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कारखाना बनता जा रहा है इंडिया टीवी : सुविधाएं नदारद पर काम पूरा चाहिए

न्‍यूज चैनल इंडिया टीवी अब मीडिया संस्‍थान कम फैक्‍टरी ज्‍यादा बनता जा रहा है. पिछले दिनों एचआर व एडमिन हेड पुनीत टंडन ने मेल जारी करके कर्मचारियों को ऑफिस टाइम में चाय पीने बाहर ना जाने कहा था तो अब एक और मेल जारी करके वो मीडिया संस्‍थान को कारखाना-फैक्‍टरी बनाने की कोशिश करते दिख रहे हैं. पुनीत ने कर्मचारियों को मेल जारी करके कहा है कि ऐसा महसूस किया जा रहा है कि तमाम कर्मचारी अपनी शिफ्ट पूरी नहीं कर रहे हैं. अब लेट आने वाले तथा शिफ्ट पूरी न करने वालों का नाम हाइलाइट किया जाएगा.

न्‍यूज चैनल इंडिया टीवी अब मीडिया संस्‍थान कम फैक्‍टरी ज्‍यादा बनता जा रहा है. पिछले दिनों एचआर व एडमिन हेड पुनीत टंडन ने मेल जारी करके कर्मचारियों को ऑफिस टाइम में चाय पीने बाहर ना जाने कहा था तो अब एक और मेल जारी करके वो मीडिया संस्‍थान को कारखाना-फैक्‍टरी बनाने की कोशिश करते दिख रहे हैं. पुनीत ने कर्मचारियों को मेल जारी करके कहा है कि ऐसा महसूस किया जा रहा है कि तमाम कर्मचारी अपनी शिफ्ट पूरी नहीं कर रहे हैं. अब लेट आने वाले तथा शिफ्ट पूरी न करने वालों का नाम हाइलाइट किया जाएगा.

पहले मेल के बाद से ही परेशान इंडिया टीवी के कर्मचारियों को इस मेल ने और नाराज कर दिया है. सबसे बुरी बात तो यह है कि यह सब एक पत्रकार के मीडिया संस्‍थान में हो रहा है, जो पत्रकारिता के हर एक पहलू और तरीके से वाकिफ है. पत्रकार टाइम लिमिट में बंधकर काम नहीं करता है. तमाम ऐसे मौके आते हैं कि कोई खबर को लेकर पत्रकार अपने तय शिफ्ट से कई घंटे ज्‍यादा समय अपने संस्‍थान को देता है. पर शायद इन तथ्‍यों को एचआर हेड नहीं देखते हैं. जाहिर बात है कि अगर अक्‍सर ज्‍यादा समय काम करने वाला अपना काम निपटाकर किसी रोज घंटा-आधा घंटा पहले निकल जाए तो इसमें एतराज करने का कोई कारण नहीं दिखता है. 

अमूमन नौकरी के स्‍तर पर खतरनाक माने जाने वाले मीडिया संस्‍थानों के कर्मचारी अपना काम पूरा करके ही निकलते हैं. पुनीत के इस मेल के बाद इंडिया टीवी के कर्मचारियों में काफी नाराजगी है. एक तो उन्‍हें नोएडा के मीडिया हब से दूर बनाए गए आफिस को लेकर वैसे ही कई शिकायतें रहती हैं, उसके बाद चाय पीने पर रोक और समय की पाबंदी ने इनकी परेशानियों को और बढ़ा दिया है. पत्रकार लगातार काम करते हुए इनोवेटिव नहीं हो सकता. ज्‍यादातर पत्रकार चाय-पान के बाद ही अपने को तरोताजा महसूस करते हैं और बेहतर काम करते हैं. हंसी मजाक करते हैं, जिनसे वे अपने को तरोताजा महसूस करते हैं तथा काम में मन लगाते हैं, पर इंडिया टीवी को बिग बास के घर जैसा बनाए जाने से पत्रकार एवं कर्मचारी तनाव में हैं.

