Ravindra Bajpai : जब परिवार में कोई लड़का हाथ से निकलने लगता है तो बड़े बुजुर्ग उसकी शादी करवाकर उसे सांसारिक बन्धनों में बाँध देते हैं। कांग्रेस ने अरविन्द केजरीवाल की सरकार बनवाकर इसी परिपाटी का पालन किया। नतीजा सामने है:: चार दिन में ही दुनियादारी में उलझ गया। मकान, गाड़ी का इंतजाम करने लगा। धीरे धीरे और जिम्मेदारियाँ भी समझ जायेगा। अंत भला तो सब भला।
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केजरीवाल को मुख्यमंत्री के लिए निर्धारित सरकारी सुविधाएं प्राप्त करने से किसी ने रोका तो था नहीं। वे खुद ही आदर्शवाद बघार रहे थे किन्तु विश्वास मत मिलते ही जब सरकार चलाने की जिम्मेदारी सिर पर आ गयी तब बँगला और कार स्वीकार कर ली।
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कल तक जो मीडिया केजरीवाल की शान में कसीदे पढ़ रहा था वही आज उनके 10 कमरों वाले सरकारी बंगले को लेकर उनकी खिंचाई करने में जुट गया है। आम आदमी सरकार के मंत्री इनोवा गाड़ियों में चलेंगे। ऊपर से मनीष सिसोदिया कह रहे है कि सरकारी मकान और गाडी कोई अछूत तो हैं नहीं। इस सादगी पर कौन मरना चाहेगा?
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जब कोई व्यक्ति मर्यादा पुरुषोत्तम होने का दावा करता फिरे तब उसके हर आचरण पर मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींची जाती है। अरविन्द केजरीवाल खुद की बनाई मर्यादाओं की रेखा को लांघ रहे हैं तो फिर किसी? का अपहरण होना तय हैं।
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Ravindra Bajpai : अरविन्द केजरीवाल का स्पष्टीकरण::– हम सरकारी कारों के उपयोग के खिलाफ नहीं हैं बल्कि उन पर लाल बत्ती लगाने के विरोधी हैं।
निष्कर्ष::- घूस के पैसे को हाथ न लगाने का प्रण करने वाले तथाकथित सिद्धांतवादी लोग चिमटे से नोटों की गड्डी उठाकर अपनी कसम की रक्षा करते हैं।
रवींद्र बाजपेयी के फेसबुक वॉल से.






