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कार्यक्रम तो शांति से हो गया मगर बिरयानी पर हंगामा हो गया

दिमाग में एक आइडिया आया जिसे मित्रों ने भी पसंद किया। आइडिया यह था कि किसी मंत्री को बुलाया जाए और उससे भाषण न कराया जाय बल्कि जनता उससे सवाल पूछे। अब आवश्यकता थी फाइनेन्सर की, जो समारोह और खाने का भी प्रबंध कर सके। इस बारे में परवेज हाशमी और उनके साथियों से बात की आइडिया उन्हें भी पसंद आया और प्रबंध की जिम्मेदारी भी ले ली। जामिया का अंसारी आडिटोरियम बुक करा लिया और केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह से बात की। उन्हें बता दिया गया कि भाषण नहीं होगा बल्कि श्रोताओं के सवालों का जवाब देना होगा। श्री सिंह सहर्ष तैयार हो गए। समारोह शाम में था पांच बजते-बजते हाल भर गया। आगंतुकों को बताया गया कि आज भाषण नहीं होगा, श्रोताओं के सवालों का जवाब दिया जाएगा। इसके लिए श्रोताओं में पर्ची बांट कर कहा गया कि अपना सवाल लिख कर दे दें। थोड़ी देर में हिंदी उर्दू और अंग्रेजी में लगभग 150 सवाल आ गए।
दिमाग में एक आइडिया आया जिसे मित्रों ने भी पसंद किया। आइडिया यह था कि किसी मंत्री को बुलाया जाए और उससे भाषण न कराया जाय बल्कि जनता उससे सवाल पूछे। अब आवश्यकता थी फाइनेन्सर की, जो समारोह और खाने का भी प्रबंध कर सके। इस बारे में परवेज हाशमी और उनके साथियों से बात की आइडिया उन्हें भी पसंद आया और प्रबंध की जिम्मेदारी भी ले ली। जामिया का अंसारी आडिटोरियम बुक करा लिया और केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह से बात की। उन्हें बता दिया गया कि भाषण नहीं होगा बल्कि श्रोताओं के सवालों का जवाब देना होगा। श्री सिंह सहर्ष तैयार हो गए। समारोह शाम में था पांच बजते-बजते हाल भर गया। आगंतुकों को बताया गया कि आज भाषण नहीं होगा, श्रोताओं के सवालों का जवाब दिया जाएगा। इसके लिए श्रोताओं में पर्ची बांट कर कहा गया कि अपना सवाल लिख कर दे दें। थोड़ी देर में हिंदी उर्दू और अंग्रेजी में लगभग 150 सवाल आ गए।
 
स्टेज पर दो कुर्सियां थीं। एक पर अर्जुन सिंह बैठे और दूसरी पर सवालों का बंडल ले कर मैं बैठा था। सवालों का जवाब आरंभ होने से पहले यह भी बता दिया गया कि अगर किसी को पूरक सवाल करना है तो इस सत्र के बाद कर सकता है। दरअसल इस आइडिया के पीछे कहानी यह थी कि कथित कारसेवकों द्वारा और प्रधानमंत्री नरसिंह राव की मिली भगत से बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद लोगों के जहन में कई सवाल थे मगर जवाब नहीं मिल रहा था। उस समय कांग्रेस के नेता मुसलमानों के बीच जाने से कतरा रहे थे। उस समय केवल अर्जुन सिंह ही ऐसे नेता थे जिन्हें मुसलमान पसंद करते थे।
 
सवालों का सिलसिला आरंभ हो गया लोग बहुत ध्यान से जवाब सुन रहे थे कई सवाल बहुत तीखे थे और लग रहा था कि इस पर अर्जुन सिंह उत्तेजित हो सकते हैं मगर तीखे सवालों पर भी श्री सिंह ने अपने चेहरे पर शिकन तक नहीं आने दी। तीन घंटे के पूरे सत्र में कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि श्री सिंह ने अपना आपा खोया हो। इसके बाद पूरक सवाल किए गए जो लगभग पंद्रह मिनट में निपट गए।
 
समारोह सम्पन्न होने जा रहा था और उधर बिरयानी की खुशबू वातावरण में फैल रही थी। समारोह समाप्ति की घोषणा से पहले ही भाई लोग बिरयानी पर टूट पड़े। कई लोगों को बिरयानी की खुशबू ही पागल बना देती है। फिर जो अफरा तफरी मची तो वालंटियर व्यवस्था संभाल नहीं पाए। एक लड़का बहुत शोर मचा रहा था तो उसे दो तगड़े वालंटियर ने उठाकर बिरयानी की एक खाली देग में पटक दिया इस पर भी काफी हंगामा हुआ तथा दो लोगों में हल्की मार पीट भी हो गई। कुल मिला कर समारोह जितना शांति पूर्वक सम्पन्न हुआ उससे अधिक हंगामा बिरयानी पर हो गया। 
 
इस अफरा तफरी में मुझे लखनउ में आयोजित बामसेफ का एक सम्मेलन याद आ गया इस सम्मेलन में पत्रकारिता पर भाषण देने के लिए मुझे बुलाया गया था। लंच के समय मैने देखा कि लगभग एक हजार कार्यकर्ता भोजन के लिए बने पांच काउंटरों पर लाइन लगा कर खड़े हो गए न कोई हंगामा न शोर शराबा लगभग आधे घंटे में सब को खाना मिल गया। काश कि अन्य लोग भी अपने कार्यकर्ताओं को इस प्रकार प्रशिक्षित कर सकें तो कितना अच्छा हो क्योंकि ऐसा न होने पर अच्छा खासा कार्यक्रम चौपट हो कर रह जाता है।
 

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207

अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

 

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