संतरविदास नगर भदोही के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी के मामले में कानूनी डंडे के सहारे सच छिपाने की हर हथकंडे आजमा चुकी पुलिस अब न्यायालय को भी गुमराह करने में जुट गई है.
हाईकोर्ट नोटिस जवाब में पुलिस ने बगैर सबूत दो टूक में कहा है भदोही में दंगा या हिंसा की घटना हुई ही नहीं है और न ही अवैध बालू खनन. इतना ही नहीं गुंडा एक्ट, जिलाबदर व सरेराह मार-पीटकर घर-बार लूटे जाने सहित सभी आरोपों को डिनाई कर-कहा पुलिस एवं प्रशासनिक कार्रवाई कानून के दायरे में की गयी है.
अपने काले कारनामों से चौरतरफा घिरी व जनता सहित मीडिया में हो रही किरकिरी को देखते हुए पुलिस ने गांधी को पत्रकार न होने की बात कह कर घर-बार लूटने वाले माफियाओं की अब खुद पैरवी करने में अपने को सेफ समझ रही है. हर घटनाओं की तरह अपनी दादागिरी के बूते पत्रकार की उत्पीड़नात्म घटना को भी ठंडे बस्ते में दफन कर देना चाहती है, लेकिन शायद भूल गयी कि एक दशक पूर्व बाहुबलि सांसद धनंजय सिंह के नाम पर सरेराह एनकांउटर में चार निर्दोष युवकों की हत्या के मामले में 36 पुलिसकर्मियों को जेल के सलाखों में ढकलने सहित दलित महिला संतोषी बलात्कार कांड के आरोपी को अपनी कलम के ताकत पर न सिर्फ जेल भेजवा चुके गांधी किसी भी हाल में पीछे नहीं हटने वाले. न्यायालय में विश्वास व इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले गांधी का दावा है कि वह पूरे दमखम के साथ पुलिस व प्रशासनिक ज्यादितियों का मुकाबला करेंगे.
पूर्वांचल के ईनामी माफियों के शरणदाता व बाहुबलि विधायक व माफियाओं के समर्थन से चल रही सपा के गुंडों को पनाह देने वाली पुलिस के शायद जेहन में नहीं है कि पिछले 16 सालों में दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तान, जनसंदेश टाइम्स व आज तक टीवी न्यूज में बाईलाइन छपी खबरों के अलावा हजारों ससमसामयिक आर्टिकल व वीडियो फुटेज व अन्य घटनाओं समेत दूरसंचार कार्यालय, इनकम टैक्स, बैंक, एलआईसी के अभिलेखों आदि में अंकित व पूर्व के आरोपों में विभिन्न न्यायालयों व जनसूचना विभाग से जारी कार्डों आदि प्रमुख साक्ष्यों को कैसे हजम करेंगे. हाईकोर्ट के स्थगन आदेश व जिला न्यायालय से मिली जमानत के आदेशों की प्रतियों को कैसे फूकेंगे. जिन तीन मुकदमों को आधार बनाकर गुंडाएक्ट व जिलाबदर किया गया है उसमें खुद पुलिस ने आरटीआई रिपोर्ट में मुकदमों को खत्म होने की बात कही है. गत 25 नवंबर 2012 को भड़की हिंसा के दौरान दोनों पक्षों की रिपोर्ट व गिरफतारी जैसे साक्ष्य पुलिस व प्रशासनिक लापरवाहियों को उजागर करती घटनाएं किस कब्रगाह में दफन करेंगे.
यह सवाल आज भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है. दरअसल, वर्ष 2012 में तत्तकालीन जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी व पुलिस अधीक्षक अशोक शुक्ला के कार्यकाल में एक के बाद एक आपराधिक व हिंसक घटनाएं होती रही और बाहुबलि विधायक के बालू खनन से लेकर सड़कों के निर्माण में धांधली, जबरन प्रमुख कुर्सी पर कब्जा, पूर्वांचल के ईनामी माफियाओं से साठ-गांठ आदि काले कारनामें समाचार पत्र प्रकाशित व चैनल में समय-समय पर चलने से पत्रकार सुरेश गांधी से पुलिस व प्रशासन कुपित थी. खासकर 25 नवंबर 2012 मुहर्रम के तीन दिन पहले दरोपुर व घमहापुर में ताजिया रास्ते के विवाद को लेकर छपी खबर के बाद भी एलर्ट होने के बजाएं प्रशासनिक लापरवाही से भड़की हिंसा व तोड़फोड़ की घटना पेपर की सुर्खियां बनने से हुई छिछालेदर से डीएम एसपी काफी खफा हो गए थे.
