कि अर्जुन बन कर उन्हें कौन 'विदा' करता है।

रामलीला मैदान की बिसात पर बिछी महाभारत की यह बिसात पानी, बिजली और लोकपाल के बाद वैसे भी सिमट जानी है। इस पूरे परि्दृष्य में कांग्रेस का शिखंडी की गति को प्राप्त होते जाना एक अलग क्षेपक है। मोदी का रथ रोकने की कांग्रेस की एक यह कवायद भी फ़ुस्स होती दिख रही है। कांग्रेस मोदी के रथ का पहिया रोकने के लिए केजरीवाल को अपना भस्मासुर बना चुकी है। नीतीश कुमार, रामविलास पासवान से हाथ मिला चुके हैं। मुलायम मुज़फ़्फ़र नगर के राहत कैंपों में कांग्रेस और भाजपा के लोगों को शरण दे चुके हैं, उन का तीसरा मोर्चा का सपना समय के साथ शरणागत है।

अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मुख्य मंत्री श्रीपति मिश्र के स्लोगन नो वर्क, नो कंपलेंड की खतरनाक सीमा को भी पार कर चुके हैं। अखिलेश की गति को देख कर श्रीपति मिेश्र भी लज्जित हो रहे होंगे। गरज यह कि कई-कई सपनों के टूटने का यह कठिन समय है। तमाम कामरेडों, सेक्यूलरों और सांप्रदायिकों को पानी पिलाते, ठेंगा दिखाते मोदी का सपना कब टूटेगा इस प्रतीक्षा में बौद्धिक बहस तेज़ है। निर्भया, भारत रत्न सचिन तेंदुलकर, आसाराम, तरुण तेजपाल, जस्टिस ए के गांगुली और देवयानी पर बहस की आग ठंडी पड़ चुकी है। लेकिन कांग्रेस और भाजपा के लाक्षागृहों की आग कब ठंडी होगी, यह कोई नहीं जानता।

मंहगाई, भ्रष्टाचार और लोकपाल अब कभी न खत्म होने वाले शाश्वत विषय हैं। एन जी ओ देश में इतनी ताकत से सामने आ जाएंगे कि बना बनाया राजनीतिक ढांचा नष्ट हो जाएगा, बह जाएगा, इस तरह? यह कौन जानता था भला? वह दिन हवा हुए जब भाजपा के नकवी कहते थे कि लिपिस्टिक लगाए, मोमबत्ती हाथ में लिए ये एन जी ओ की औरतें ! अब आम आदमी भी खास हो रहा है। क्यों कि कारपोरेट लीला की यह अकथ कहानी है। देखिए न कि एक मोबाइल फ़ोन कंपनी कैसे तो हफ़्ते भर में ही एक विज्ञापन ले कर आ गई है कि सरकार कैसे बनाएं, पार्टी पूछ रही है! दिल्ली के दिल में अभी तो बहुत करवटें हैं। अभी आम भी बहुत बदलेंगे और खास भी।

नहीं सच तो यह है ही कि शीला दीक्षित ने सचमुच दिल्ली के विकास के लिए इन बीते पंद्रह सालों में बहुत काम किया है। फ़्लाई ओवर, मेट्रो आदि विकास के कई नए मीनार बनाए हैं शीला दीक्षित ने, इस में कोई शक नहीं। लेकिन सोनिया, राहुल और मनमोहन की तिकड़ी, मंहगाई और भ्रष्टाचार ने शीला दीक्षित के सारे काम यमुना के पानी में बह गए। वोटर भूल गया यह सब कुछ,सारा विकास,मेट्रो और फ़्लाई ओवर ! उसे झाड़ू याद रहा और उस ने चला दिया झाड़ू ! ठीक वैसे ही जैसे कभी अटल विहारी वाजपेयी सरकार ने शाइनिंग इंडिया का नारा दिया था लेकिन गुजरात में सरकार द्वारा प्रायोजित दंगे की आंच ने उन के शाइनिंग इंडिया के नारे को बंगाल की खाड़ी में बहा दिया था वोटर ने, वोट डालते समय।

