गत शुक्रवार कानपुर में जूनियर डॉक्टरों के साथ हुयी बर्बर पुलिसिया कार्यवाही के बाद सपा विधायक इरफ़ान सोलंकी आज जी न्यूज पर बार बार एक बात जोर देकर कह रहे थे कि मेरी दो गाड़ियाँ भीड़ ने तोड़ दीं| ये डॉक्टर नहीं गुंडे हैं गुंडे! लेकिन सवाल यह कि क्या दो गाड़ियों के टूटने का बदला किसी की जान लेकर लिया अथवा उसकी निर्ममतापूर्वक तरीके से पिटाई करवाकर लिया जायेगा? सपा विधायक ने यह भी कहा कि मेरे सर पर चोट लगी थी और तीन टाँके आये थे! अगर वास्तव में ऐसा है तो क्या विधायक ने अपना मेडिकल करवाया?
मेडिकल साइंस में ऐसा कौन सा नया चमत्कार होने लगा जिससे तीन टाँके मात्र तीन दिन में ठीक हो जायें और उनका एक भी निशान शरीर पर न रहे| यदि चोट इतनी ही गंभीर थी कि सर पर टाँके लगाने पड़े तो फिर उस स्थान के बाल क्यूँ नहीं काटे गये डॉक्टरों द्वारा? मात्र तीन-चार दिन में ही टाँके काट भी दिए गये जबकि इतने दिनों में कोई जख्म पूरी तरह भर जाये ऐसा सुनने में थोडा अजीब लगता है| सवाल कई हैं और जाहिर सी बात है कि इनका कोई जवाब इरफ़ान सोलंकी के पास नहीं है| समाजवाद, समाजवादी विचारधारा और लोहिया के आदर्शों यदि इन सबका ध्यान विधायक जी को रहता तो ये पूरा प्रकरण शायद होता ही नहीं|
पहले विधायक और जूनियर डॉक्टरों के बीच तूतूमैंमैं एवँ हाथापाई हुयी और उसके बाद दिखाई दिया पुलिसिया तांडव| सत्ता पक्ष के विधायक को खुश करने के लिए पुलिस द्वारा डॉक्टरों के साथ जिस प्रकार से बर्बरता को अंजाम दिया गया वह निंदनीय है| डॉक्टरों को घेर कर- दौड़ा दौड़ाकर पीटा गया, न विकलांग को देखा और न ही नाबालिग को ! बस जो दिखा उसे मारा| कार्यवाही को ऐसे अंजाम दिया गया जैसे कि शातिर मुजरिमों के किसी गिरोह को पकड़ने/काबू करने में लगे हैं ये| इस बर्बर कार्यवाही में कई गंभीर रूप से घायल हुये और कितने ही चुटैल हुये| इतने पर भी मन न भरा तो कईयों को पकड़कर हवालात में ठूंस दिया गया|
इस बर्बर काण्ड पर प्रतिक्रिया एवँ विरोधस्वरूप कानपुर के डॉक्टरों ने हड़ताल का ऐलान कर दिया और जैसे ही इस बर्बर काण्ड की जानकारी राज्य के अन्य शहरों में फ़ैली वैसे ही इनके समर्थन में अन्य शहरों के डॉक्टरों ने भी हड़ताल का ऐलान कर दिया| शुरुआत हुयी थी एक शहर से लेकिन डॉक्टरों का आन्दोलन पहले राज्यव्यापी हुआ और अब यह देशव्यापी होने लगा है| अन्य राज्यों के डॉक्टरों ने भी कानपुर के डॉक्टरों को अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया है| वर्तमान में राज्यभर में मेडिकल व्यवस्थाएं बुरी तरह चरमरा गयीं हैं और इन सबका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है उस लाचार बेक़सूर मरीज पर जिसका इस पूरे प्रकरण से कोई लेना देना ही नहीं है|
इलाज के अभाव में कितने ही मरीज परेशान हैं और कई अपनी जान भी गँवा चुके हैं| एक ही मार्ग बचता है इनके पास और वो है निजी अस्पतालों में जाने का जिनका खर्चा उठाने की हैसियत इनमे से हर किसी की नहीं है| लेकिन सरकार को फिलहाल कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ा है| तीन-चार दिनों के बाद राज्य के स्वास्थ्यमंत्री का बयान आया है कि “हड़ताल दुर्भाग्यपूर्ण है, पूरे प्रकरण की जाँच करवाएंगे” | ये भी खूब है, कोई त्वरित कार्यवाही नहीं जबकि तमाम न्यूज चैनलों, सोशल साइट्स पर पूरे प्रकरण से सम्बंधित वीडियो देखे जा सकते हैं जिनमे कानपुर एसएसपी भी ऐसे शब्द कहते दिखाई दे रहे हैं जोकि एक जिम्मेदार अफसर को नहीं कहने चाहिए थे, दिखाई दे रहा है कि कैसे पुलिसवाले वहाँ एकपक्षीय कार्यवाही को अंजाम देते हुये तांडव मचा रहे थे|
इसके बावजूद ये कहते हैं कि जाँच करवाएंगे| “मुद्दई भी तुम मुंसिफ भी तुम अदालत भी तुम्हारी है, हमें पता था कसूर हमारा ही निकलेगा” जब मुख्यारोपी ही आपके विधायक एवँ विशेष कृपापात्र पुलिसकर्मी हैं तो फिर जाँच करेगा कौन और नतीजा क्या होगा उसका यह एक बड़ा सवाल है? जो कुछ हुआ वह बहुत ही गलत हुआ और उसके परिणाम/प्रतिक्रियास्वरूप अब जो हो रहा है वह भी| प्रशासन अड़ा है-डॉक्टर तने हैं और पिस रहा है गरीब और लाचार मरीज!
इस मामले पर पत्रकार Ashwini Sharma फेसबुक पर सटीक टिप्पणी करते हुए लिखते हैं: यूपी में डाक्टरों की हड़ताल से मरीज़ मर रहे हैं लेकिन अखिलेश यादव सो रहे हैं। डाक्टरों के साथ मारपीट करने के आरोपी विधायक सोलंकी और एसएसपी यशस्वी यादव के खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। क्या यूपी में गुंडाराज कायम हो गया है? जिस जनता ने तुम्हें गद्दी पर बिठाया उस पर ही अत्याचार ना करो सपा वालों। राज्य के विकास पर ध्यान देने की बजाय अराजकता फैलाने पर यही जनता आगामी चुनाव में दंड देगी।
लेखक विनोद भारद्वाज वरिष्ठ पत्रकार हैं| वे “ताज प्रेस क्लब, आगरा” के अध्यक्ष एवँ दैनिक जागरण आगरा के सम्पादकीय प्रभारी-डीएनई रह चुके हैं| उनसे संपर्क +91-9837074023 के जरिए किया जा सकता है।
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