यशवंत जी, दबंग दुनिया के निकालने के पीछे का कारण कोई समाज सेवा नहीं है बल्कि किशोर वाधवानी के काले धंधों को आड़ देना है. साथ ही उसके खिलाफ जितने केस इनकम टैक्स विभाग और एक्साइज में चल रहे हैं उनको सुलटवाना है. 18 महीने बीत गये पर अभी भी मशीन का दूर-दूर तक पता नहीं है. कर्मचारियों में यह कानाफूसी चलती रहती है कि पता नहीं सेठ कब घोषणा कर दे कि बस आज से अख़बार बंद.
इतना ही नहीं उन्होंने अख़बार चलाने के लिए एक से एक नमूने भर्ती कर रखे हैं, जिनका इस धंधे से बैलगाड़ी के नीचे चलने वाले कुत्ते की तरह रहा है, जो यह समझता है कि बैल गाड़ी उसके कारण चल रही है. दिसम्बर 2011 तक इनके लिए दिल्ली में और कॉर्पोरेट बिज़नेस देखने वाला कोई नहीं था. लोगों के पैसे मारने में भी इस संस्थान को महारत हासिल है. सीईओ साहब को दो-दो अख़बार बंद करने का अनुभव है. शायद अब तीसरे की बारी है. संपादक महोदय खुद को प्रभाष जोशी से भी बड़ा पत्रकार समझते हैं और परले दर्जे के अहंकारी हैं. मालिक तो मशाल्लाह शेख़चिल्ली के भी बाप हैं.
नवल किशोर पराशर