महाशिवरात्रि के दिन अलसुबह हुए विस्फोट और कोतवाल संजयनाथ तिवारी की लापरवाही की खबर छपने के बाद पुलिस ने सारी सीमाएं लांघकर श्री गांधी के खिलाफ बिना किसी अपराध के गुंडाएक्ट व जिलाबदर की कार्यवाही की. इस बाबत श्री गांधी ने 23 मार्च 2013 को दोपहर मे एसडीएम न्यायालय में अपना जवाब दाखिल किया कि पुलिस द्वारा दर्ज की गई की कार्यवाही के तीनों मुकदमों मे पुलिस ने खुद फाइनल रिपोर्ट लगाई है या वह न्यायालय से दोषमुक्त है, तो कोतवाल संजयनाथ तिवारी ने मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता निवासी काजीपुर रोड भदोही को साजिश मे लेकर रंगदारी मांगने की झूठी रिपोर्ट दर्ज कर दी. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दो साल से गांधी किराए पर रहते है और किराया नहीं देते. 23 मार्च को काजीपुर रोड स्थित मकान मालिक के घर में घुसकर मारपीट कर 5 लाख की रंगदारी मांगी. रंगदारी न देने पर जानसे मारने की धमकी दी. इस झूठी रिपोर्ट में पुलिस ने बिना छानबीन किए दो और पत्रकारों का नाम दर्जकर मकान मालिक के चहेतों की गवाही लेकर चार्जशीट लगा दी. सवाल यह कि श्री गांधी उस मकान में पिछले 15-16 सालों से रह रहे है. तभी से नाम व पते जगह-जगह सरकारी अभिलेखों समेत प्राइवेट संस्थानों में दर्ज है. अगर गांधी ने 23 मार्च को मकान मालिक के घर गए तो काल डिटेल के साथ ही मोबाइल लोकेशन आदि की छानबीन क्यों नहीं की गयी. जो व्यक्ति पिछले 16 सालों से पत्रकारिता कर रहा हो और तमाम प्रशासनिक आफिसर आए और चले गए तब किसी को गांधी गुंडा नजर नहीं आएं. किसी से रंगदारी नहीं मांगी और न ही किसी भी जनता ने कोई मुकदमा ही लिखाया. तो फिर अचानक तत्कालीन अफसरों की निगाह में कैसे गुंडा बन गया और सप्ताहभर में गुडांएक्ट की कार्यवाही कर जिलाबदर कर दी.
खास बात तो यह है कि किराए को लेकर मकान मालिक से विवाद था तो पहले क्यों नहीं रिपोर्ट लिखी गयी रपट उस उक्त लिखी गयी जब पुलिस के झूठे गुंडाएक्ट की कार्रवाई पर श्री गांधी ने एसडीएम न्यायालय में चैलेंज किया.
पत्रकार गांधी जब गुंडाएक्ट व जिलाबदर के चलते जनपद से बाहर थे तो 7 मई 2013 को मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता पुत्र स्व. बाकेलाल निवासी काजीपुर रोड आदि ने कमरे का ताला तोड़कर विज्ञापन के 1.5 लाख नगद, जेवर, जरूरी कागजजात व तमाम साक्ष्य उठा ले गये. इस दौरान जब सायंकाल पत्रकार की पत्नी कमरे पर पहुंची तो पुलिस संरक्षण प्राप्त हौसला बुलंद मकान मालिक ने धमकी भी दी कि अभी तो नगदी, जेवर समेत रुपया व कागजात ले जा रहे है यदि तुम लोगो ने मेरा कमरा नहीं छोड़ा तो ताला तोड़कर फिर से सारा सामान उठा ले जायेंगे और बेघर कर देंगे, मेरा कुछ नहीं होगा क्योंकि मेरी कोतवाल संजयनाथ तिवारी से सेटिंग है और कोतवाल से मिलकर तुम्हारे पति का भी हाथ-पैर तोड़वा देंगे.
