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केरल में जन्मा यह कवि कितनी सीधी, सधी, सच्ची और जमीनी कविता लिख रहा है

Hareprakash Upadhyay : जब भी हिंदी कविता की कहीं बात होती है, तो बिहार, यूपी, एमपी और राजस्थान के कुछ कवियों के उल्लेख के साथ वह खत्म हो जाती है, जबकि हिंदी कविता के भूगोल को विस्तार देने, उसकी भाव-भंगिमा को विविध आयामी बनाने का काम सुदूर उत्तर कश्मीर से लेकर सुदूर दक्षिण कन्याकुमारी तक हो रहा है। जम्मू में अग्निशेखर जी जैसी कविताएं लिख रहे हैं और हिंदी कविता के क्षेत्रफल को उन्होंने जितना बढ़ाया है, वह अभूतपूर्व है।

Hareprakash Upadhyay : जब भी हिंदी कविता की कहीं बात होती है, तो बिहार, यूपी, एमपी और राजस्थान के कुछ कवियों के उल्लेख के साथ वह खत्म हो जाती है, जबकि हिंदी कविता के भूगोल को विस्तार देने, उसकी भाव-भंगिमा को विविध आयामी बनाने का काम सुदूर उत्तर कश्मीर से लेकर सुदूर दक्षिण कन्याकुमारी तक हो रहा है। जम्मू में अग्निशेखर जी जैसी कविताएं लिख रहे हैं और हिंदी कविता के क्षेत्रफल को उन्होंने जितना बढ़ाया है, वह अभूतपूर्व है।

केरल में रहकर रति सक्सेना ने हिंदी कविता को नये क्षितिजों से जोड़ा है। रति जी ने न सिर्फ अपने काव्य कर्म से ही बल्कि वेब मैग्जीन कृत्या के माध्यम से भी हिंदी कविता को इतना अधिक विस्तार दिया है कि हिंदी पट्टी का कोई कवि शायद ही उतना कर पा रहा हो। केरल में ही युवा कवयित्री शांति नायर इतनी अच्छी कविताएं लिख रही हैं, उनका स्त्री जीवन को समझने-देखने का अपना नजरिया है। गैर हिंदी भाषी कवियों ने हिंदी कविता को संकुचित चौहद्दी से बाहर निकालकर न सिर्फ उसे विस्तृत जमीन उपलब्ध कराया है बल्कि उसे नयी दिशाएं और नई भंगिमाएं भी दी हैं, नयी ऊंचाइयां भी दी हैं।

हिंदी कविता की जड़ों को गहराई तो निश्चित तौर पर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, गुजरात के कवियों के अनुवाद और योगदान से ही प्राप्त हुई है। उनका इतना अधिक योगदान है कि अगर उसे हम गंभीरता से समझें और सहेजें तो हिंदी कविता का एक व्यापक समाज बना सकते हैं। अलग-अलग भारतीय भाषाओं में लिखने वाले कवियों के अनुवाद और हिंदी कविता में किये गये उनके सीधे प्रयासों को समेटने से हिंदी का भाव संसार और शब्द संसार इतना ज्यादा विशाल हो सकता है कि आज कविता की पाठकीयता का जो रोना है, वह भी मिटेगा और किसी भी भाषा के समक्ष हिंदी की कविता आत्मविश्वास के साथ पेश आ सकती है।

अभी विशाखापटणम् में रहने वाले युवा कवि संतोष अलेक्स का काव्य संग्रह 'पांव तले की मिट्टी' जब मुझे मिला तो इतना सुखद आश्चर्य हुआ मुझे कि हिंदी के युवा कवियों के यहाँ जो नकली अभिव्यक्ति की भरमार हो गयी है, उससे इतर केरल में जन्मा यह कवि कितनी सीधी, सधी, सच्ची और जमीनी कविता लिख रहा है। पर विडंबना यह है कि विभिन्न हिंदी प्रदेशों से जाकर दिल्ली में जम गये युवा कवियों ने जिस तरह परिदृश्य पर कब्जा कर नकली कविताओं को ही असली घोषित कर देने में कामयाबी हासिल कर ली है, उसमें संतोष अलेक्सों की जगह कहाँ होगी, मुझे यह समझ में नहीं आता। संतोष मिट्टी से जन्मा युवा कवि है और मिट्टी से प्यार करने वाला कवि है। वह मिट्टी को ही अपनी सांस, ऊर्जा और पहचान घोषित कर देने वाला कवि है। उसे अपनी कविता के लिए नकली उदघोषणाएं करने की जरूरत नहीं है, वह समूचे जीवन, समूची धरती में अपनी कविता को देख रहा है।

संतोष की कविताओं में बदलते गाँवों की चिंता, उनकी समस्याएं और ठोस अनुभवों का बयान देख कर सचमुच मेरी आँखें खुल गयीं। जब लिखने के लिए इतनी जेनुइन चीजें हैं, तो कहीं और क्या जाना। तथाकथित प्रगति ने किस तरह हमारे पर्यावरण, खेतों, फसलों, लोकगीतों, वनस्पतियों और संयुक्त परिवारों के साथ-साथ आत्मीयता को घुनों की तरह चाटना शुरू किया है, उसकी इतनी मार्मिक व प्रभावी रचना संतोष ने की है कि मैं तो इस पतली सी किताब का मुरीद हो उठा। इस किताब पर विस्तार से मैं कही लिखूंगा। फेसबुक पर सारी बातें नहीं लिखी जा सकतीं। पर मैं इस संकलन के प्रकाशन के लिए सूत्र साहित्यिक सहकारी प्रकाशन, जगदलपुर (बस्तर) को बधाई देना चाहता हूँ और साथ ही कवि संतोष अलेक्स को भी। आप चाहें तो संतोष से मंगाकर यह किताब पढ़ें। उनका नंबर है-09441019410

कवि और पत्रकार हरेप्रकाश उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

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