पंकज कुमार झा : खबरें आतंकित करने वाली है. रूहें काप जाती है कल्पना कर की कत्ल होने वाले सरों में अपन भी हो सकते थे. सरदेसाई के कत्लखाने से सैकड़ों हलाली के बाद कारपोरेट का कसाई अब पहुचा है भास्कर के दफ्तर. दिल्ली संस्करण बंद होने की खबर. इससे पहले भी थोक में निरीह पत्रकारों के क़त्ल का सिलसिला चलाते रहे हैं अंबानीगण. क्या यह समय समाचार माध्यमों के राष्ट्रीयकरण का नहीं है? तेल लेने गयी अभिव्यक्ति की आज़ादी भाई. भरण-पोषण रोजी-रोज़गार की आज़ादी सबसे बड़ी है. शेष बातें बाद की. उफ़ उफ़.
Ranjay Tripathi कोई बात नहीं फ़ूड गारंटी है … और दूसरी बात, ये पत्रकार इसी लायक है … घटियाही पर इनका छातीफाड़ रुदाली क्रुन्दन याद है न ….
पंकज कुमार झा सहमत हूँ Ranjay भाई. वास्तव में बैनर का अहंकार कई बार पत्रकारों को इंसान भी नहीं रहने देता. हाल ही में ऐसे एक कटु अनुभव को बिना नाम लिए शेयर किया था मैंने. लेकिन बावजूद इसके ऐसी खबरें हृदयविदारक हैं.
Samanwaya Nanda दुखद स्थिति
Sanjay Bengani रोजगार गेरेंटी योजना और खाद्य सुरक्षा योजना है तो सही. काहे की फिकर?
Navin Dewangan किसी – किसी जगह तो पत्रकारो की तनख्वाह तो वहां के सिक्यूरटी गार्ड से भी कम रहती है.दुखद स्थिति..
पत्रकार और पालिटिशियन पंकज झा के फेसबुक वॉल से.





