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कार्यकाल के अंतिम दिनों में मायावती को क्यों हो रहा दर्द

विगत दिनों मायावती सरकार ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सामाजिक न्याय के संदर्भ में तीन मांगे की हैं। पहली मुस्लिम समुदाय को आरक्षण देने, दूसरी गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने, तीसरी जाट समुदाय को केन्द्र सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित करने की और चौथी अनुसूचित जाति-जनजाति का आरक्षण कोटा बढ़ाने की है। साढ़े चार वर्ष तक शासन करने वाली मायावती सरकार को अपने कार्यकाल के अन्तिम दौर में आखिर सामाजिक न्याय के इन सवालों पर दर्द क्यों उभरा।

विगत दिनों मायावती सरकार ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सामाजिक न्याय के संदर्भ में तीन मांगे की हैं। पहली मुस्लिम समुदाय को आरक्षण देने, दूसरी गरीब सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने, तीसरी जाट समुदाय को केन्द्र सरकार द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग में सम्मिलित करने की और चौथी अनुसूचित जाति-जनजाति का आरक्षण कोटा बढ़ाने की है। साढ़े चार वर्ष तक शासन करने वाली मायावती सरकार को अपने कार्यकाल के अन्तिम दौर में आखिर सामाजिक न्याय के इन सवालों पर दर्द क्यों उभरा।

दरअसल मायावती की सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई है और वह यह बात अच्छी तरह जानती हैं कि पूरे देश में चले भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन की मार से वह बच नहीं पायेंगी। आय से अधिक सम्पत्ति के जिस मामले में वह सीबी.आई. के दायरे में हैं उसमें सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें राहत नहीं मिल पायी है। गौरतलब है कि इस मामले में मायावती ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी, जिसे पर्याप्त सबूतों को देखते हुये खारिज कर दिया गया। यही वजह है कि वह मुस्लिम व अन्य तबकों के मुद्दों को उछालकर उत्तर प्रदेश के राजनैतिक एजेण्डे को बदलना चाहती हैं और विकास से लेकर कानून व्यवस्था के मोर्चे पर अपनी सरकार की असफलता को छिपाना चाहती हैं।

सच्चाई तो यह कि उनकी सरकार अपने पूरे कार्यकाल में अतिपिछड़ों, पिछड़े मुसलमानों और आदिवासियों के सामाजिक न्याय के सवाल पर पूर्ववर्ती मुलायम सरकार के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए मात्र राजनैतिक पैतंरेबाजी करती रही हैं। प्रदेश में उनका यह दावा कि ‘जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी’ इन तबकों के लिए धोखा ही साबित हुआ। मुस्लिमों के आरक्षण पर प्रधानमंत्री को पत्र भेजने वाली मायावती यदि चाहतीं तो प्रदेश में अति-पिछड़े हिन्दुओं, पिछड़े मुसलमानों का आरक्षण कोटा अलग कर सकती थी, जैसा कि उसे संवैधानिक अधिकार है। ज्ञातव्य हो कि 1992 में इन्दिरा साहनी बनाम भारत सरकार के मुकदमें में स्पष्ट आदेश दिया था कि राज्यों द्वारा पिछड़े वर्ग को पिछड़े और अति पिछड़े में विभक्त करने में कोई संवैधानिक और कानूनी अड़चन नही है। मण्डल कमीशन के सदस्य एलआर नायक और उप्र सरकार द्वारा गठित छेदीलाल साथी कमीशन में भी पिछड़े वर्ग के आरक्षण को विभाजित करने की संस्तुति दी थी। यही नहीं हाल ही में बने रंगनाथ मिश्र आयोग ने भी कहा था कि पिछड़े वर्ग के 27 प्रतिशत आरक्षण कोटे में 8.4 प्रतिशत अल्पसंख्यकों के लिए अलग कर दिया जाये। इसी आधार पर पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने अपने यहां पिछड़े मुसलमानों को अलग आरक्षण कोटा दिया भी था। लेकिन उप्र में यह नहीं हुआ।

