: सरकारी विज्ञापन : विज्ञापन का प्रसंग न्यायमूर्ति काटजू ने उठाया है. हालांकि यह निजी सूचना है. प्रभात खबर से जुड़ी सूचना है. इसे सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए. पर काटजू साहब के बयान के संदर्भ में यह निजी सूचना सार्वजनिक करना जरूरी है, ताकि स्थिति स्पष्ट हो. आज प्रभात खबर की लगभग चार लाख प्रतियां बिहार में बिक रही हैं. अकेला अखबार है, जो बिहार में चार जगहों (पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर और गया) से छप रहा है. इस अखबार ने गये वर्ष-दो वर्ष में वह मंजिल हासिल की, जहां अन्य घराने 10 से 20 वर्षों में पहुंचे. पर बिहार सरकार के विज्ञापन सिर्फ प्रभात खबर के पटना संस्करण के लिए मिलते रहे हैं. क्योंकि पटना संस्करण को ही मान्यता है.
अब तक मुजफ्फरपुर और भागलपुर, जिन्हें छपते एक- डेढ़ वर्ष से अधिक हो गये, उन्हें मान्यता नहीं मिली थी. मार्च 2012 के तीसरे सप्ताह में केंद्र सरकार से यह मान्यता मिली है. नियम यह है कि केंद्र सरकार का डीएवीपी विभाग (प्रकाशन शुरू होने के छह माह बाद) मान्यता देता है. उसके आधार पर राज्य सरकारें मान्यता देती हैं. तब विज्ञापन मिलता है. कई राज्यों में रसूखदार अखबार समूहों ने प्रकाशन शुरू होते ही, राज्य सरकारों से मान्यता ले ली. उन्हें राज्य सरकार के विज्ञापन मिलने लगे. ऐसा एक प्रसंग तो झारखंड का है.
एक बड़े घराने के अखबार को शुरू होने के महीने भर के अंदर राज्य सरकार ने एक सामान्य रेट तय कर विज्ञापन देना शुरू कर दिया. इस प्रत्याशा में कि केंद्र सरकार (डीएवीपी) की मान्यता मिलते ही भुगतान हो जायेगा और केंद्र सरकार के डीएवीपी द्वारा तय दर को मान्यता मिल जायेगी. राज्य द्वारा प्रदत्त पुरानी दर को संशोधित कर. अविभाजित बिहार के सूचना जनसंपर्क विभाग के नियमों के तहत ही झारखंड सरकार ने यह अग्रिम स्वीकृति-मान्यता दी. केंद्र सरकार के डीएवीपी विभाग से मान्यता मिलने के पहले, ऐसा देश के अन्य राज्यों में भी हुआ है. अपुष्ट सूचना के अनुसार खुद बिहार में 1991-2004 के बीच इसी तरह अखबारों के अलग-अलग संस्करणों को सरकारों ने मान्यता दी है. पर बिहार की मौजूदा सरकार ने यह काम नहीं किया. जो सूचना है, उसके अनुसार आमतौर से यह सरकार मान्य नियमों से डिगना नहीं चाहती. क्या ऐसी स्थिति में हम यह छापें कि यह सरकार नियम-कानून की अवहेलना कर रही है? सूचना के लिए मध्य मार्च में केंद्र सरकार के डीएवीपी विभाग से मुजफ्फरपुर व भागलपुर संस्करणों के सरकारी विज्ञापन रेट स्वीकृत हुए हैं. वह आवेदन बिहार सरकार के संबंधित विभाग को दिया गया है, जो आगे मंजूरी की प्रक्रिया में है.
