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कामरेड ज्योति बसु का कोई स्वदेशी चेहरा नहीं है

इससे क्या कि बंगाल को छोड़कर पूरे भरत ने कभी किसी मार्क्सिस्ट नेता को भारत के प्रधानमंत्री पद देखने की उम्मीद पाली थी। जब राजीव गांधी ने चंद्रशेखर सरकार को गिरा दिया था, तब भी सर्वदलीय सरकार के प्रधानमंत्री बतौर कामरेड ज्योति बसु का नाम प्रस्तावित था। फिर वह ऐतिहासिक भूल जब बंगाल के कामरेडों ने पहली बार केरल के कामरेडों से हाथ मिलाकर ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था।
इससे क्या कि बंगाल को छोड़कर पूरे भरत ने कभी किसी मार्क्सिस्ट नेता को भारत के प्रधानमंत्री पद देखने की उम्मीद पाली थी। जब राजीव गांधी ने चंद्रशेखर सरकार को गिरा दिया था, तब भी सर्वदलीय सरकार के प्रधानमंत्री बतौर कामरेड ज्योति बसु का नाम प्रस्तावित था। फिर वह ऐतिहासिक भूल जब बंगाल के कामरेडों ने पहली बार केरल के कामरेडों से हाथ मिलाकर ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था।
 
यह गल्प बहुत पुराना हो गया है कि भारतीय परिस्थितियों के मद्देनजर मुक्तिकामी जनता का नेतृत्व करने के बजाय भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी किस तरह पूंजी की अंधी दौड़ में शामिल हो गयी और किसतरह बंगाल में 35 साल के वाम शासन का अंत हो गया।
 
गाय पट्टी कभी कम्युनिस्ट आंदोलन का गढ़ रहा है और हिमालय की तराई पट्टी में भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में किस तरह एक के बाद एक किसान आंदोलन हुए, भारतीय कामरेडों के स्मृति आइवरी टावर में उसका कोई इतिहास भी नहीं है। 
 
कैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और राजस्थान में कभी मजबूत जनाधार वाली कम्युनिस्ट पार्टियां हिंदी जनता को नेतृत्व से लगातार वंचित करके एकदम हाशिये पर आ गयी हैं, इस पर जाहिर है कि उनका कोई विमर्श नहीं चल रहा है।
 
बंगाल और केरल के किले ढह जाने के बाद सिर्फ त्रिपुरा में सत्ता के दम पर दिल्ली की राजनीति करने वाले कामरेड चातक समान कांग्रेसी करुणामेघ को टकटकी बांधे देख रहे हैं कि कब उनके बेडरूम में फिर जगह बन जाये। लगातार छीजते जनाधार के बावजूद साख संकट में घिरे कांग्रेस नेतृत्व के लिए वाम विकल्प के बजाय अब भी सर्वोच्च प्राथमिकता ममता बनर्जी की घर वापसी का है। छींका टूटने के इंतजार में वंचित समुदायों को नेतृत्व में लाने की अंदरुनी मांग को सिरे से खारिज करके बूढ़े घोड़ों के दम पर सत्ता महासंग्राम में किसी चमत्कार के इंतजार में हैं कामरेड।
 
वंचित समुदायों के बारे में कामरेड पुनर्विचार करने को तैयार नहीं हैं और न हिंदी जनता के बारे में उनकी कोई सकारत्मक सोच है, लेकिन अब विदेशी विचारकों के साथ देशी चेहरा चस्पां करने की जेएनयूपलट माकपाई पोलित नेतृत्व की एकदम ताजातरीन कवायद है और इस वैदिकी योगाभ्यास में फिर एकदफा किनारे कर दिये गये हैं कामरेड ज्योति बसु। हालांकि बंगाल में इसे लेकर हल्की सी हलचल है क्योंकि इन चेहरों में कोई दूसरा बंगाली चेहरा भी नहीं जड़ा है। कुल मिलाकर दो देशी चेहरे हैं माकपाई, एक कामरेड सुरजीत और दूसरे कामरेड नंबूदरीपाद।
 
