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कामरेडम् शरणम् गच्छामि?

यह दौर मैसेजिंग का है। हर कोई एक- दूसरे को संदेश देने में लगा है। संदेश देने में सुविधा भी है। यहां संवाद की तरह तुरंत पलटवार की गुंजाइश नहीं होती। बस चलते-फिरते किसी के भी सिर पर एक संदेश ठोंक दिया और आगे बढ़ लिये। इसलिये हर तरफ से संदेशों की बौछार-सी है, बस संदेश देने के तरीके जुदा-जुदा हैं। अन्ना हजारे राजघाट जाकर संदेश देते हैं, तो जरदारी अजमेर जाकर। राहुल गांधी दलितों के घर खाना खाकर मैसेज देते हैं और वोटर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाकर। थियेटर करने वाले नाटकों के जरिये मैसेज देते हैं।

यह दौर मैसेजिंग का है। हर कोई एक- दूसरे को संदेश देने में लगा है। संदेश देने में सुविधा भी है। यहां संवाद की तरह तुरंत पलटवार की गुंजाइश नहीं होती। बस चलते-फिरते किसी के भी सिर पर एक संदेश ठोंक दिया और आगे बढ़ लिये। इसलिये हर तरफ से संदेशों की बौछार-सी है, बस संदेश देने के तरीके जुदा-जुदा हैं। अन्ना हजारे राजघाट जाकर संदेश देते हैं, तो जरदारी अजमेर जाकर। राहुल गांधी दलितों के घर खाना खाकर मैसेज देते हैं और वोटर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाकर। थियेटर करने वाले नाटकों के जरिये मैसेज देते हैं।

विनोद दुआ जमकर खाते हैं और खाते हुए ‘देश के लिये खाने’ का मैसेज देते हैं। सरकारें लोगों को सड़कों में ला पटकने वाले कानून बनाकर आम जनता को मैसेज देने में लगी हैं और अतिवादी-आतंकवादी बम के धमाकों से सरकारों को मैसेज देने में लगे हैं। शिवसेना -मनसे वालों को जब अपने ‘मराठी मानुषों’ को संदेश देना होता है तो यह शुभ कार्य किसी निरीह टैक्सी वाले को पीटकर संपन्न किया जाता है। बिला-नागा महीने में एकाध बार ममता भी कांग्रेस को मैसेज देती हैं। जब सारी दुनिया मैसेज देने में लिप्त हो तो बाबा रामदेव कैसे पीछे हट सकते हैं? उड़ती-उड़ती खबर है कि उन्होंने एक बार फिर से देश की जनता और दिल्ली दरबार को मैसेज देने का मन बना लिया है- इस बार कुछ नये तरीके से।

1 मई को मजदूर दिवस है। नव-उदारवाद की नीतियों ने बचे-खुचे मजदूरों और मजदूर आंदोलनों के लिये केवल आत्महत्या का विकल्प छोड़ा है। इसीलिये पिछली 28 फरवरी को देशभर के मजदूरों ने पार्टी लाइन को तोड़कर एक साथ हड़ताल की। कांग्रेस और भाजपा से लेकर वामदलों के समर्थक सभी मजदूर संगठन एक मंच पर आये। हालांकि 28 तारीख को मीडिया के पास इतनी बड़ी खबर के लिये स्पेस की कमी थी। वे पता नहीं कौन से कप में एक दूसरे दर्जे की क्रिकेट टीम से जीत का जश्न मना रहे थे। किसी ने खबर दी भी तो वही नकारात्मक विचारों के साथ कि हड़ताल से आम आदमी का नुकसान होता है, लोगों को परेशानी होती है, वगैरह। कनाट प्लेस में कार से उतरने वाले का इंटरव्यू भी कर लिया जो हड़तालियों को सबक सिखाने की बात कर रहा था। मोटे तौर पर सभी चैनलों में अब इस बात पर आम सहमति-सी है कि हड़ताल से देश का नुकसान होता है। किसी चैनल ने यह बहस नहीं चलायी कि आखिर यह अजूबा कैसे हो गया कि धुर वामपंथी और उग्र दक्षिणपंथी मजदूर संगठन एक मंच पर कैसे आ गये? सीधी-सी बात है कि जब मीडिया में अंबानियों का धन लगेगा, तब धुन तो उनकी ही बजेगी। कोई बेवकूफ ही होगा जो मजदूरों के सरोकारों की बात करेगा। लेकिन सवाल यह है कि इस विमर्श का बाबा रामदेव से क्या लेना-देना है?

