मुंबई। महाराष्ट्र में पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर पत्रकार संगठन और सदस्य लामंबद हो गए हैं. महाराष्ट्र पत्रकार हल्ला विरोधी समिति ने आरोप लगाया है कि राज्य के अधिकतर नेता पत्रकारों की सुरक्षा का कानून नहीं बनने देना चाहते, क्योंकि पत्रकारों पर ज्यादातर हमले राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता ही करते हैं. समिति के पदाधिकारियों ने दावा किया है कि जब तक राज्य सरकार हमारी मांगें नहीं मानती हम आंदोलन जारी रखेंगे. पत्रकारों ने विरोध के लिए शांतिपूर्ण रास्ता अख्तियार करने का ऐलान किया है.
समिति के अध्यक्ष एस एम देशमुख ने बताया कि राज्य में पत्रकारों पर हुए हमले का श्वेत पत्र सरकार को सौंपा जा चुका है फिर भी उदासीनता बरती जा रही है. पिछले डेढ़ साल का आकलन करें तो पत्रकारों पर 209 हमले हुए. पिछले दस वर्ष में राज्य 856 पत्रकारों और 30 मीडिया दफ्तरों पर हमले हो चुके हैं. राज्य में 11 पत्रकारों को जान गंवानी पड़ी है, लेकिन एक भी मामले में हमलावरों को सजा नहीं हो सकी है. सभी आराम से बाहर घूम रहे हैं.
देशमुख का मानना है कि नारायण राणे की अगुवाई में गठित 6 मंत्रियों की समिति की रिपोर्ट एकतरफा व पूर्वाग्रह से ग्रसित है. जिसे मंजूर नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने बताया कि राणे समिति नया कानून बनाने का भ्रम फैला रही है जबकि मौजूदा कानून में केवल दो मुद्दे शामिल करने की मांग की जा रही है. हमलावरों के खिलाफ फौजदारी का मामला दर्ज हो और दूसरा पत्रकारों से जुड़े मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाए जाए. पर राणे समिति इस मसले पर स्पष्ट कुछ भी कहने या करने को तैयार नहीं है. इसके पहले भी राणे इस कानून का विरोध कर चुके हैं.
डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए जैसा कानून बनाया गया है उसी तर्ज पर पत्रकारों की सुरक्षा के लिए भी कानून बने. डाक्टरों पर हमले मरीजों के रिश्तेदारों द्वारा होते रहे हैं, लिहाजा रिश्तेदारों के प्रति सरकार को सहानुभूति नहीं है. पत्रकारों पर हमले राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता करते हैं जिसके लिए आनाकानी की जा रही है. ये नेता चाहते हैं कि सच लिखने वाले पत्रकारों पर हमले होते रहें. शायद इसिलिए पत्रकारों की सुरक्षा के लिए मजबूत कानून बनाने से राज्य सरकार और उसके आला नेता हिचक रहे हैं.
समिति ने 15 दिसंबर को नागपुर में शीतकालीन सत्र के दौरान विधान भवन पर मोर्चा निकालने का ऐलान किया है. सत्र की शुरुआत 12 दिसंबर से होगी और इसी दिन से पत्रकार काला फीता बांधकर 15 दिसंबर तक दोनों सदनों के कामकाज कवर करेंगे. इसके अलावा सत्र की पूर्वसंध्या पर आयोजित होनेवाली सत्ता पक्ष की चाय-पार्टी का बहिस्कार किया जाएगा. यदि सुरक्षा कानून के संदर्भ में निर्णय नहीं लिया गया तो पत्रकार दिवस अर्थात 6 जनवरी से उग्र आंदोलन छेड़ने के लिए भी तैयार हैं. काफी समय से इस कानून को लटकाने वाली सरकार से पत्रकार बहुत खफा हैं.