ठीक वैसे ही जैसे सात रुपए किलो प्याज और आपसी सर फुटौव्वल ने जनता पार्टी की सरकार को विदा कर दिया था 1979 में, इंदिरा गांधी की तानाशाही को तब भुला दिया था। ठीक वैसे ही जैसे राजीव गांधी का सारा कंप्यूट्राइजेशन और उन के मिस्टर क्लीन की छवि को वोटर ने बोफ़ोर्स की बदनामी में बिसरा दिया था। 1989 में। फ़िलहाल तो कांग्रेस ने एक शकुनी चाल फिर चली है कि अरविंद केजरीवाल को मोदी के विजय रथ को रोकने के लिए स्पीड ब्रेकर बना कर खड़ा करने की। अब मोदी इस कैसे और किस चाल से इस स्पीड ब्रेकर को पार कर पाते हैं यह उन की कुटिल बुद्धि जाने पर कांग्रेस अब खुद पटरी से उतर चुकी है। दिग्विजय सिंह जैसों के बड़बोलेपन और चिदंबरम और कपिल सिब्बल जैसे लोगों के आसमानी तौर तरीके, सलमान खुर्शीद जैसे चाटुकारों और भ्रष्टों ने उसे कहीं का नहीं छोड़ रखा है। एक समय कभी देवकांत बरुआ ने इंदिरा इज इंडिया का स्लोगन दिया था और अब सलमान सोनिया को समूचे देश की मां बता कर उन चाटुकारिता भरे दिनों और कांग्रेस की सत्ता से विदाई के संकेत दे दिए हैं। भ्रष्टाचार और मंहगाई, बेरोजगारी को भी इस में जोड़ लीजिए किसी भी सरकार को ले डूबने के लिए काफी है।

अब अरविंद केजरीवाल का दिल्ली का मुख्य मंत्री बनना तो तय है। लेकिन क्या यह भी तो नहीं तय है कि वह दूसरे विश्वनाथ प्रताप सिंह साबित होंगे? जिस किरन बेदी ने दिल्ली की पुलिस कमिश्नर नहीं बन पाने के विरोध में नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था, अब उसी दिल्ली का मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल बनने जा रहे हैं। अब अगर वह अन्ना, किरन बेदी आदि से वह अलग नहीं हुए होते तो यह संभव नहीं होता। ठीक उसी तरह जैसे कि अगर विश्वनाथ प्रताप सिंह राजीव गांधी और उन की कांग्रेस से अलग नहीं हुए होते तो प्रधान मंत्री नहीं बन पाए होते। मुद्दों की राजनीति का दम भरने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह अपने अंतर्विरोधों के चलते जल्दी ही प्रधान मंत्री की कुर्सी गंवा बैठे। अंतरात्मा की अवाज़ उन के कहे के बावजूद किसी ने सुनी नहीं और वह 'शहीद' हो गए लोकसभा में। फिर धीरे-धीरे राजनीति से भी विदा हुए। अब उन्हीं की तरह अतियों और मुद्दों की लफ़्फ़ाज़ी हांकते अरविंद केजरीवाल भी खड़े हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह भाजपा की बैसाखियों पर खड़े हो कर प्रधानमंत्री बने थे। कुर्सी गंवाने के बाद वह भाजपा को सांप्रदायिक बताने में लग गए। पर अरविंद केजरीवाल तो कांग्रेस की बैसाखी पर खड़े होने के पहले ही से कांग्रेस के लिए असंसदीय शब्दों और आरोपों की की झड़ी लगाए बैठे हैं। जेल भेजने की धमकी दिए बैठे हैं। क्या होगा दिल्ली का? विशवनाथ प्रताप सिंह की एक कविता याद आ रही है। दिल्ली की जनता के मद्देनज़र । शीर्षक है लिफ़ाफ़ा :

पैगाम उन का
पता तुम्हारा
बीच में फाड़ा मैं ही जाऊंगा।

बहरहाल अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आप की सरकार का एक मतलब यह तो है ही कि फ़िलहाल दिल्ली में बिचौलियों और भ्रष्टों की ऐसी-तैसी ! उन के तंबू कनात तो उखड़ेंगे ही। भले इस सरकार की उम्र कितनी भी कम क्यों न हो पर एक बार कल्पना कर के देखिए कि खुदा न खास्ता अगर अरविंद केजरीवाल केंद्र की सरकार में भी आने वाले दिनों में जो काबिज़ हो जाते हैं तो इन अंबानियों, टाटाओं आदि का क्या होगा और इन पर क्या गुज़रेगी? सोच कर ही मज़ा आ जाता है!