प्रबंधन अपने कर्मचारियों की परेशानियों में भी लगातार इजाफा करता जा रहा है. पैसे देने के मामले में कंजूसी बरतने वाला यह चैनल अपने कर्मचारियों की सुविधाओं में भी ढिलाई बरतता है. कुछ चुनिंदा प्‍वाइंटों से कर्मचारियों को लाने के लिए मात्र एक बस की सुविधा दी गई है, जिससे ऑफिस पहुंचने वाले कर्मचारियों को प्राइवेट बसों की तरह खड़ा होकर यात्रा करनी पड़ती है. मैनेजमेंट कर्मचारियों को सेक्‍टर 85 स्थित कार्यालय ले जाने के लिए नोएडा के होटल रेडिशन के पास बस खड़ी करता है. इसके अलावा कई अन्‍य पिकअप सेंटरों से भी कर्मचारियों को उठाता है. अमूमन हर शिफ्ट में कई कर्मचारी खड़े होकर आते हैं. संस्‍थान के पास अतिरिक्‍त वाहन मौजूद होते हैं उसके बावजूद प्रबंधन पत्रकारों को भेड़-बकरियों की तरह लाने में दिलचस्‍पी दिखाता है. कर्मचारियों को अपने घरों से बस तक पहुंचने में एक घंटे से लेकर दो घंटे का अतिरिक्‍त समय लगता है. दूर रहने वालों का तो ऑफिस आने जाने में ही चार से छह घंटे खराब हो जाते हैं. इसके अलावा अपने शिफ्ट टाइम से पैंतालिस मिनट पहले बस तक पहुंचना भी जरूरी होता है.   

चैनल प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां भी उड़ाता दिखता है. सुप्रीम कोर्ट ने रात में ड्रा‍पिंग-पिकअप सुविधा देने वाले तमाम संस्‍थानों को स्‍पष्‍ट निर्देश दिया है कि इन वाहनों में गार्ड जरूर होने चाहिए, पर इंडिया टीवी में रात की ड्रापिंग के समय कोई गार्ड वाहन में नहीं होता है, जबकि इस दौरान लड़कियां भी मौजूद रहती हैं. सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि कई कई बार लड़कियां और ड्राइवर अकेले बच जाते हैं. इतना संवेदनशील स्थिति होने के बाद भी प्रबंधन को इससे कोई सरोकार नहीं रहता है. कहा तो यहां तक जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के उलट कई महिला कर्मचारियों को उनके घर से दूर छोड़ दिया जाता है. इस स्थिति में उनके परिवार वाले आकर ले जाते हैं या लड़कियां खुद अपने रिश्‍क पर घर जाती है. जबकि सुप्रीम कोर्ट का स्‍पष्‍ट निर्देश है कि रात में अपने संस्‍थानों से घर जाने वाली लड़की के अंदर पहुंचने तक वहां मौजूद रहा जाए. 

गौरतलब है कि इंडिया टीवी टीआरपी के मामले में नंबर एक या नंबर टू पर रहने वाला चैनल है और इसके चलते इसे अच्‍छी खासी कमाई भी होती है, लेकिन इसके बाद भी चैनल प्रबंधन अपने कर्मचारियों की सुविधा की दृष्टि से बिल्‍कुल लचर व्‍यवस्‍था बना रखा है. अब उनकी आजादी पर भी लगाम लगाया जा रहा है. लोगों का कहना है कि जो दूसरों की समस्याओं और आजादी के लिए लड़ाई लड़ते हैं वे खुद अब अपने संस्थान में गुलाम बनकर रह गए हैं. कर्मचारियों का आरोप है कि प्रबंधन ने बाहर जाने पर रोक लगा दिया है और कैंटीन में थर्ड क्‍लास का खाना व चाय मिलता है. वे आरोप लगाते हैं कि इसमें भी कमिशनखोरी की जाती है. वे सबसे ज्‍यादा दुखी इस बात को लेकर होते हैं कि एक पत्रकार के मीडिया हाउस में ही इस तरह की हरकत हो रही है और वे लोग आंख बंद करके तमाशा देख रहे हैं.

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