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किसकी साजिश के शिकार बने यशवंत?

आखिर वही हुआ जिसका होना बहुत पहले से अपेक्षित था. शासन-प्रशासन और दूसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार की ख़बरें छापकर खुद ही अपनी पीठ थपथपाने वाले मीडिया का असली चेहरा इन्टरनेट न्यूज पोर्टल भड़ास4मीडिया के माध्यम से दुनिया के सामने लाने की कीमत तो यशवंत को आज नहीं तो कल, चुकानी ही थी. ये तो अभी एक शुरुआत है, आगे और क्या-क्या हो सकता है इसकी तो हमे कल्पना ही नहीं है. इतने बड़े-बड़े ताकतवर और खुद को सबसे बड़ा मीडिया हाउस कहने वालों के काले कारनामे दुनिया के सामने लाने का प्रतिफल तो चुकाना ही होगा.

आखिर वही हुआ जिसका होना बहुत पहले से अपेक्षित था. शासन-प्रशासन और दूसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार की ख़बरें छापकर खुद ही अपनी पीठ थपथपाने वाले मीडिया का असली चेहरा इन्टरनेट न्यूज पोर्टल भड़ास4मीडिया के माध्यम से दुनिया के सामने लाने की कीमत तो यशवंत को आज नहीं तो कल, चुकानी ही थी. ये तो अभी एक शुरुआत है, आगे और क्या-क्या हो सकता है इसकी तो हमे कल्पना ही नहीं है. इतने बड़े-बड़े ताकतवर और खुद को सबसे बड़ा मीडिया हाउस कहने वालों के काले कारनामे दुनिया के सामने लाने का प्रतिफल तो चुकाना ही होगा.

ऐसा नहीं है कि यशवंत जी को अपने साथ ऐसी अनहोनियां होने का पहले से कोई एहसास नहीं रहा होगा. वो भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि मीडिया घरानों के जिन ठेकेदारों के अपने दफ्तरों में होने वाले शोषण-अत्याचार और साजिशों का कच्चा चिटठा वे दुनिया के सामने ला रहे हैं वे लोग उनको फंसाने का कोई मौका नहीं चूकने वाले. शर्म की बात तो यह है कि मीडिया घरानों ने यशवंत जी को फंसाने के लिए हथियार भी एक पत्रकार को ही बनाया. व्यक्तिगत रूप से मैं नहीं जानता कि इंडिया टी.वी. के प्रबंध संपादक विनोद कापडी कौन हैं लेकिन इस घटना के बाद यह तो तय है कि ये पत्रकारों की भीड़ में छुपी एक काली भेड़ हैं जिनकी पहचान समय रहते होना बहुत जरूरी थी. यह जांच का विषय है कि पत्रकार की खाल ओढ़े बैठे कापडी जैसे ये आस्तीन के सांप आखिर किन लोगों की बीन पर नाच रहे हैं?

यशवंत को जानने वाला हर व्यक्ति इतना तो मान सकता है कि रात में वे किसी को ऐसे-वैसे एस.एम.एस कर सकते हैं, फोन पर हड़का भी सकते हैं और बहुत ज्यादा हो तो गाली-गलौज भी हो सकती है, लेकिन ये कोई भी मानने को तैयार नहीं होगा कि वे किसी पत्रकार से चौथ मांग सकते हैं और वो भी सिर्फ बीस हज़ार रुपये की? उधार भी किसी अपने से ही माँगा जाता है, विनोद कापडी जैसे व्यक्ति से वे उधार क्यों मांगेंगे? यशवंत की मित्रमंडली में सामर्थ्यवानों की कौन सी कमी है? यशवंत ने पैसा भी माँगा तो ऐसे व्यक्ति से जिसने सीधी एफ.आई.आर. करा दी? ….और यू.पी.पुलिस के बारे में तो कुछ कहना ही बेकार है. रस्सी को सांप और सांप को रस्सी बनाने में तो हमारी पुलिस को महारथ हासिल है.

खैर, यशवंत जी जब ओखली में सिर दे ही दिया है तो फिर मूसल से किस बात का डर? आप खुद ही पीड़ित-शोषित हजारों पत्रकारों की आवाज हैं, आप जैसा व्यक्ति कभी अकेला नहीं हो सकता. सच और न्याय की इस लड़ाई को और ज्यादा शिद्दत से लड़ने के लिए कमर कसे रहिये. इस देश के हजारों-हज़ार पत्रकार और आमलोग इस लड़ाई में काँधे से कांधा मिलाकर आपके साथ हैं. आपने पत्रकारिता जगत में अपने न्यूज पोर्टल के माध्यम से अखबारी दुनिया की जो नयी इबारत लिखी है वह आधुनिक पत्रकारिता में मील का पत्थर साबित होगी.

लेखक विनोद भारद्वाज ताज प्रेस क्लब आगरा के पूर्व अध्यक्ष एवं दैनिक जागरण आगरा के पूर्व डिप्टी न्यूज एडिटर और सम्पादकीय प्रभारी रहे हैं.


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