उनके परिजन कह ही रहे हैं कि अरविंद को लालकिले से झंडा फहराते देखना चाहते हैं। खैर, अभी तो जो हो अरविंद केजरीवाल ने एक पत्थर तो तबीयत से आकाश में उछाल ही दिया है, आकाश में सुराख होते देखना अभी शेष है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता है, 'भेड़िया गुर्राता है/ तुम मशाल जलाओ/ उस में और तुम में यही बुनियादी फ़र्क है/ भेड़िया मशाल नहीं जला सकता।'अरविंद केजरीवाल ने कहीं इन राजनीतिक भेड़ियों के आगे क्या मशाल तो नहीं जला दी है? यह अब आप तय कर लीजिए। क्यों कि जब दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने बिजली के कटे कनेक्शन जोड़ने शुरु किए थे तब बहुत कम लोगों ने यह सोचा था कि अरविंद बिजली के कनेक्शन तो जोड़ रहे हैं पर साथ ही कांग्रेस का सत्ता से गर्भनाल का रिश्ता भी काट रहे हैं। अभी शीला दीक्षित का सत्ता से गर्भनाल से कटा है पर अब क्या यह अंगड़ाई, आगे की और लड़ाई में बदले बिना रहेगी?

काश कि कांग्रेस ने दो साल पहले ही लोकपाल बनाने में सचमुच की पहल की होती तो आज शायद उस की इतनी दुर्गति नहीं हुई होती। लेकिन कांग्रेस तो तब 'हां-हां' करते हुए भी नित नए ला्क्षागृह बनाती रही अन्ना आंदोलन का अंत करने के लिए। स्वामी अग्निवेश को रोड़ा बनाया, फिर स्वामी रामदेव को आगे किया फिर उन के के साथ आधी रात बदसलूकी की। इन को, उन को तोड़ने के लिए लगाती रही। जो भी आंदोलन हुए, कुचलने के लिए कांग्रेस कटिबद्ध हो गई। अन्ना को जेल भेज दिया। निर्भया आंदोलन के साथ भी यही चाल चली। गरज यह कि अपनी ही बिछाई बिसात पर कांग्रेस लेट गई। और फिर चुनावों में लुट गई। हां, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि अगर अरविंद केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं इतनी बलवती न होतीं और कि वह राजनीति में आने के बजाय अन्ना के साथ ही संघर्षरत रहे होते तो यह किन्नर टाइप लोकपाल जो आज संसद ने पारित किया है, देश इस से बच ज़रुर गया होता। एक जनांदोलन का इस तरह गर्भपात न हुआ होता। एक मज़बूत लोकपाल भी आ सकता था। इतना मज़बूत कि मुलायम सिंह यादव जैसे लोग अपने ही भ्रष्टाचार के कालीन में लिपट कर लोकसभा में ही बेहोश हो गए होते। बहिर्गमन की नौबत ही नहीं आती। लेकिन क्या अरविंद केजरीवाल और उन के साथियों को यह जान नहीं लेना चाहिए कि मुहब्बत और राजनीति ज़िद से नहीं होती। और न ही काठ की हाडी बार-बार चढ़ती है। अभी तो इब्राहिम का एक शेर याद आता है :

खड़े हैं रेत में काग़ज की कश्तियाँ ले कर ,
मिला है हुक्म कि दरिया को पार करना है।

लेकिन यहीं राहत इंदौरी भी कह गए हैं :

लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के सँभालते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं।

अब अरविंद केजरीवाल कर्ण बनते हैं, अभिमन्यु बनते हैं कि अर्जुन ! कार्पोरेट के हाथ खेलते हैं कि दो-दो हाथ करते हैं, यह सब समय की दीवार पर लिखी इबारत में अभी बिलकुल साफ नहीं है। यह देखना शेष भी है और दिलचस्प भी। इस लिए भी कांग्रेस का कुटिल हाथ आप के साथ है। और कि मोदी के हौवा में घायल कांग्रेस कुछ भी करने से अब बाज़ आने वाली नहीं है।

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है.


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