किसको कितना विज्ञापन केंद्र या राज्य सरकार से मिलता है, इसको परखने या मापने के लिए एक फार्मूला है. विज्ञापन कितना बड़ा है? यानी कितने कालम सेंटीमीटर का है और अखबार का विज्ञापन रेट क्या है? इस विज्ञापन रेट की स्वीकृति केंद्र सरकार से मिलती है. सरकुलेशन के आधार पर. प्रकाशन शुरू होने के छह माह बाद, आप इसके लिए आवेदन करते हैं. पर होते-होते एक-डेढ़ साल लग जाते हैं. केंद्र सरकार जो रेट तय करती है, वही रेट राज्य सरकार भी देती है. रेट को विज्ञापन की जगह (स्पेस) से गुणा कर दें, तो कितने का विज्ञापन मिला, यह साफ हो जायेगा. कई बार भ्रम होता है कि बड़े सरकारी विज्ञापन छप गये, तो अखबारों को शायद अधिक पैसा मिलेगा. यह संभव है कि एक अखबार को उतने ही विज्ञापन का दस हजार मिले और किसी को दस लाख. देश की कई राज्य सरकारें, बाजार दर पर विज्ञापन देती हैं. केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत कम राशि पर नहीं. इसमें दक्षिण के राज्य भी हैं. उत्तर के भी कुछ राज्य हैं, जो अखबार को वाणिज्यिक विज्ञापन की दर पर विज्ञापन देते हैं. यानी बाजार दर पर. जो सरकारी दर से कई गुना अधिक होता है, उसी दर पर विज्ञापन देते हैं.
बंगाल भी बाजार रेट से देता है. पर बिहार या झारखंड जैसी राज्य सरकारें, केंद्र द्वारा स्वीकृत न्यूनतम दर पर ही विज्ञापन देतीं हैं. जिन राज्यों में सरकारें बाजार दर पर विज्ञापन देती हैं, वहां विज्ञापन के माध्यम से सरकारों का खेल चलता है. महाराष्ट्र, दक्षिण के राज्य, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बंगाल में कैसे सरकारी विज्ञापन दिये जाते हैं, यह जानना या पता करना ज्ञानवर्धक होगा. आंध्र से प्रकाशित तेलुगु अखबार "साक्षी" का केस स्टडी होना चाहिए. कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे वाइ राजशेखर रेड्डी के कार्यकाल में उनके पुत्र जगन रेड्डी की कंपनी ने यह अखबार निकाला. 23 जगहों से एक साथ. इस अखबार के उदय की कहानी, योजना और छपने के पूर्व हुए कामों को आप पढ़ेंगे, तो स्तब्ध रह जायेंगे. अब सीबीआइ जांच में रोज नये-नये तथ्य सामने आ रहे हैं कि इस अखबार का उदय कैसे हुआ? कितनी पूंजी लगी? कहां से आयी? सरकारी समर्थन कैसे मिला? यह सब खुलेआम हुआ, पर इस पर किसी सरकारी खेमे से आपने आवाज सुनी? चर्चा हुई? जांच हुई? वहां की सरकार कैसे विज्ञापन देती रही? हर नियम-कानून-परंपरा की धज्जी उड़ा कर.
बेहतर तो यह होगा कि प्रेस काउंसिल केंद्र सरकार को सहमत करे या बाध्य करे कि वे विज्ञापन देने के लिए घोषित मापदंड तय करे. पूरे देश के स्तर पर. उन घोषित मापदंडों के तहत ही अखबारों को विज्ञापन मिले. केंद्र स्तर पर कामनवेल्थ गेम्स के नाम पर बड़े चैनलों को बड़े विज्ञापन मिलते हैं. उनपर एजी रिपोर्ट में चर्चा होती है. कम से कम नये नियमों से यह सब तो बंद होगा. अगर केंद्र सरकार कोई पारदर्शी नियम बना दे, तो सारी राज्य सरकारें उसका पालन करेंगी.
