प्रिय यशवंत भाई, काफी दिनों से काम की व्यस्तता के कारण आज भड़ास खोला…तो पता चला कि भाई यशवंत जेल की हवा खा रहे हैं…एक बार तो दुख हुआ कि संकट की इस घड़ी में मैं यशवंत के साथ नहीं हूं… लेकिन जब पूरी कहनी पढ़ी तो यशवंत पर गर्व भी हुआ… क्योंकि विनोद कापड़ी जैसे जिनका खुद का कोई चरित्र ही नहीं है वो दूसरों का चरित्र उछालने की बात कर रहे हैं… अरे कापड़ी साहब कम से कम दूसरों पर लांछन लगाने से पहले अपने गिरेबान में तो एक बार झांक लेते.
लेकिन कोई बात नहीं यशवंत भाई… इतने बड़े समुद्र में कापड़ी जैसी छोटी-मोटी लहरें तो हिचकोले खाती ही रहती हैं….ये तुमको डूबो नहीं सकती… जिस मिशन को लेकर तुम चल रहे हो… उसकी मशाल कभी बुझने मत देना…. पहाड़ से जब आंधी टकराती है तो उसको ये गलतफहमी हो जाती है कि वो पहाड़ को उखाड़ फेंकेगी… लेकिन वो ये नहीं जानती कि पहाड़ को कोई नहीं उखाड़ सकता.. आंधी को ही अपना रूख बदलना पड़ता है…. तो ये कापड़ी और उनकी मैडम साक्षी वो आंधी है जो जल्दी ही अपना रूख बदल लेंगी.
रामवीर सिंह डागुर
सिंगापुर
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