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‘के. न्यूज’ चैनल में हालात हो रहे बद से बदतर, छह माह बाद भी नहीं मिले नियु्क्ति पत्र

: नहीं कटता पीएफ और ईएसआई : हनुमंत राव भी मालिकों की मनमानी से लाचार : कानपुर से चलने वाले चैनल 'के. न्यूज' में कई मालिकों के होने के कारण चैनल का बंटाधार होने की हालत बन गई है. 6 माह पहले शुरू हुए इस चैनल में हनुमंत राव अपने साथ कई लोगों को लेकर जुड़े तो लगा कि चैनल चल जाएगा, पर चैनल धीरे धीरे आगे बढ़ने को कौन कहे, गर्त में जाने लगा है.

: नहीं कटता पीएफ और ईएसआई : हनुमंत राव भी मालिकों की मनमानी से लाचार : कानपुर से चलने वाले चैनल 'के. न्यूज' में कई मालिकों के होने के कारण चैनल का बंटाधार होने की हालत बन गई है. 6 माह पहले शुरू हुए इस चैनल में हनुमंत राव अपने साथ कई लोगों को लेकर जुड़े तो लगा कि चैनल चल जाएगा, पर चैनल धीरे धीरे आगे बढ़ने को कौन कहे, गर्त में जाने लगा है.

इसके पीछे चैनल में कई मालिकों का होना बताया गया है जिसमें धर्मेश चतुर्वेदी, अंशुल बंसल, संजीव दीक्षित जैसे लोग प्रमुख हैं.. चैनल में कई मामलों को लेकर अब इनमें भी मनमुटाव शुरू हो गया है. चैनल के प्रचार प्रसार को छोड़ अब ये मालिक लोग चैनल के प्रमुख पदों पर अपने खासमखास लोगों को बैठाने में जुट गए हैं, जिससे चैनल में सब कुछ गड्डमड्ड हो रहा है.

आपको बता दें कि धर्मेश अपने दोनों भाइयों को चैनल में एडजस्ट करा दिए हैं, जिसमें बड़े भाई अखिलेश को बड़ा ओहदा भी मिला है, पर वे आफिस में क्या करते हैं, यह सबको पता है. दूसरे भाई परेश चैनल में अब एंकर बन गए हैं. 'जन संसद' के विशेष कार्यक्रम में एंकरिंग भी कर रहे हैं. एंकरिंग का स्तर क्या है, आप देखेंगे तो खुद ही जान जाएंगे. पर कोई क्या कर सकता..मालिक के दुलारे छोटे भाई हैं.

वहीं अंशुल जी ने तो जीएम के पद पर अपने चहेते एक ऐसे शख्स यश अग्रवाल को बैठाया है, जो खर्चे और भुगतान के मामलों के साथ साथ लिखा पढ़त वाले मामलों को देखते हैं, पर साहब के पास एक जरूरी पत्र जारी करने को कौन कहे, 100-200 रुपए के भुगतान करने की भी औकात नहीं है. हर काम के पहले वे सबसे पूछते हैं, राय लेते हैं, तब जाकर काम करते हैं. जीएम साहब की तैनाती बस अंशुल ने चैनल में हो रहे कामों को अपनी जानकारी में रखने के लिए की है. क्योंकि वे सीधे धर्मेश एंड कंपनी से पंगा नहीं लेना चाहते हैं.

बचे संजीव दीक्षित जी तो जिलों और मंडलों में अपने पसंद के रिपोर्टर रखवाने में परेशान है, जो उनके केबल के कारोबार में मदद कर सके. उसे पत्रकारिता का कखग पता हो ठीक है.. न हो तो भी कोई बात नहीं.. इसके लिए आप पूर्वांचल और पश्चिमी यूपी में काम करने वाले लोगों को देखकर जान सकते हैं. इसी तरह की अराजकता के कारण डिस्ट्रीब्यूसन बढने की बजाय कम हो रहा है. यहां तक कि कानपुर और लखनऊ में ही यह चैनल पूरे शहर में नहीं चल पा रहा है, तो वाराणसी, गोरखपुर, मोरादाबाद, नोएडा, और झांसी की कौन कहे. उत्तराखंड में चैनल कहीं दिख जाए तो आपकी किस्मत समझिए.

चैनल में इन्हीं सबके चलते न तो कोई विज्ञापन आ रहा है, और न ही जिले के संवाददाताओं को समय से पूरा पैसा दिया जा रहा है. 100 रुपए प्रति खबर के हिसाब से तय पैसा भी देने में चैनल के सपीने छूट रहे हैं. अभी तक जुलाई के सारे रिपोर्टरों के पैसे नहीं दिए जा सके हैं. चैनल के बड़े बड़े पदों पर बैठे लोगों और काम कर रहे लोगों को अभी तक नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है.

पीएफ काटने और ईएसआई जैसी कानूनी और बाध्यकारी चीजें करने की चैनल के मालिकों ने पहल नहीं की है. जिससे कर्मचारियों मे नाराजगी और कर्मचारी हर जगह बैठ कर लोगों को कोस रहे हैं, और महुआ न्यूज जैसे बिगुल फूंकने वाले नेता का इंतजार कर रहे हैं. जो मालिकों के जुल्म के खिलाफ आवाज उठाए तो वे भी विस्फोट कर सकें. चैनल के ग्रुप एडिटर हनुमंत राव चाह के कुछ नहीं कर पा रहे हैं और जिलों से आने वाले फोन पर केवल सब कुछ जल्द ही ठीक हो जाएगा जैसे आश्वासन की घुट्टी दे रहे हैं.

के. न्यूज चैनल में कार्यरत एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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