: न एफडीआई और न शेयर बाजार का पैसा : प्रभात खबर जैसा समूह, जिसके पास न एफडीआई है, न शेयर बाजार का पैसा है. उसकी आर्थिक हालत और चुनौतियों को पाठक नहीं जानते. पग-पग पर आर्थिक कठिनाइयां-चुनौतियां. पड़ोस में, बंगाल से भी प्रभात खबर निकलता है. बंगाल में ममता बनर्जी के सत्तारूढ़ होने से बंगाल के समाज को बड़ी उम्मीदें थीं. पर सत्तारूढ़ होते ही, उन्होंने सत्ता को जिस तरह से निजी जागीरदारी समझ ली है, उससे उम्मीदें टूट रही हैं. हिंदी अखबारों में प्रभात खबर पहला अखबार है, जिसने इस लोक आक्रोश को स्वर दिया. जो चीजें कोलकाता में हो रही हैं. उन्हें प्रमुखता से छापा. लगातार. बलात्कार से लेकर अव्यवस्था की अन्य घटनाएं, उन्हें हमने प्रमुखता से स्वर दिया.
बंगाल में सरकार बाजार दर पर विज्ञापन देती है. बिहार में तो सरकारी दर (बाजार दर से बहुत कम) मिलता है. सरकारी विफलता की खबरों को ममता बनर्जी ने बदनाम करने की साजिश कहा. इसके लिए उन्होंने अपनी एक निजी सूची बना ली है, जिसके तहत वह सिर्फ बारह अखबारों को विज्ञापन दे रही हैं. इस सूची में पिछले 10-12 वर्षों से मान्यता प्राप्त प्रभात खबर नहीं है. हालांकि यहां भी इस मुद्दे को हम सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे. क्योंकि इस देश की व्यवस्था में कमी आ गयी है. किस-किस से शिकायत करें? कहां-कहां करें? हर ताकतवर को नाराज कर आज कोई टिक सकता है. इससे प्रभात खबर को आर्थिक नुकसान हुआ है. पर बंगाल के बारे में यह स्वर नहीं उठ रहा है. क्या बिहार सरकार ने कहीं बंगाल जैसा काम किया है? इसकी सूचना या जानकारी किसी को है? पर बिहार बदनाम हो रहा है.
…तो इंटरनेशनल प्रेस व बड़े लोगों ने क्यों बिहार की प्रशंसा की : बिहार को लेकर दुनिया की मशहूर पत्र-पत्रिकाओं में छपे कुछ अंश पढ़िए. साथ ही विश्वप्रसिद्ध लोगों के विचार भी….
न्यूजवीक, फरवरी, 2010 में छपी रिपोर्ट का अंश… बिहार सदियों से पिछड़ा प्रदेश रहा. कभी यहां स्वर्ण युग था. अंगरेजों के आने के बाद यहां सामंतवाद मजबूत हुआ. आजादी के बाद कई सरकारें आयीं, पर प्रदेश की किस्मत पर ताला लगा रहा. माओवादी हिंसा, जातिवादी सेनाओं का जनसंहार व भ्रष्टाचार ने प्रदेश की संस्थाओं को जर्जर कर दिया. सड़कें बदहाल हो गयीं. पुल ध्वस्त हो गये. गलियों से पार्टियों के दफ्तर व विधानसभा तक अपराधी छा गये. अपहरण ही एकमात्र उद्योग कहलाने लगा. बिहार सचमुच एक विफल प्रदेश बन कर रह गया था. ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली. उन्होंने अपराध को रोका, सड़कें बनवायीं व सबसे अहम काम यह किया कि संस्थाओं को फिर से जिंदा किया. पंचायतों सहित संस्थाओं के कामकाजी होते ही प्रदेश फिर से पटरी पर लौट आया.
अमेरिकी पत्रिका टाइम के नवंबर, 2011 के अंक में छपी रिपोर्ट का अंश : कभी भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में शामिल रहा यह राज्य अब पूरे हिंदुस्तान में सुधारों का मॉडल बन गया है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार को निशाना बना रहे हैं, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा है. नीतीश ने प्रत्येक मंत्री और वरिष्ठ नौकरशाहों से संपत्ति की घोषणा करने के लिए कहा. हाल ही में अवैध संपत्ति अर्जित करने के आरोप का सामना कर रहे एक प्रभावशाली नौकरशाह के घर को प्राथमिक स्कूल में बदल दिया गया.
द इकोनोमिस्ट में छपी रिपोर्ट का अंश… राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने सामाजिक न्याय की केवल बात की, पर कमजोर तबके को कोई वास्तविक लाभ नहीं दिया. जिंदा रहने के लिए बिहारियों के सामने पलायन के सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं था. कइयों की स्थिति अफ्रीकीयों से भी बुरी थी. नीतीश ने अपराध पर लगाम के बाद सड़क, स्कूल व अस्पताल बना कर पूरा माहौल ही बदल दिया.
