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कुछ लोगों को ये ग़लतफ़हमी हो गई है कि अरविंद केजरीवाल को मीडिया ने ही बनाया है

Israr Ahmed Sheikh : एक कुत्ता गाड़ी के साथ-साथ चल रहा था। कुछ वक़्त के बाद उसे लगने लगा कि गाड़ी उसकी वजह से चल रही है। कुत्ते ने गाड़ी रोकने की सोची। कुत्ता तो रुक गया मगर गाड़ी चलती रही। ये कहावत बचपन में सुनी थी। यहाँ इसलिए लिख रहा हूँ कि कुछ लोगों को ये ग़लतफ़हमी हो गई है कि अरविंद केजरीवाल को मीडिया ने ही बनाया है (मैं ख़ुद मीडिया से ताल्लुक़ रखता हूँ, इसलिए ये ना समझा जाए कि मैं इस कहावत के ज़रिये गाली दे रहा हूँ। अगर फिर भी किसी को ठेस पहुँची तो अग्रिम माफ़ी)।

Israr Ahmed Sheikh : एक कुत्ता गाड़ी के साथ-साथ चल रहा था। कुछ वक़्त के बाद उसे लगने लगा कि गाड़ी उसकी वजह से चल रही है। कुत्ते ने गाड़ी रोकने की सोची। कुत्ता तो रुक गया मगर गाड़ी चलती रही। ये कहावत बचपन में सुनी थी। यहाँ इसलिए लिख रहा हूँ कि कुछ लोगों को ये ग़लतफ़हमी हो गई है कि अरविंद केजरीवाल को मीडिया ने ही बनाया है (मैं ख़ुद मीडिया से ताल्लुक़ रखता हूँ, इसलिए ये ना समझा जाए कि मैं इस कहावत के ज़रिये गाली दे रहा हूँ। अगर फिर भी किसी को ठेस पहुँची तो अग्रिम माफ़ी)।

ख़ैर अरविंद को केजरीवाल मीडिया ने नहीं जनता ने बनाया है (केजरीवाल से मेरा मतलब जन-नेता से है) ये सच है कि मीडिया ने पहले अन्ना आंदोलन और फिर आम आदमी पार्टी को ख़ूब तरजीह दी। मगर क्या मीडिया के पास कोई दूसरा विकल्प था? आज का मीडिया सिर्फ दो तरह की ख़बरों को तरजीह देता है, एक वो जो उसे रेटिंग देती हो और दूसरी वो जो उसे धन लाभ कराये (जैसे बिना ब्रेक के नरेंद्र मोदी की रैलियाँ)। अब धन लाभ कराना ना तो अन्ना के बस में था और ना ही आम आदमी पार्टी के, मगर देश की जनता आंदोलित हो रही थी। अपार जनसमर्थन ने मीडिया को मजबूर किया कि वो रेटिंग की ख़ातिर केजरीवाल को जगह दें।

अगर मीडिया से ही नेता बनते तो 2004 में चंद्रबाबू नायडू धाराशायी ना होते और नरेंद्र मोदी की कुर्सी कब की छिन चुकी होती (तब मीडिया नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ था)। ख़ैर, बात ये चली थी कि अरविंद को केजरीवाल किसने बनाया। जब बीजेपी और कांग्रेस के नेता सरकार बनाने के सपने देख रहे थे, तब उस कड़ी धूप में अरविंद सड़कों पर जनता के हक़ की लड़ाई लड़ रहे थे। जब बीजेपी और कांग्रेस के नेता एयरकंडीशन के मज़े ले रहे थे, तब अरविंद बिजली के खम्भों पर चढ़कर लोगों के कटे हुए कनैक्शन जोड़ रहे थे। जब बीजेपी और कांग्रेस के नेता दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपने लिए सुरक्षित सीटें तलाश कर रहे थे, तब अरविंद दिल्ली में कांग्रेस की सबसे मज़बूत नेता शीला दीक्षित के ख़िलाफ़ ताल ठोंकने का 'दुस्साहस' कर रहे थे।

जब बीजेपी और कांग्रेस के नेता रज़ाइयों में दुबके हुए थे, तब अरविंद मुख्यमंत्री होने के बावजूद 4 डिग्री तापमान में जनता के हक़ के लिए फुटपाथ पर सो रहे थे। जब बीजेपी और कांग्रेस के नेता अंबानी के पैसे से चुनाव प्रचार कर रहे थे, तब अरविंद अंबानी को गैस के ज़्यादा दाम देने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे थे। कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि मीडिया नेता बनाने का काम नहीं करता है। ऐसे तमाम लोग हैं, जो हमेशा मीडिया की सुर्ख़ियो में बने रहते हैं मगर लोकसभ/विधानसभा तो दूर वार्ड का या पंचायत का चुनाव भी नहीं जीत सकते। अरविंद को केजरीवाल मीडिया ने नहीं बल्कि जनता ने बनाया है। इति सिद्धम।

पत्रकार इसरार अहमद शेख के फेसबुक वॉल से.

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