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कहां गए श्रीश मुलगांवकर जैसे संपादक

शंभूनाथ शुक्ल : कहां गए श्रीश मुलगांवकर जैसे संपादक! प्रिंट मीडिया के संपादकों के उच्च आदर्शों की यह एक उत्कृष्ट कथा है। इंडियन एक्सप्रेस के चीफ एडिटर थे श्रीश मुलगांवकर। वे प्रगतिशील विचारों के पैरोकार और सामंती परंपराओं के जबर्दस्त विरोधी थे। एक दिन इंडियन एक्सप्रेस के पहले पेज पर एक राजा साहब की पोलो खेलते हुए फोटो छप गई। बस श्रीश मुलगांवकर का पारा गरम।

शंभूनाथ शुक्ल : कहां गए श्रीश मुलगांवकर जैसे संपादक! प्रिंट मीडिया के संपादकों के उच्च आदर्शों की यह एक उत्कृष्ट कथा है। इंडियन एक्सप्रेस के चीफ एडिटर थे श्रीश मुलगांवकर। वे प्रगतिशील विचारों के पैरोकार और सामंती परंपराओं के जबर्दस्त विरोधी थे। एक दिन इंडियन एक्सप्रेस के पहले पेज पर एक राजा साहब की पोलो खेलते हुए फोटो छप गई। बस श्रीश मुलगांवकर का पारा गरम।

वे गुस्से से भरे हुए सुबह ११ बजे बहादुर शाह जफर मार्ग स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग पहुंचे ही थे तभी उन्हें पोर्टिको पर ही पान दबाए न्यूज एडिटर पीलू सक्सेना आते दिख गए। उन्होंने लगभग चीखते हुए पीलू से पूछा कि यह फोटो कैसे छपा? पीलू की हालत खराब क्योंकि फोटो अखबार के मालिक रामनाथ गोयनका (आरएनजी) की सिफारिश पर छपी थी। और रामनाथ जी सामने पोर्टिको की सीढिय़ां चढ़ते हुए आ रहे थे।

डर के मारे पीलू सक्सेना ने कह दिया कि चेयरमैन का आदेश था। बस फिर क्या था, श्रीश मुलगांवकर का पारा और चढ़ गया। तेज आवाज में बोले- पीलू यू नो हू इज द एडिटर? अब बेचारे पीलू क्या बोलें। रामनाथ गोयनका उनके पास आए और सार्वजनिक तौर पर उनसे माफी मांगी। ऐसे आदर्श हैं आज किसी संपादक के पास? इंडियन एक्सप्रेस के चेयरमैन रामनाथ गोयनका ने श्रीश मुलगांवकर को मनाया कि वे अखबार में ही रहें।

मैं जब जनसत्ता आया तब तक श्रीश मुलगांवकर रिटायर हो गए थे लेकिन रामनाथ गोयनका ने अपना वायदा निभाया और उन्हें इंडियन एक्सप्रेस से जोड़े रखा। जब तक श्रीश मुलगांवकर जीवित रहे इंडियन एक्सप्रेस की प्रिंट लाइन में बतौर कंसलटेंट एडिटर उनका नाम छपता रहा। हालांकि मेरे समय वहां चीफ एडिटर जार्ज वर्गीज थे। उनके बाद आए सुमन दुबे फिर अरुण शौरी। उनके बाद का हाल तो सबको पता ही है।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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