इसकी सूचना पत्रकार की पत्नी रश्मिी गॉधी ने कोतवाली से लेकर एसपी तक को दी, लेकिन रिपोर्ट दर्ज करना तो कोतवाल संजयनाथ तिवारी ने उनकी पत्नी को धमकी दी कि तुम्हारा पति बड़का पत्रकार है उसका हाथ-पैर तो तोड़ेंगे ही तुम भी कहीं कि नहीं रह जाओगी और कोतवाली से डाटकर भगा दिया. 30 मई 2013 को लूट की प्रार्थना पत्र तैयार कर पहली जून 2013 को सुबह सीजीएम न्यायालय मे 156 (3) जाब्ता फौजदारी के अंतर्गत याचिका दायर की और सुबह 10 बजे कमरे पर आकर अपनी मौसी के बेटे के शादी मे शामिल होने के लिए रांची चले गये. उसी दिन पुलिस की मौजूदगी मे शाम 4 बजे मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता आदि कमरे का ताला तोड़कर 15 साल से तिनका-तिनका जुटाई गई 20 लाख से भी अधिक की संपत्ति व विवाह में मिले सामानों व जेवरात आदि लूट ले गए. फर्जी मुकदमों में हाईकोर्ट के स्थगन आदेश के बाद भी पत्नी को दी गयी धमकी को सच करने की नियत से 13 जून की शाम साढ़े 5 बजे स्टेशन रोड पीएनबी बैंक के पास से श्री गांधी को पकड़कर कोतवाल व उसके हमराहों ने सरेराह मारपीटकर बेइज्जत किया. जनता के भारी विरोध व डीजीपी के हस्तक्षेप पर 4 घंटे बाद तो तो छोड़ दिया लेकिन 14 जून को एक और फर्जी मुकदमा दर्ज करने के साथ ही पुलिस ने मकान मालिक द्वारा गलत तरीके से दर्ज मुकदमें में चार्जशीट लगा दी. इस उत्पीडन की शिकायत श्री गांधी ने कोतवाली पुलिस से लेकर मुख्यमंत्री, डीजीपी, आईजी, डीआईजी व एसपी को दी, लेकिन रिपोर्ट दर्ज नहीं की गयी. अब जब सुरेश गांधी व उनकी पत्नी की अलग-अलग प्रार्थना पत्र में जिला न्यायालय के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 156(3) के तहत रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया तो मजिस्ट्रेट के आदेश पर पुलिस ने मुकदमा तो दर्ज कर लिया, लेकिन माफियाओं के दवाब में कार्यवाही नहीं कर रही. आरोपी खुलेआम घुम रहे है. लूटे गए सामानों की पुलिस बरामदगी नहीं कर रही है और जब दायर याचिका के मामले में हाईकोर्ट ने प्रमुख गृह सचिव समेत डीएम, एसपी व कोतवाल से जवाब मांगा है तो न सिर्फ गांधी को पत्रकार न होने व लूटपाट न होने सहित कई भ्रामक रिपोर्ट देकर लूटपाट के आरोपी मकान मालिक को बचाने में जुट गयी है. पत्नी रश्मि गांधी के बयान दर्ज करने के बजाएं पुलिस के खिलाफ न बोलने की धमकी दे रही है. श्री गांधी का कहना है कि उत्पीड़नात्मक कार्रवाई के दौरान से ही उच्चाधिकारियों समेत उच्च न्यायालय से अपने आवेदनों के जरिए कह चुके है कि पुलिस अपनी खामियों को छिपाने के लिए ही कार्रवाई कर रही है जो अब पुलिस अपने बचत में खामियों को छिपाकर न्यायालय को गुमराह कर रही है. जवाब में पुलिस कह रही है कि भदोही में हिंसा का घटना हुई ही नहीं है. केवी टेन पर पथराव व 25 नवंबर को तोडफोड हुई ही नहीं है. बालू खनन सहित खुलेआम गुंडागर्दी व अपराध की घटनाएं नहीं हो रही हैं. पुलिस की इस कार्रवाई न सिर्फ बच्चों की पढाई लिखाई चौपट हो रही है बल्कि श्री गांधी अपनी पत्रकारिता भी नहीं कर पा रहे हैं.

