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काटजू ने मीडिया की खराब हालत पर बिहार सरकार को चेताया

जस्टिस काटजू ने बिहार सरकार की पोल खोल दी. उन्होंने दो टूक शब्दों में बता दिया कि बिहार में मीडिया आजाद नहीं है. प्रेस कौंसिल का अध्यक्ष बनने के बाद जस्टिस काटजू अपने बयानों के कारण लगातार सुर्ख़ियों में रहे है. कभी उन्हें पत्रकारीय ठसक का विरोधी माना गया तो कभी उन्हें नन मीडिया फ्रेंडली भी कहा गया. मगर जस्टिस काटजू अपने खिलाफ कही गई हर बातों को बेफिक्री से लेते रहे. बिलकुल अपने धुन में. अभी दो दिन पहले उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा, पत्र क्या लिखा बल्कि ये भी पूछ लिया कि सरकार की बर्खास्तगी के लिए क्यों ना राज्यपाल को सिफारिश कर दी जाय.

जस्टिस काटजू ने बिहार सरकार की पोल खोल दी. उन्होंने दो टूक शब्दों में बता दिया कि बिहार में मीडिया आजाद नहीं है. प्रेस कौंसिल का अध्यक्ष बनने के बाद जस्टिस काटजू अपने बयानों के कारण लगातार सुर्ख़ियों में रहे है. कभी उन्हें पत्रकारीय ठसक का विरोधी माना गया तो कभी उन्हें नन मीडिया फ्रेंडली भी कहा गया. मगर जस्टिस काटजू अपने खिलाफ कही गई हर बातों को बेफिक्री से लेते रहे. बिलकुल अपने धुन में. अभी दो दिन पहले उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा, पत्र क्या लिखा बल्कि ये भी पूछ लिया कि सरकार की बर्खास्तगी के लिए क्यों ना राज्यपाल को सिफारिश कर दी जाय.

क्या आपने या हमने सोचा था कभी कि प्रेस कौंसिल (जो आमतौर पर असक्रियता के लिए कुख्यात रहता था) उस संस्था का अध्यक्ष किसी राज्य के मुख्यमंत्री को इतनी तल्ख़ चिट्ठी लिख सकता है? आंकड़ों के अनुसार पिछले दस वर्षों में 800 पत्रकार सिर्फ महाराष्ट्र जैसे एक राज्य में पीड़ित रहे हैं. आखिर क्या गलत कहा जस्टिस काटजू ने? ऐसी लापरवाह और गैर जिम्मेदार सरकार को तो निश्चित रूप से बर्खास्त कर देना चाहिए.

मगर आज जस्टिस काटजू ने पटना विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में बिहार सरकार की कान काट दी. बकौल काटजू, भले ही बिहार में कानून व्यवस्था ठीक हो रही हो, परन्तु मीडिया के हालात ठीक नहीं हैं. उनके बयानों से साफ़ पता चलता है कि बिहार की मीडिया में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. सत्ता और शासन के दबाव में बिहार के पत्रकारों की हालत बड़ी ख़राब हो गई है. जिस-जिस पत्रकार ने नीतीश सरकार के खिलाफ कलम खोला, उनके कलम बंद कर दिए गए. कइयों की तो नौकरी तक चली गई, कई बड़े और चर्चित पत्रकारों को नीतीश के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा. कहते हैं कलम व्यवस्था बदलती है परन्तु बिहार में व्यवस्था ने कल्मौर कलमकारों को बदल दिया. नीतीश ने मीडिया को चुनौती दी. पत्रकारों को सीधे-सीधे दबाव में लेने के साथ-साथ संस्थानों के मालिकों पर दबाव बनाया गया कि यदि सरकार की छवि किसी ने बिगाड़ी तो विज्ञापन बंद.

बिहार में तो नीतीश के शुरुआती कार्यकाल के दौरान कुछ संस्थानों ने सरकार के खिलाफ लिखा तो उसका खामियाजा आज तक वह संस्थान उठा रहा है. आन्दोलन और क्रांति के दावे करने वाले अख़बारों की हवा तक निकल गई. यहाँ तक कि सरकार के विरुद्ध फेसबुक पर मोर्चा खोलने वालों तक की नौकरी लील ली इस सरकार ने. सरकार ने सभी हथकंडे अपनाए ताकि बिहार की छवि चमकदार दिखती रहे, चाहे सच इससे कोसों दूर क्यों न हो. मगर सरकार यह  भूल गई कि झूठी छवि बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चलती. सच्चाई कुरूप क्यों ना हो, स्वीकार तो करना होगा. जस्टिस काटजू ने बिहार में चल रहे इस अलोकतांत्रिक व्यवस्था पर जांच कि मांग की है. अब बिहार की झूठी छवि दिखा रहे लोगों को सावधान होना चाहिए क्योंकि जस्टिस काटजू आ चुके हैं. जस्टिस काटजू आपको सलाम!

लेखक अनंत झा बिहार के युवा व प्रतिभाशाली पत्रकार हैं.

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