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कवि राजकिशोर राजन को मिला रामदेव भावुक सम्‍मान

प्रगतिशील लेखक संघ तथा मुंगेर की साहित्यिक संस्था ‘रचना’ के संयुक्त तत्वाधान में जनकवि रामदेव भावुक स्मृति-सम्मान सह कवि-सम्मेलन का आयोजन पटना के बिहार माध्यमिक शिक्षक संध भवन, जमाल रोड के सभागार में पूरी भव्यता के साथ संपन्न हुआ। समारोह के मुख्य अतिथि वरिष्ठ आलोचक डा. खगेन्द्र ठाकुर एवं बहुचर्चित कवि आलोक धन्वा थे तथा अध्यक्ष पद्मश्री रवीन्द्र राजहंस थे तथा संचालक युवा कवि शहंशाह आलम।

प्रगतिशील लेखक संघ तथा मुंगेर की साहित्यिक संस्था ‘रचना’ के संयुक्त तत्वाधान में जनकवि रामदेव भावुक स्मृति-सम्मान सह कवि-सम्मेलन का आयोजन पटना के बिहार माध्यमिक शिक्षक संध भवन, जमाल रोड के सभागार में पूरी भव्यता के साथ संपन्न हुआ। समारोह के मुख्य अतिथि वरिष्ठ आलोचक डा. खगेन्द्र ठाकुर एवं बहुचर्चित कवि आलोक धन्वा थे तथा अध्यक्ष पद्मश्री रवीन्द्र राजहंस थे तथा संचालक युवा कवि शहंशाह आलम।

इस अवसर पर हिन्दी के चर्चित युवा कवि राजकिशोर राजन को समकालीन हिन्दी कविता में उत्कृष्ट कार्य के लिए वर्ष 2011 का ‘जनकवि रामदेव भावुक स्मृति-सम्मान’ महत्वपूर्ण कवि आलोक धन्वा के हाथों दिया गया। सम्मान स्वरूप राजकिशोर राजन को प्रशस्ति-पत्र, प्रतीक चिन्ह, अंग वस्त्र तथा सम्मान राशि दी गयी। कवि आलोक धन्वा ने अपने वक्तव्य में कहा कि राजकिशोर राजन सम्मानित करते हुए मुझे बड़ी खुशी हो रही है। उन्होंने कहा कि अगर कोई कवि यह समझता है कि उसे कविता लिखना आ गया, किसी भी उम्र में, यह उसकी तार्किक हार है क्योंकि कवि हमेशा सीखता रहता है। श्री धन्वा ने राजकिशोर राजन की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि राजन की कविताएँ हमारे संसार को व्यापक करती रही है।

वरिष्ठ आलोचक खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि मुझे गर्व हो रहा है कि जनकवि रामदेव भावुक की स्मृति से जुड़ा यह सम्मान है। कविता समय चाहती है, साधना चाहती है। कोई भी कवि यर्थाथ से अपने को जोड़े बिना कविता नहीं लिख सकता। राजकिशोर राजन ऐसा ही कर रहे हैं। कोलकाता से पधारे युवा कवि राज्यवर्द्धन ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि राजकिशोर राजन जनपदीय कवि हैं, वे समाज में आम आदमी के द्वारा जिन शब्दों का लेन-देन किया जाता है, व्यवहार किया जाता है, वैसे शब्दों से वे कविता बुनते हैं। इसलिए उनकी कविता लोगों से संवाद करते हुए प्रतीत होती है। युवा कवि शहंशाह आलम ने कहा कि राजकिशोर राजन की कविताएँ यथार्थ से परिपूर्ण हैं तभी यह सम्मान उन्हें दिया गया है। कथाकार शिवदयाल ने राजन की उत्प्रेरित करती कविताओं पर अपने विचार व्यक्त किये।

सम्मानित कवि राजकिशोर राजन ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि कविता एक सामाजिक कर्म है। मैं इसी सामाजिकता का निर्वाह कर रहा हूँ। मुझे सम्मानित किया गया इसके लिए ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ तथा ‘रचना’ का आभारी हूँ। इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता पद्मश्री रवीन्द्र राजहंस ने की तथा संचालन डा. विजय प्रकाश ने किया। कवि सम्मेलन का आरंभ चर्चित कवि -कथाकार योगेन्द्र कृष्णा की कविताओं से किया गया। प्रसिद्ध गीतकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने अपने गीत सुनाते हुए श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। श्री द्विवेदी ने आज के हालात पर व्यंग्य करते हुए सुनाया ‘तुम्हें क्या पता/सपना देखे सदियाँ बीत गई’।

एम. के. मधु ने अपनी कविता ‘रानी रूपमती की चाय दुकान’ सुनाते हुए पूँजीवाद को आड़े हाथों लिया जबकि शायर ओपी घायल ने अपनी गज़ल-पाठ करते हुए कहा – किसी की याद में सुध-बुध कभी खो नहीं सकते…। डा. खगेन्द्र ठाकुर भी कहाँ मानने वाले थे, उन्होंने सुनाया – ‘वे लेखक नहीं हैं मगर वे लिखते हैं/ वे लिखते हैं हल की फाल से।’ चर्चित शायर छंदराज ने गज़लों का पाठ करते हुए कहा ‘हाथ में बंदूक दे दी/ आग की झील दीवार पर’। इस समय के महत्वपूर्ण कवि आलोक धन्वा ने कवि सम्मेलन को कुछ इस तरह से सार्थक किया- ‘हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो उसकी माँ के घर की ओर जाती है।’ मधेपुरा से आये युवा कवि अरविन्द श्रीवास्तव ने अपनी ‘राजधानी में एक उज़बेक लड़की’ कविता के बहाने बाजारवाद को बेनकाव किया। युवा कवि शहंशाह आलम ने अपनी ‘तलाशी के लिए प्रार्थना’ शीर्षक कविता में कहा – मेरा गाल मत छूओ/मेरे गाल पर किसी के बोसे के निशान हैं’।

मुजफ्फरपुर से आयी चर्चित कवयित्री पूनम सिंह ने मकबूल फिदा हुसैन को याद करते हुए अपनी कविता सुनायी। राजकिशोर राजन ने अपनी ‘ढील हेरती लड़की’ कविता का पाठ किया। मुंगेर से पधारे युवा कवि कुमार विजय गुप्त ने अपनी कविता में ‘बच्चों की दुनिया’ को सजीव कर दिया। पद्मश्री रवीन्द्र राजहंस ने वर्तमान समय पर चोट किया- ‘आइये दो मिनट मौन रखें। घड़ी की सुइयों को रेंगते हुए निहारें…’। कवियों में सर्वश्री शिवशरण सिन्हा, राकेश प्रियदर्शी, रमेश ऋतंभर, शिवदयाल, मृत्युंजय मिश्र ‘करुणेश’, सुशील ठाकुर, मेहता नगेन्द्र, गोविन्द शर्मा, शकील सासारामी, आसिफ सलीम, राज्यवर्द्धन, परमानंद राम, अजय कुमार मिश्र, एस.बी. भारती, कुमार विजय गुप्त, अमित शेखर, जयप्रकाश मल्ल, विजय प्रकाश, अनिमेष, सुशील ठाकुर एवं ब्रजकिशोर पाठक आदि ने अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ किया। धन्यवाद-ज्ञापन कुमार विजय गुप्त ने किया।

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