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केजरीवाल-तौकीर की मुलाकात से परेशानी किसे है?

Nadim S. Akhter : इस देश के मुसलमानों को पॉलिटिकल पार्टियों ने समझ क्या रखा है?? बिना लाठी की भैंस, कि जिधर खदेड़ो, उधर दौड़ लगा देंगे?? अगर नहीं तो बार-बार ये पार्टियां क्यों तथाकथित मुस्लिम धर्मगुरुओं के चक्कर लगाती रहती हैं?? अरे भाई, आजादी के 60 से ज्यादा साल बीत गए लेकिन पॉलिटिकल पार्टियों के रहनुमा लगता है अभी भी नहीं समझ पाए कि इस देश का मुसलमान किसी एक मौलाना-धार्मिक नेता के कहने पर उन्हें वोट नहीं दे देगा. अगर सारे के सारे मौलाना-मुफ्ती-काजी-मुस्लिम धर्मगुरू भी एक मंच पर आकर कह दें कि फलां पार्टी को वोट दे दो तो लिख के रख लीजिए. उस पार्टी को एक भी मुसलमान वोट नहीं करेगा.

Nadim S. Akhter : इस देश के मुसलमानों को पॉलिटिकल पार्टियों ने समझ क्या रखा है?? बिना लाठी की भैंस, कि जिधर खदेड़ो, उधर दौड़ लगा देंगे?? अगर नहीं तो बार-बार ये पार्टियां क्यों तथाकथित मुस्लिम धर्मगुरुओं के चक्कर लगाती रहती हैं?? अरे भाई, आजादी के 60 से ज्यादा साल बीत गए लेकिन पॉलिटिकल पार्टियों के रहनुमा लगता है अभी भी नहीं समझ पाए कि इस देश का मुसलमान किसी एक मौलाना-धार्मिक नेता के कहने पर उन्हें वोट नहीं दे देगा. अगर सारे के सारे मौलाना-मुफ्ती-काजी-मुस्लिम धर्मगुरू भी एक मंच पर आकर कह दें कि फलां पार्टी को वोट दे दो तो लिख के रख लीजिए. उस पार्टी को एक भी मुसलमान वोट नहीं करेगा.

सब जानते हैं इन तथाकथित धर्म गुरओं की हकीकत. वास्तानवी से लेकर कल्बेसादिक और शाही इमाम. और इनके जैसे बाकी और. इस देश के मुसलमानों को पता है कि सारे के सारे उनके वोट के नाम पर अपनी दुकानदारी चलाते हैं. अब ना खलीफा है और ना खिलाफत. सो मुसलमान किसी एक का हुक्म मानने के लिए बाध्य भी नहीं बताए जा सकते. तब फिर ये पार्टियां क्यों इन मुस्लिम धर्मगुरुओं के चक्कर काटती हैं. ऐसा भी नहीं है कि हकीकत उन्हें नहीं मालूम. सब मालूम है लेकिन फिर भी वे उनके पास जाती हैं. फोटो खिंचवाती हैं..ऐसा क्यों??

मुझे तो इसके पीछे राजनीतिक पार्टियों की साजिश लगती है. वो ऐसा जानबूझ कर करती हैं ताकि वोटों का ध्रुवीकरण करा सकें. ये दिखा सकें कि मुसलमान एकजुट हो रहे हैं, सो हिन्दू भी एकजुट हो जाएं. और भारतीय प्रजातंत्र की ताकत देखिए कि 100 में से 99 दफा ये पॉलिटिकल पार्टियां ध्रुवीकरण कराने में विफल रहती हैं.

अरे किस दुनिया में जी रहे हैं आप? आज के जमाने में जब बेटा, अपने बाप के कहने पर वोट नहीं डालेगा और बाप, बेटे की राय पर वोट नहीं डालेगा, तो किसी तथाकथित मौलाना या धर्मगुरु के कहने पर मुसलमान किसी खास पार्टी को वोट दे देंगे, ये बात हजम नहीं होती. सबकुछ जानबूझकर रचा गया ड्रामा है. वोटों के ध्रुवीकरण की सियासत है. इसे बेनकाब किया जाना जरूरी है.

अब भाई लोग अरविंद केजरीवाल के पीछे नहा-धो कर पड़ गए हैं. तौकीर रजा से केजरीवाल क्या मिले, शामत आ गई उनकी. क्यों भाई? गुजरात दंगों के समय नरेंद्र मोदी सीएम थे और सिख दंगों के समय राजीव गांधी पीएम. राजीव जब जिंदा थे, तब लोग उनसे बड़े हंस-हंस के गले मिलते थे. तब ये सवाल कोई नहीं पूछता था. और नरेंद्र मोदी तो अभी हयात से हैं. उनसे मिलने के लिए तो लंबी लाइन लगी रहती है. तब दंगों की कोई बात नहीं करता??? छींटे तो राजीव और मोदी पर भी पड़े हैं, उन्हें -दाग अच्छे हैं- वाला स्टेटस देने का क्या मतलब है आपका..कहीं ऐसा तो नहीं कि जो लोग तौकीर-केजरीवाल की मुलाकात पर सवाल उठा रहे हैं, वो खुद साम्प्रदायिक हैं??? अपनी पैंट ढीली है ये नहीं दिखता, चले हैं दूसरों के लंगोट में नुक्स निकालने. पहले अपनी पैंट संभालो भाई, कहीं सरक ना जाए. सरक गई तो इज्जत का फालूदा हो जाएगा.

लेखक नदीम एस. अख्तर युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. वे कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. नदीम से संपर्क 085 05 843431 के जरिए किया जा सकता है.


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