यही हाल उप्र में अति-पिछड़े हिन्दू समाज के साथ भी है। इस तबके की स्थिति यह है कि इनकी केवट, मल्लाह, निषाद, विश्‍वकर्मा, बिन्द, बियार, राजभर, कुम्हार, पाल, भूंजा, कोईरी, लोहार, लोनिया, चौहान, आरख जैसी तमाम जातियों को न प्रदेश स्तर पर और न ही राष्ट्रीय स्तर पर आजादी के बाद से आज तक अपनी संख्या के अनुसार हिस्सेदारी मिल सकी है। राष्ट्रीय स्तर पर पिछले 60 वर्षों में 50 वर्ष कांग्रेस ने दिल्ली में राज किया, लेकिन कांग्रेस ने अतिपिछड़े वर्ग के आरक्षण कोटे को अलग करने की जरूरत महसूस नहीं की। वैसे सभी लोग जानते हैं कि कांग्रेस, भाजपा जैसी पार्टियां समाज के कमजोर तबकों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों को कभी भी सामाजिक न्याय देना नहीं चाहती। यदि इतिहास पर भी गौर किया जाये तो डा. अम्बेडकर और प्रगतिशील ताकतों के संघर्षों के दबाव में ही कांग्रेस ने अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षण को संविधान में स्वीकार किया था लेकिन वह भी हर दस वर्षों में पुनर्समीक्षा के साथ ही।

पिछड़े वर्ग के सामाजिक न्याय के प्रश्‍न को तो वे लगातार टालती रही। आजादी के तुरन्त बाद पिछड़े वर्ग के सामाजिक न्याय के लिए बनी काका कालेकर आयोग की रिपोर्ट को कांग्रेस ने ठण्डे बस्ते के हवाले कर दिया। मण्डल कमीशन भी गैर कांग्रेसी सरकार के दिल्ली में सत्तारूढ़ होने के बाद ही बन सका और उसकी रिपोर्ट 1980 में सरकार के पास पहुंच जाने के बाद तभी लागू हुयी। जब देश में 10 वर्षों बाद गैर-कांग्रेस सरकार बनी। जहॉ तक भाजपा की बात है, वह सैद्धांतिक तौर पर जिस व्यवस्था को बनाने की बात करती है, उसमें तो ऐसे तबकों को इंसान होने का दर्जा तक हासिल नहीं है।

लेकिन उप्र में मुलायम और मायावती दोनों जो सामाजिक न्याय आंदोलन के बदौलत मुख्यमंत्री बने वह इन वर्गों को अलग आरक्षण कोटा देने की जगह इन्हें दलितों से लड़ाने का खतरनाक खेल खेलते रहे। यह जानते हुए भी कि संवैधानिक रूप से अतिपिछड़ी जातियों को दलितों की श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता है क्योंकि कोई भी अतिपिछड़ी जाति अस्पृश्‍य अथवा अछूत नहीं है जबकि दलित की श्रेणी के लिए संवैधानिक रूप से अछूत होना अनिवार्य है। मुलायम जब मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने अतिपिछड़ी 16 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए बाकायदा शासनादेश निकाल दिया, उस समय मायावती ने इसका विरोध किया था। लेकिन खुद सत्ता में आने के बाद उन्होंने भी यही प्रस्ताव बनाकर केन्द्र सरकार के पास भेज दिया।

उप्र में आदिवासियों की हालत तो और भी बुरी है। सोनभद्र, मिर्जापुर, चन्दौली से लेकर इलाहाबाद, चित्रकूट, बांदा तक लाखों की संख्या में रहने वाली कोल जैसी आदिवासी जाति को आदिवासी का दर्जा तक नहीं मिल सका है। यही हाल मुसहर, धरिकार, कोरवां, धागंर जैसी आदिवासी जातियों का भी है। 2003 में गोंड, खरवार, जैसी जिन आदिवासी जातियों को आदिवासी का दर्जा भी मिला वह आज अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने से वंचित है। परिणामतः सोनभद्र जिले के जिन गांवों में उनकी 98 प्रतिशत आबादी है वहां भी वो प्रधान और बीडीसी न बन सके। इतना ही नहीं पंचायत चुनाव से पहले जन संघर्ष मोर्चा समेत तमाम आदिवासी संगठनों की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मा0 उच्च न्यायालय के आदेश, कि इन तबकों के लिए सीटें आरक्षित कर दी जायें, को लागू करने की जगह प्रदेश सरकार उच्चतम न्यायालय चली गयी और इसके खिलाफ स्थगन आदेश ले आयी।

कुल मिला कर कहा जाये तो मायावती जी का यह आरक्षण प्रेम मात्र राजनैतिक पैतरेबाजी है। मायावती सरकार के इस दोहरे चरित्र को उजागर करने के लिए उप्र में जन संघर्ष मोर्चा ने पहल ली है और इस सवाल को पूरे प्रदेश में जारी भ्रष्टाचार विरोधी जन अभियान में पुरजोर तरीके से उठाया जा रहा है।

लेखक दिनकर कपूर जनसंघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.

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