नयी दिल्ली । अदालत में लंबित मामलों की रिपोर्टिंग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है। कोर्ट ने कहा कि अगर अदालत चाहे तो कोर्ट की रिपोर्टिंग पर रोक लगा सकती है लेकिन ये कम समय के लिये होगा। इस मामले में तर्क देते हुए अदालत ने कहा कि अगर रिपोर्टिंग से चल रहे मामले में दिक्कत पैदा होती है तो ऐसे मामलों में मीडिया रिपोर्टिंग पर कुछ वक्त के लिये रोक लगाई जा सकती है। कोर्ट ने ये भी कहा है कि कोर्ट खबर तय नहीं कर सकता, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को लक्ष्मण रेखा ना लांघने के लिए भी कहा।
चीफ जस्टिस कपाड़िया की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने लंबित अदालती मामलों खासकर आपराधिक मामलों की रिपोर्टिंग पर लंबे समय तक रोक लगाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। हालंकि कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी मामले में पीड़ित पक्ष के आग्रह पर थोड़े समय के लिये रिपोर्टिंग पर रोक लगाई जा सकती है। कोर्ट ने पत्रकारों को भी हिदायत दी कि उन्हें अपनी लक्ष्मणरेखा पता होनी चाहिए, ताकि कोर्ट की अवमानना के मामले न झेलने पड़े। हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि किसी मामले में पीड़ित पक्ष के आग्रह पर कुछ समय के लिए रिपोर्टिंग पर रोक लगाई जा सकती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी खबर पर रोक लगाने का काम सिर्फ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को क्राइम पर मीडिया के कोर्ट रिपोर्टिग पर अपने आदेश में कि अनुच्छेद 19-1 ए (बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) पूर्ण अधिकार नहीं है, और इसके लिए कुछ दायरे हैं। मालूम हो कि न्यायमूर्ति डी पी जैन, न्यायमूर्ति एस एस निज्जा, न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति जे एस केहर संविधान पीठ के अन्य सदस्य हैं।
इस बीच, विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में न्यूज मीडिया की बड़ी जीत हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि वो कोर्ट के मामलों में रिपोर्टिंग के लिए कायदे-कानून नहीं बना सकता। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक मीडिया को खुद अपनी हद तय करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट से जुड़े सभी मामलों की रिपोर्टिंग के संबंध में एक तरह के नियम नहीं बनाए जा सकते।
हालांकि कोर्ट ने ये जरूर कहा अगर जरूरत पड़ी तो समय-समय पर किसी विशेष मामले के संबंध में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट को सीमा-रेखा तय करने का अधिकार होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मीडिया के लिए नियम बनाना प्रेस के अधिकारों पर हमला होगा। यही नहीं कोर्ट ने ये भी कहा है कि कानून बनाने को काम विधायिका का है कोर्ट का नहीं।
पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने लंबित अदालती मामलों खासकर आपराधिक मामलों की रिपोर्टिंग पर लंबे समय तक रोक लगाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि किसी मामले में पीड़ित पक्ष के आग्रह पर कुछ समय के लिए रिपोर्टिंग पर रोक लगाई जा सकती है। साथ ही अदालत ये भी कहा है कि किसी खबर की रिपोर्टिंग पर रोक लगाने का काम सिर्फ हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तय कर सकता है।
खंडपीठ ने कहा कि अदालती मामलों की रिपोर्टिंग करते वक्त पत्रकारों को भी अपनी लक्ष्मण रेखा खुद समझनी चाहिए और अगर वो लक्ष्मण रेखा को क्रास करेंगे तो कोर्ट की अवमानना हो सकती है। इसलिए पत्रकार खुद अपनी लक्ष्मण रेखा बनाएं।
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