ग्राहम वाटसन, यूरोपीय देशों के शिष्टमंडल के सांसदों के प्रतिनिधि की टिप्पणी… बिहार में सड़कों की स्थिति कुछ यूरोपीय देशों की सड़कों से भी बेहतर है. यहां हाल के दिनों में काफी सकारात्मक बदलाव हुए हैं.
प्रतिभा पाटील, राष्ट्रपति. 23 मार्च, 2011, विधान परिषद शताब्दी समारोह में — नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार में महिला सशक्तीकरण की दिशा में बेजोड़ काम किया है. पंचायती राज व्यवस्था में 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने से महिलाओं को बहुत लाभ हुआ है. बिहार के विधायकों को पंचायतों को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए प्रयास जारी रखना होगा.
एपीजे अब्दुल कलाम, पूर्व राष्ट्रपति, तीन मई, 2011 को पालीगंज व पटना में— बिहार एक महान सफलता की कहानी है. राज्य की विकास दर आश्चर्यजनक रूप से 11 फीसदी तक पहुंच गयी है. बिहार में भारत के अन्न का भंडार बनने की संभावना है.
अमर्त्य सेन, नोबेल से सम्मानित (छह जुलाई, 2011. पटना)— निश्चित रूप से परिवर्तन के लक्षण दिखे हैं. स्कूलों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है. शिक्षकों की कमी में गिरावट आयी है. विद्यार्थियों की संख्या निश्चित रूप से बढ़ी है और नामांकन अनुपात 98 फीसदी के सुखद आंकड़े तक पहुंच गया है.
फ्रांस की उच्चस्तरीय टीम की टिप्पणी. जनवरी, 2011 में इस टीम ने वैशाली, मुजफ्फरपुर, पूर्व व पश्चिमी चंपारण जिले के ग्रामीण इलाकों में बदलाव का अध्ययन किया… ग्रामीण इलाकों में गरीबी दूर करने, महिला सशक्तीकरण, शिक्षा के प्रसार व स्वास्थ्य के क्षेत्र में तेजी से काम किया गया है, वह पूरी दुनिया के लिए उदाहरण है. दुनिया को बिहार से सीखने के लिए बहुत कुछ है. विकास योजनाओं को पूरा करने में अन्य एजेंसियों के अलावा पंचायतों की अहम भूमिका है.
एक सेकेंड में 250 डॉलर कमानेवाले बिल गेट्स ने पिछले साल पटना के निकट जमसौत गांव के दौरा के बाद यह टिप्पणी की… बिहार की योजनाएं अतुलनीय हैं. राज्य सरकार के साथ मिल कर हम पूरी गति से काम कर रहे हैं. बिहार में गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य सेवा, टीकाकरण के क्षेत्र में बहुत ही शानदार काम किया जा रहा है. इससे पूरी दुनिया को प्रेरणा लेनी चाहिए. बिहार में काम करके मैं बहुत संतुष्ट व खुश हूं. यहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बहुत कम समय में काफी काम किया गया है. आनेवाले दिनों में इसका परिणाम और ज्यादा दिखेगा.
बिल गेट्स के पत्र का अंश, जिसे उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को फरवरी, 2012 के अंतिम सप्ताह में भेजा है… जब मैं 2010 में यहां आया तो आपकी सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सुदूर क्षेत्रों में यूनिसेफ, डब्ल्यूएचओ, रोटरी इंटरनेशनल और स्थानीय संस्थाओं को काम करते पाया. कोसी के इलाके में विषम परिस्थितियों में भी पोलियो उन्मूलन की योजना को अंजाम दिया गया. आपकी क्षमता और लीडरशिप के कारण ही बिहार में यह सब कुछ संभव हो पाया है. मैं उम्मीद करता हूं कि देश और दुनिया की दूसरी सरकारें और लीडर भी आपकी कार्यशैली को सीखेंगे, समझेंगे और उस पर अमल करेंगे.
फोर्ब्स पत्रिका ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 2010 का पर्सन आफ द इयर चुना. उन्हें यह सम्मान दिलाने में पंचायतों को
शक्तिशाली बनाने के उनके प्रयास का बड़ा महत्व है. पत्रिका ने ग्रामीण अंचलों में विकास के नये अध्याय लिखने की सराहना की. फोर्ब्स के अलावा द इकॉनोमिक टाइम्स ने 2009 में उन्हें बिजनेस रिफॉर्मर आफ द इयर चुना था.
…समाप्त…..
लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं.





