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किसानों के लिए मुफ़्त ज़हर योजना

योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया आज बहुत हल्का महसूस कर रहे थे। उन्हें लग रहा था मानो उनके सिर से कोई बड़ा बोझ उतर गया हो। बल्कि उन्हें तो ये महसूस हो रहा था कि जैसे उन्होंने माटी का कर्ज़ अदा कर दिया हो। दरअसल, जब से उन्हें ये ख़बर मिली थी कि विदर्भ के किसानों के पास ज़हर खाने कि लिए भी पैसे नहीं हैं, वे बहुत डिस्टर्ब थे, दुखी थे। उन्हें अफसोस हो रहा था कि देश के वे किसान जो अन्नदाता की तरह हैं और अपनी जी तोड़ मेहनत से अन्न उपजाते हैं, ज़हर तक के लिए मोहताज हो रहे हैं। उनसे न खाना खाया जा रहा था और न ही कुछ पीने-पिलाने का मन कर रहा था। यहाँ तक कि उनकी नींद तक उड़ गई थी। वे सुबह वॉक पर भी नहीं जा सके थे।

योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया आज बहुत हल्का महसूस कर रहे थे। उन्हें लग रहा था मानो उनके सिर से कोई बड़ा बोझ उतर गया हो। बल्कि उन्हें तो ये महसूस हो रहा था कि जैसे उन्होंने माटी का कर्ज़ अदा कर दिया हो। दरअसल, जब से उन्हें ये ख़बर मिली थी कि विदर्भ के किसानों के पास ज़हर खाने कि लिए भी पैसे नहीं हैं, वे बहुत डिस्टर्ब थे, दुखी थे। उन्हें अफसोस हो रहा था कि देश के वे किसान जो अन्नदाता की तरह हैं और अपनी जी तोड़ मेहनत से अन्न उपजाते हैं, ज़हर तक के लिए मोहताज हो रहे हैं। उनसे न खाना खाया जा रहा था और न ही कुछ पीने-पिलाने का मन कर रहा था। यहाँ तक कि उनकी नींद तक उड़ गई थी। वे सुबह वॉक पर भी नहीं जा सके थे।

दफ्तर पहुँचते ही वे किसानों को समस्या से मुक्ति दिलाने के काम में जुट गए थे और शाम होते होते तक इसका इंतज़ाम भी उन्होंने कर भी लिया। आख़िरकार मुद्रा कोष की ट्रेनिंग कब काम आती। लेकिन ये इंतज़ाम ऐसे ही नहीं हो गया। मोंटेक सिंह को इसके लिए पूरा दिमाग़ और ताकत़ लगानी पड़ी। उन्होंने कार्पोरेट जगत से अपने संबंधों का इस्तेमाल किया। उन्होंने बीजों और डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों का कारोबार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों से संपर्क साधा। यहाँ तक कि विश्व बैंक और मुद्रा कोष से भी उन्होंने बात की। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से तो वे बात कर ही चुके थे।

सभी का यही कहना था कि आर्थिक उदारवाद की बुनियाद में ये बात शामिल है कि लोगों की डिमांड का खयाल रखा जाना चाहिए और अगर आम ज़रूरत का सामान भी लोगों को आसानी से न मिले तो इससे बाज़ार की शक्तियों की कमज़ोरी ही ज़ाहिर होती है। लिहाज़ा अगर मोंटेक इस दिशा में कोई सार्थक क़दम उठाते हैं तो उन्हें सहयोग न करने का सवाल ही नहीं उठता। सबके सब किसानों की डिमांड पूरी न होने से दुखी थे और चाहते थे कि उन्हें संकट से उबारने के लिए ठोस क़दम उठाए जाएं। सभी ने अपनी तरफ से आर्थिक सहयोग देने का वादा भी किया। विश्व बैंक ने तो कम ब्याज़ दरों पर लंबी अवधि का कर्ज़ देने का भरोसा भी उन्हें दे दिया।

सारी कवायद के बाद योजना आयोग ने मुफ़्त ज़हर प्रदाय योजना को अंतिम रूप दिया था। तय किया गया कि इस देश और विदेश की कुछ कंपनियाँ बहुत ही सस्ती दरों में ज़हर सप्लाई करेंगी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए ये ज़हर देश भर की राशन की दुकानों में उपलब्ध होगा और कोई भी किसान हक़ के साथ यहाँ से ज़हर प्राप्त कर सकेगा। मना करने वाले दुकानदारों के लिए इसमें सज़ा का प्रावधान भी कर दिया गया था। मुफ्त ज़हर प्रदाय योजना में किसी तरह का घोटाला न हो इसका विशेष खयाल रखा गया था। इसके लिए एक निगरानी समिति बनाई गई थी, जो किसी भी शिकायत का निपटारा चौबीस घंटे में करने में सक्षम थी।

आयोग का कहना है कि ये बहुत ही महत्वाकांक्षी योजना है और अगर इसके अच्छे परिणाम निकले तो इसका लाभ मज़दूर, आदिवासी और दूसरे वर्गों को भी दिया जाएगा। मोंटेक का मन अब शांत था क्योंकि उनके वश में जो कुछ भी था उन्होंने कर दिया था। उन्होंने मन ही मन में सोचा कि विपक्षी दल तो आदतन उनकी इस योजना में भी खामियाँ निकालेंगे, मगर देश के किसानों को उनका एहसानमंद होना चाहिए क्योंकि इस योजना की बदौलत अगर वे चैन से जी नहीं सकते तो कम से कम चैन से मर तो सकेंगे।

राहत भरी साँस लेते हुए मोंटेक सिंह ने रिमोट उठाकर टीवी ऑन किया। न्यूज़ चैनल पर बडे-बड़े उद्योगपति, कारोबारी और

मुकेश कुमार

अर्थशास्त्री सरकार को दूरगामी परिवर्तनों वाली इस योजना के लिए बधाई दे रहे थे। उनका कहना था कि इससे पता चलता है कि सरकार आर्थिक सुधारों के प्रति कटिबद्ध है और पॉलिसी पैरालिसिस के आरोप में कोई दम नहीं है।

इस व्यंग्य के लेखक वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार हैं जो इन दिनों न्यूज एक्सप्रेस चैनल के एडिटर इन चीफ हैं.

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