जबकि बंगाली कामरेडों का संकट यह है कि विशुद्ध बंगाली कुलीन मार्क्सवाद प्रांतीय सीमाबद्धता में जो उनका प्राचीन कालीन क्रांति एजेंडा है, उसका अब कोई सचिन तेंदुलकर है ही नहीं, जिसकी मार्केटिंग से उनकी सत्ता मार्ग पर वापसी हो। अब कामरेड बसु को भी ध्यान चंद बना दिये जाने के पोलित फैसले से कामरेडों की आंखों में सत्ता अंधियारा छा गया है।
 
ताजा खबर यह है कि प्रधानमंत्रित्व के अवसर से वंचित करने के बाद पोलित ब्यूरो ने जन्मशताब्दी वर्ष में ही कामरेड ज्योतिबसु को देशज मानने से साफ इन्कार कर दिया। दिल्ली में केंद्र सरकार से तोहफे में मिली जमीन पर माकपा का भवन कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत और कामरेड नंबूदरीबपाद के नाम पर बनाने का केंद्रीय फैसला हुआ है। बंगाल में शीत काल उत्सव और दावतों का मौसम होता है। लंबी बरसात के अवसान के बाद शहनाइयां गूंजने लगी हैं और लगन शुरु हो गया है। मिजाज हनीमूनी है। दावत इफरात है। ऐसे में कामरेडों का हाजमा बिगड़ गया है और वह लाइलाज भी है। क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व को कहने सुनने लायक नेतृत्व भी नहीं बंगाली कामरेडों के पास। गायपट्टी को नेतृत्व से वंचित करके देशभर में अप्रासंगिक हो गयी नेतृत्वविहीन माकपा के हाथों से आखिरी तुरुप का ताश कामरेड ज्योति बसु को भी दिल्ली ने छीन लिया। केरल लाइन ने आखिरकार बंगाल लाइन को एकदम खाली मैदान में पीटकर रख दिया है।
 
पार्टी की बंगाल में हालत यह है कि जिलों में नेतृत्व का विकल्प भी नहीं मिल रहा है। बूढ़े, बीमार और विकलांग नेतृत्व के बोझ से संगठन खोखला है। कैडरतंत्र बीता हुआ सपना है और वोट मशीनरी अतीत। जन समर्थन अब दिवास्वप्न हो चुका है। हारते हारते हार गले की हार। लोकसभा में हारे फिर विधानसभा में हारे, पंचायतों में तो उम्मीदवार भी नहीं मिले। लाल दुर्ग वर्दमान तक में चुनाव बहिष्कार करना पड़ा और पालिकाओं में सफाया हो गया है।
 
आखिरी किला हावड़ा में संसदीय उपचुनाव हार चुके हैं और अब नगर निगम गंवाने की बारी है। कामरेडों ने पहले ही हथियार डाल दिये हैं। मेयर ममता जायसवाल अपना वार्ड बाचाने के लिए चक्रव्यूह में कैद हैं। वाम रथी महारथी हावड़ा को रुख ही नहीं कर रहे हैं। एक अकेले सूर्यकांत मिश्र को किला बचाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। स्थानीय नेताओं को घर घर जनसंपर्क करने की हिदायत दी गयी है।
 
जंगी मजदूर आंदोलन खत्म। एक करोड़ की सदस्यता वाली किसानसभा का वजूद नेताओं के टीवी बयानों में है, जमीन पर कहीं नहीं दिखता। बंगाल बंद या किसी भी मुद्दे पर जनांदोलन चलाने का दम नहीं है। बंगाल में माकपा की इतनी दुर्गति हो गयी है कि चुनावी सभा करने की स्थित में भी नहीं है। दो साल पहले तक लगातार पैंतीस साल तक सत्ता में रही दबंग पार्टी की यह हालत हो गयी है। अब ध्यानचंद के जीते सारे ओलंपिक पदक बेमतलब हो गये हैं।
 
सामने लोकसभा चुनाव हैं। अल्पसंख्यकों, अनुसूचितों, पिछड़ों और आदिवासियों, युवाओं और महिलाओं के वोटबैंक से बेदखल कामरेड सवर्ण मतदाताओं को रिझाने धर्म कर्म में लौटे तो हैं लेकिन अनास्था आस्था के तूफान में बदल नहीं रही है।
 
