: काटजू उपनाम के प्रति अदभुत सम्मान है : इस काटजू उपनाम से एक निजी मोह भी है. इसकी एक पृष्भूमि है. काटजू परिवार के किसी व्यक्ति से कोई निजी संबंध न रहते हुए भी, काटजू उपनाम (सरनेम) के प्रति मन में अद्भुत सम्मान है. कैलाशनाथ काटजू स्वतंत्रता सेनानी थे. इलाहाबाद हाइकोर्ट के मशहूर वकील. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे. आजादी के बाद वह ओड़िशा और बंगाल के राज्यपाल बने. उनके पुत्र शिवनाथ काटजू इलाहाबाद हाइकोर्ट में (उम्र लगभग 40 वर्ष) औसत प्रतिभा के वकील थे. ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन (जिसका उत्तर प्रदेश में कारोबार था) के चेयरमैन सर रोबर्ट मेनजीन ने शिवनाथ काटजू को अपनी कंपनी में "बोर्ड आफ डायरेक्टर'' में रखने का प्रस्ताव रखा. शिवनाथ काटजू ने अपने राज्यपाल पिता को, कोलकाता में, पत्र लिख कर सूचना दी. कैलाशनाथ जी ने अपने बेटे को पत्र लिखा, जो इस प्रकार है-
''प्रिय शिवाजी, तुम्हारा पत्र पाकर एक पिता के रूप में गौरव का बोध हुआ. बीआईसी (ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन) में हमारे शेयर बहुत कम हैं. इसलिए कम शेयर के आधार पर तुम्हें बोर्ड आफ डायरेक्टर में रखा जाना, युक्तिसंगत नहीं लगता. संभव है, तुम्हारी योग्यता के आधार पर, यह पद तुम्हें आफर किया गया हो. तब मेरे लिए, यह और भी गौरव की बात है. लेकिन तुम्हारी एक समस्या है, जो तुम्हारे पिता हैं. हालांकि बंगाल में बीआईसी कंपनी का कुछ नहीं है. गवर्नर सिर्फ कॉस्मेटिक पद है. मैं तुम्हारे सम्मान-योग्यता के अनुरूप, किसी अन्य राज्य में तुम्हें ऐसा पद पाते देखना चाहूंगा. अपने गृह राज्य (कैलाशनाथ मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे) में नहीं. मैं जीवन में अपनी पारी खेल चुका हूं. तुम्हारे रास्ते में नहीं आना चाहता. अगर तुम बीआईसी के बोर्ड आफ डायरेक्टर में जाने की सहमति दोगे, तो मुझे सूचना दे देना. मैं राज्यपाल का पद छोड़ कर इलाहाबाद हाइकोर्ट में प्रैक्टिस करने लौट आऊंगा.''
पुत्र शिवनाथ काटजू ने बीआईसी का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया. कैलाशनाथ काटजू बंगाल के गवर्नर बने रहे. राजनीति में यह नैतिक ऊंचाई कैलाशनाथ काटजू ने स्थापित की. इसलिए उनके प्रति मन में अपार सम्मान, स्नेह और आदर है. कई लेखों में यह प्रसंग दोहरा चुका हूं, ताकि लोग जानें कि किस चरित्र और नैतिक आभा के लोग इस मुल्क में हुए. इसलिए न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू का भारतीय प्रेस के बारे में विचार पढ़ा, तो लगा कि वह प्रेस की बीमारी से परिचित हैं. उसी परंपरा के व्यक्ति से?
पर बिहार के बारे में उनके बयान ने कई गहरे और गंभीर सवाल मन में खड़े किये. लगभग 16 वर्षों से प्रभात खबर बिहार में है. पर प्रभात खबर को यह एहसास नहीं है कि नीतीश राज्य में प्रेस पर पाबंदी है. कभी सरकार के किसी व्यक्ति, मंत्री या अधिकारी ने फोन कर यह नहीं कहा, आप ऐसे काम करें और ऐसे न करें. यह छाप दें और यह न छापें. या यह कैसे हुआ, वह कैसे हुआ? जब एक भी घटना ऐसी नहीं हुई, तब बिहार में प्रेस पर पाबंदी या अंकुश या इसके स्वाधीन न होने की बात, कहां से और कैसे खड़ी होती है? वह भी बाहर से?
मैं पत्रकारों के पुराने मूल्यों, मान्यताओं और परंपराओं से बंधा हूं. इसलिए प्रेस काउंसिल के प्रति मन में अत्यंत सम्मान है. संस्कारवश. मूल्यवश. प्रेस काउंसिल के चेयरमैन न्यायमूर्ति पीवी सावंत को प्रभात खबर निमंत्रित कर रांची लाया था. व्याख्यान दिलाने. प्रेस काउंसिल द्वारा तय नियम या मानदंड को हम अखबार में छापते रहे हैं. प्रायः. खास कर चुनाव कवरेज और सामाजिक
समरसता टूटने के समय. अपने पत्रकारों की हर बैठक में प्रेस काउंसिल के गाइडलाइंस की चर्चा करते रहे हैं. उस पर अमल की कोशिश भी.
…जारी….
लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं.





