चंडीगढ़ : हरियाणा की हुड्डा सरकार ने एक और पत्रकार पर मेहरबानी दिखाई है। इस पत्रकार बंधु को मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का मीडिया कोआर्डिनेटर बनाया गया है। यह पहला मौका नहीं है जब सरकार ने इस प्रकार किसी पत्रकार के प्रति अपनी दयालुता का परिचय दिया है बल्कि हाल ही में दो पत्रकारों के नाम भी सामने आए थे, जिन्हें सूचना आयुक्त
नियुक्त करने की तैयारी चल रही है। ऐसे में एक और पत्रकार को तोहफा देकर सरकार यह दर्शाना चाहती है कि वह मीडिया फ्रेंडली है।
जिस पत्रकार को अब मुख्यमंत्री का मीडिया कोआर्डिनेटर बनाया गया है, वे प्रमोद वशिष्ठ हैं, जो लंबे समय तक दैनिक भास्कर चंडीगढ़ से जुड़े रहे हैं। वशिष्ठ की इस साल अप्रैल में ही दैनिक भास्कर से विदाई हुई थी। हो सकता है चंडीगढ़ में रहकर उन्होंने अपनी खबरों के माध्यम से हुड्डा सरकार के गुणगान किए हों और बदले में उन्हें यह इनाम मिला हो। चर्चा यह है कि इन बंधुवर ने सिटी ब्यूटीफुल यानि चंडीगढ़ में रहकर हुड्डा के कार्यकाल के दौरान अपने कांग्रेसी पत्रकार होने की छवि बनाई थी। भास्कर में इन महोदय ने जो भी समाचार लिखे, उनमें से कांग्रेसी होने की बू साफ आती थी। सुबह अखबार आते ही यह कांग्रेसी बू आनी शुरू हो जाती थी।
हालांकि प्रमोद वशिष्ठ हरियाणा के रहने वाले नहीं हैं, मुझे वरिष्ठ पत्रकार डाक्टर सतीश त्यागी ने जानकारी दी है कि ये महोदय अलवर के रहने वाले हैं। पहले राजस्थान में थे और कई साल से हरियाणा में चंडीगढ़ रहकर कांग्रेस की सेवा कर रहे थे। इसी का इनाम अब जाकर मिला है। कम से कम इतना तो कह सकता हूं कि आज वशिष्ठ को रात को नींद नहीं आएगी व नींद तो प्रदेश के कई और पत्रकारों को भी नहीं आएगी, जो कतार में थे लेकिन मंत्र प्रमोद वशिष्ठ के काम कर गए। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।
हरियाणा सरकार की ओर से प्रमोद वशिष्ठ को वर्ष 2010 में पत्रकारिता के किसी एक पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। अब सरकार ने पत्रकारों को खुश करने के लिए इतने सारे पुरस्कारों की रेवड़ी बांट रखी है कि यह याद नहीं कि पंडित जी वशिष्ठ को कौन सा पुरस्कार मिला था। दरअसल ये पुरस्कार भी पता नहीं क्यों दिए जाते हैं, जिन्हें दिए जाते हैं, वो ही जाने। वे पत्रकार श्रेष्ठ थे या उनकी पत्रकारिता। भई ठीक भी है जो पत्रकार श्रेष्ठ हो और श्रेष्ठ पत्रकारिता करता हो, उसे सरकार की सेवाओं में ले लिया जाए तो इसमें बुरा क्या है। उसका हक भी बनता है सरकारी होना। आगे चुनाव होने हैं, पहले लोकसभा के और फिर हरियाणा विधानसभा के या फिर हो सकता है दोनों चुनाव साथ ही हो जाएं। इसलिए महोदय की सेवाओं की आवश्यकता वहां पड़ेगी। पर कितने आवश्यक साबित होंगे, यह सोचने का विषय है।
पहले सुंदरपाल मुख्यमंत्री हुड्डा के मीडिया एडवाइजर के तौर पर तैनात थे लेकिन पिछले साल अचानक ही उनका दिमाग फिर गया और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। तब वे राज्यसभा सदस्य और टीएमसी नेता केडी सिंह के साथ जुड़ गए। लेकिन नेता बनना रास नहीं आया और वहां से भी जल्द ही भागना पड़ा। भागना शब्द इसलिए इस्तेमाल किया क्योंकि केडी सिंह ने हवा देनी बंद कर दी थी, इसलिए सांस नहीं आ रहा था। अब सांस नहीं आएगा तो व्यक्ति को दम ही घुटेगा न। किसी तरह जुगाड़ कर फिर कांग्रेस में घुसे लेकिन दोबारा वह पदवी नहीं मिली और वह पद आजतक खाली है, जिस पर प्रदेश के कई सोकाल्ड पत्रकारों की नजर है। हो सकता है हुड्डा उस पर भी किसी को जल्द ही बैठा दें। यहां यह बताना जरूरी है कि सुंदरपाल कभी पत्रकार नहीं रहे हैं लेकिन पत्रकारों की सेवाओं का उन्हें इनाम मिला था। अब यह सेवा कैसी थी, इसका तो कभी फिर विस्तार से जिक्र होगा।
दीपक खोखर की रिपोर्ट. संपर्क: 09991680040, [email protected]