अब असली धर्मसंकट यह है कि कामरेड बसु को केंद्रीय नेतृत्व से फिर फिर खारिज करते रहने से नौबत यह हो गयी है कि कहीं अगले चुनाव में कामरेटों को नेहरु, इंदिरा, राजीव और राहुल के नाम पर वोट न मांगना पड़े।
 
कोलकाता से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास का विश्लेषणकामरेड ज्योति बसु का कोई स्वदेशी चेहरा नहीं है  
 
एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
इससे क्या कि बंगाल को छोड़कर पूरे भरत ने कभी किसी मार्क्सिस्ट नेता को भारत के प्रधानमंत्री पद देखने की उम्मीद पाली थी। जब राजीव गांधी ने चंद्रशेखर सरकार को गिरा दिया था, तब भी सर्वदलीय सरकार के प्रधानमंत्री बतौर कामरेड ज्योति बसु का नाम प्रस्तावित था। फिर वह ऐतिहासिक भूल जब बंगाल के कामरेडों ने पहली बार केरल के कामरेडों से हाथ मिलाकर ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था।
 
यह गल्प बहुत पुराना हो गया है कि भारतीय परिस्थितियों के मद्देनजर मुक्तिकामी जनता का नेतृत्व करने के बजाय भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी किस तरह पूंजी की अंधी दौड़ में शामिल हो गयी और किसतरह बंगाल में 35 साल के वाम शासन का अंत हो गया।
 
गाय पट्टी कभी कम्युनिस्ट आंदोलन का गढ़ रहा है और हिमालय की तराई पट्टी में भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में किस तरह एक के बाद एक किसान आंदोलन हुए, भारतीय कामरेडों के स्मृति आइवरी टावर में उसका कोई इतिहास भी नहीं है। 
 
कैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और राजस्थान में कभी मजबूत जनाधार वाली कम्युनिस्ट पार्टियां हिंदी जनता को नेतृत्व से लगातार वंचित करके एकदम हाशिये पर आ गयी हैं, इस पर जाहिर है कि उनका कोई विमर्श नहीं चल रहा है।
 
बंगाल और केरल के किले ढह जाने के बाद सिर्फ त्रिपुरा में सत्ता के दम पर दिल्ली की राजनीति करने वाले कामरेड चातक समान कांग्रेसी करुणामेघ को टकटकी बांधे देख रहे हैं कि कब उनके बेडरूम में फिर जगह बन जाये। लगातार छीजते जनाधार के बावजूद साख संकट में घिरे कांग्रेस नेतृत्व के लिए वाम विकल्प के बजाय अब भी सर्वोच्च प्राथमिकता ममता बनर्जी की घर वापसी का है। छींका टूटने के इंतजार में वंचित समुदायों को नेतृत्व में लाने की अंदरुनी मांग को सिरे से खारिज करके बूढ़े घोड़ों के दम पर सत्ता महासंग्राम में किसी चमत्कार के इंतजार में हैं कामरेड।
 
वंचित समुदायों के बारे में कामरेड पुनर्विचार करने को तैयार नहीं हैं और न हिंदी जनता के बारे में उनकी कोई सकारत्मक सोच है, लेकिन अब विदेशी विचारकों के साथ देशी चेहरा चस्पां करने की जेएनयूपलट माकपाई पोलित नेतृत्व की एकदम ताजातरीन कवायद है और इस वैदिकी योगाभ्यास में फिर एकदफा किनारे कर दिये गये हैं कामरेड ज्योति बसु। हालांकि बंगाल में इसे लेकर हल्की सी हलचल है क्योंकि इन चेहरों में कोई दूसरा बंगाली चेहरा भी नहीं जड़ा है। कुल मिलाकर दो देशी चेहरे हैं माकपाई, एक कामरेड सुरजीत और दूसरे कामरेड नंबूदरीपाद।
 
जबकि बंगाली कामरेडों का संकट यह है कि विशुद्ध बंगाली कुलीन मार्क्सवाद प्रांतीय सीमाबद्धता में जो उनका प्राचीन कालीन क्रांति एजेंडा है, उसका अब कोई सचिन तेंदुलकर है ही नहीं, जिसकी मार्केटिंग से उनकी सत्ता मार्ग पर वापसी हो। अब कामरेड बसु को भी ध्यान चंद बना दिये जाने के पोलित फैसले से कामरेडों की आंखों में सत्ता अंधियारा छा गया है।
 