बंगाल में ममता बनर्जी जिस तरह से खुलेआम राजा की तरह शासन कर रहीं हैं, उस पर कहीं कोई सवाल नहीं उठ रहा है. अघोषित रूप से उन्होंने बारह अखबारों को ही विज्ञापन जारी करने के निर्देश दिये हैं. सादे कागज पर. इसका लिखित प्रमाण नहीं मिलेगा. इस सूची में एक ऐसा हिंदी अखबार भी है, जिसके निकलने की अवधि छह माह भी नहीं हुई. कानूनन इसे पहले केंद्र सरकार से मान्यता मिलनी चाहिए थी, तब राज्य सरकार विज्ञापन देती. बंगाल में ममता सरकार खुलेआम भेदभाव कर रही है. पर उनके खिलाफ आवाज नहीं उठ रही है. प्रभात खबर (कोलकाता संस्करण) ने ममता जी के गलत कामों पर लिखा, तो प्रतिद्वंद्वी हिंदी अखबार का विज्ञापन बढ़ गया. राइटर्स बिल्डिंग (बंगाल सरकार का मुख्यालय) से प्रभात खबर को विज्ञापन जारी नहीं होता. इसके बाद प्रतिद्वंद्वी अखबार के मालिक को पहले बंगाल हिंदी अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया. अब उन्हें राज्यसभा भी भेज दिया गया है. पर बंगाल में ही हो रही यह सब चीजें देश में कहीं चर्चा में नहीं हैं.
आज प्रभात खबर देश में सबसे तेजी से बढ़नेवाले अखबारों में से एक है (आईआरएस रिपोर्ट, मार्च के पहले सप्ताह 2012 के अनुसार). देश के सातवें नंबर का हिंदी अखबार. इस सूची में जो टॉप हिंदी अखबार हैं, प्रसार की संख्या से, संस्करण की संख्या से, उनके पास विदेशी पूंजी (एफडीआई) है, शेयर मार्केट का पैसा है. इक्विटी है. एक-एक का बैलेंस शीट निकाल कर देखें. चार से छह सौ करोड़ उनके पास जमा हैं. ये सबसे बड़े घराने हैं. उधर, अखबारों की दुनिया में कागज के भाव बढ़ रहे हैं. लगातार. स्याही व अन्य उपकरण भी महंगे हो रहे हैं. आर्थिक कारणों से विज्ञापन घट रहे हैं. इन सबके कारण प्रभात खबर जैसे मंझोले अखबार या छोटे अखबार लगातार आर्थिक चुनौतियों से घिर रहे हैं. केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत प्रभात खबर, पटना का विज्ञापन रेट काफी कम है. हालांकि आज बिहार और झारखंड मिला कर यह अखबार बहुत मजबूत स्थिति में है. प्रसार संख्या की दृष्टि से. बिहार में रोज लगभग चार लाख के आसपास प्रतियां बिक रही हैं.
बिहार के जिन अखबारों ने 10 से 20 वर्षों में जो मुकाम हासिल किया, उनके आसपास प्रभात खबर सिर्फ एक या दो वर्ष में पहुंचा है. यह सब खुला दस्तावेज है. कोई भी देख सकता है कि सरकार से किन अखबारों को कीमत के अर्थ में कितने का विज्ञापन मिल रहा है? विभिन्न अखबारों को मिलनेवाले विज्ञापन की मात्रा में क्या अंतर है? इस नुकसान का असर हमारी अंदरूनी अर्थव्यवस्था पर है. पर कभी भी इस निजी सवाल को लेकर किसी मंच पर हमने चर्चा नहीं की. न सरकार के किसी व्यक्ति से और न ही ब्यूरोक्रेसी का कोई व्यक्ति कह सकता है कि इस तरह की जेनुइन बातों को लेकर भी किसी के साथ एप्रोच हुआ हो. ये निजी चीजें हैं, जिन्हें हमें सार्वजनिक नहीं करना चाहिए. पर चूंकि बिहार के बारे में इस तरह की टिप्पणी एक जिम्मेवार पद से हुई है, इसलिए हम इन बातों
को सार्वजनिक कर रहे हैं. विज्ञापन के कारण या विज्ञापन के लिए प्रभात खबर का बिहार के प्रति खबरों में स्टैंड तय नहीं होता. यह साफ हो जाना चाहिए कि बदलते बिहार की बात हम छापते हैं. एक कन्विक्शन के तहत. कोई अतिरिक्त लाभ के लिए नहीं.
….जारी…
लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं.