सूत्रों का कहना मानें तो बाबा रामदेव इस बार अपने आंदोलन की सीढ़ियां मजदूरों को बनाने जा रहे हैं और जब आंदोलन में मजदूरों का इस्तेमाल करना है तो जाहिर है कि मजदूरों को एक मैसेज भी देना होगा। यह मैसेज देने के लिये 1 मई की तारीख उपयुक्त हो सकती है। रहा सवाल स्थान का कि किस नगर या किस जगह से मजदूरों को मैसेज देने पर उसका प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है? अगर सूत्रों की खबर सही है तो मानना होगा कि बाबा ने होमवर्क बहुत बढ़िया किया है। बाबा रामदेव शहीद शंकर गुहा नियोगी की कर्म-स्थली दल्लीराजहरा (छत्तीसगढ़) से अपने अभियान की शुरूआत कर सकते हैं जो 3 जून को उनके प्रस्तावित अनशन से कोई 1 महीने पहले मजदूर दिवस में प्रारंभ होगी और फिर वे ‘‘मजदूरों में अलख जगाते हुए’’ देश भर का दौरा करेंगे। गौरतलब है कि पिछली बार उन्होंने ‘भारत स्वाभिमान यात्रा’ के नाम पर अलख जगायी थी और इस बार उन्होंने ‘राष्ट्रीय आंदोलन समिति’ जैसा कुछ तैयार किया है, जिसकी घोषणा उन्होंने पटना के एक प्रेस कांफ्रेन्स में की थी।

सवाल है कि बाबा रामदेव का मजदूरों से क्या लेना-देना है? मजदूर दिन भर हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं इसलिये उन्हें बाबा के योग की जरूरत नहीं होती। उनके पास इतने पैसे नहीं होते कि वे बाबा की गुरूजी ठंडाई पी सकें। सरकारी अस्पतालों में जहां मजदूर इलाज के लिये जाते हैं वहां बाबा के पतंजलि की दवायें नहीं होतीं। मजदूरों के घरों की महिलाओं में भी इतनी कूवत नहीं है कि वे बाबा के ब्यूटी पार्लर में जाकर अपना सौंदर्यवर्द्धन कर सकें। बाबा का मजदूरों से वही रिश्ता हो सकता है जो एक कारोबारी का अपने नौकर से होता है, क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करने वाला बाबा का कारोबर और टर्नओवर अपने-आप में किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी से कम नहीं है। बाबा का मजदूरों से वही रिश्ता हो सकता है जो एक शोषक का शोषित से होता है और इस बात को लेकर पहले भी बाबा विवाद में आ चुके हैं। उनकी दवा कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों के हितों की रक्षा न हो पाने का आरोप वृंदा करात लगा भी चुकी हैं, पर ज्यादातर चैनलों ने बाबा का पक्ष लिया क्योंकि टीआरपी उनसे बनती है, मजदूरों से नहीं।

शंकर गुहा नियोगी की कर्म-सथली से इस अभियान की शुरुआत की सुगबुगाहट मुझे बेहद अंदरूनी सूत्रों से मिली है। यह भी खबर है कि छत्तीसगढ़ में भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारियों ने स्वर्गीय नियोगी की पत्नी व पुत्र से मिलकर बाबा की मंशा के बारे में उन्हें अवगत कराया है और बताया जा रहा है कि नियोगी के परिवारजनों ने इस बात पर अपनी सहमति जतायी है। यह खबर अगर सच है तो यह नियोगी की विरासत का बहुत बड़ा अपमान होगा, इसलिये मैं दिल से दुआ कर रहा हूं कि बाबा राजहरा न आयें भले ही यह खबर असत्य साबित हो जाये।     

भारत के मजदूर आंदोलनों के परिदृश्य में शंकर गुहा नियोगी एक बहुत बड़ा नाम है। मजदूर आंदोलनों की चिर-परिचित कार्यशैली के उलट उन्होंने बहुत सारे नये व सफल प्रयोग किये। उनके आंदोलन की सफलता को इसी बात से समझा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ के कतिपय पूंजीपतियों ने उन्हें रास्ते से हटाने का मन बना लिया। जब नियोगी अपने कमरे में सो रहे थे, हत्यारे ने खिड़की से गोली दाग दी। मुझे याद पड़ता है कि अविभाजित मध्यप्रदेश में सुंदरलाल पटवा भाजपा के मुख्यमंत्री थे और तब रामराज की बातें चला करती थीं। तो ऐसे रामराज में जहां शेर ओर बकरी एक ही घाट में पानी पिया करते हैं नियोगी को गोली से उड़ा दिया गया और पटवा जी ने कहा कि नियोगी को खिड़की खोलकर सोने की क्या जरूरत थी? मजदूर आंदोलन में नियोगी के कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नियोगी की हत्या की खबर को कवर करने के लिये रायपुर के अखबारों ने दोपहर को अपने विशेष संस्करण निकाले थे।

कामरेड नियोगी का एक किस्सा बहुत प्रचलित है। उन्हें जेल ले जाया जा रहा था या कहीं शिफ्ट किया जा रहा था। जंगली रास्ते में पुलिसवालों ने गाड़ी रोक दी। एक पुलिस वाले ने हमदर्दी दिखाकर कहा कि ‘‘नौजवान आदमी हो। बेकार जेल में परेशान होगे। जाओ! भाग जाओ!’’ नियोगी ने पुलिस की बंदूक अपने सीने में तान ली और कहा, ‘‘गोली मारना है तो सीने में मारो। एनकांउटर बताकर पीठ में क्यों मारना चाहते हो।’’ यह किस्सा मैं बाबा के भक्तों को मैसेज देने के लिये सुना रहा हूं जो पिछली 4 जून की आधी रात को गिरफ्तारी के डर से सलवार-सूट पहनकर भाग गये थे!

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क [email protected]  के जरिए किया जा सकता है.


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