ताजा खबर यह है कि प्रधानमंत्रित्व के अवसर से वंचित करने के बाद पोलित ब्यूरो ने जन्मशताब्दी वर्ष में ही कामरेड ज्योतिबसु को देशज मानने से साफ इन्कार कर दिया। दिल्ली में केंद्र सरकार से तोहफे में मिली जमीन पर माकपा का भवन कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत और कामरेड नंबूदरीबपाद के नाम पर बनाने का केंद्रीय फैसला हुआ है। बंगाल में शीत काल उत्सव और दावतों का मौसम होता है। लंबी बरसात के अवसान के बाद शहनाइयां गूंजने लगी हैं और लगन शुरु हो गया है। मिजाज हनीमूनी है। दावत इफरात है। ऐसे में कामरेडों का हाजमा बिगड़ गया है और वह लाइलाज भी है। क्योंकि केंद्रीय नेतृत्व को कहने सुनने लायक नेतृत्व भी नहीं बंगाली कामरेडों के पास। गायपट्टी को नेतृत्व से वंचित करके देशभर में अप्रासंगिक हो गयी नेतृत्वविहीन माकपा के हाथों से आखिरी तुरुप का ताश कामरेड ज्योति बसु को भी दिल्ली ने छीन लिया। केरल लाइन ने आखिरकार बंगाल लाइन को एकदम खाली मैदान में पीटकर रख दिया है।
 
पार्टी की बंगाल में हालत यह है कि जिलों में नेतृत्व का विकल्प भी नहीं मिल रहा है। बूढ़े, बीमार और विकलांग नेतृत्व के बोझ से संगठन खोखला है। कैडरतंत्र बीता हुआ सपना है और वोट मशीनरी अतीत। जन समर्थन अब दिवास्वप्न हो चुका है। हारते हारते हार गले की हार। लोकसभा में हारे फिर विधानसभा में हारे, पंचायतों में तो उम्मीदवार भी नहीं मिले। लाल दुर्ग वर्दमान तक में चुनाव बहिष्कार करना पड़ा और पालिकाओं में सफाया हो गया है।
 
आखिरी किला हावड़ा में संसदीय उपचुनाव हार चुके हैं और अब नगर निगम गंवाने की बारी है। कामरेडों ने पहले ही हथियार डाल दिये हैं। मेयर ममता जायसवाल अपना वार्ड बाचाने के लिए चक्रव्यूह में कैद हैं। वाम रथी महारथी हावड़ा को रुख ही नहीं कर रहे हैं। एक अकेले सूर्यकांत मिश्र को किला बचाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। स्थानीय नेताओं को घर घर जनसंपर्क करने की हिदायत दी गयी है।
 
जंगी मजदूर आंदोलन खत्म। एक करोड़ की सदस्यता वाली किसानसभा का वजूद नेताओं के टीवी बयानों में है, जमीन पर कहीं नहीं दिखता। बंगाल बंद या किसी भी मुद्दे पर जनांदोलन चलाने का दम नहीं है। बंगाल में माकपा की इतनी दुर्गति हो गयी है कि चुनावी सभा करने की स्थित में भी नहीं है। दो साल पहले तक लगातार पैंतीस साल तक सत्ता में रही दबंग पार्टी की यह हालत हो गयी है। अब ध्यानचंद के जीते सारे ओलंपिक पदक बेमतलब हो गये हैं।
 
सामने लोकसभा चुनाव हैं। अल्पसंख्यकों, अनुसूचितों, पिछड़ों और आदिवासियों, युवाओं और महिलाओं के वोटबैंक से बेदखल कामरेड सवर्ण मतदाताओं को रिझाने धर्म कर्म में लौटे तो हैं लेकिन अनास्था आस्था के तूफान में बदल नहीं रही है।
 
अब असली धर्मसंकट यह है कि कामरेड बसु को केंद्रीय नेतृत्व से फिर फिर खारिज करते रहने से नौबत यह हो गयी है कि कहीं अगले चुनाव में कामरेटों को नेहरु, इंदिरा, राजीव और राहुल के नाम पर वोट न मांगना पड़े।
 
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