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सुख-दुख...

कोठी बनाने व दलाली करने के लिए ही अध्‍यक्ष व सचिव बनने की होड़ है

लखनऊ। यूपी मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव को लेकर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक घमासान मचा हुआ है। कोई विशेष एजीएम की बैठक बुला रहा है तो कोई उसे असंवैधानिक दर्जा देकर अपना मेल अपने मित्र पत्रकारों को भेजने में लगा है। मेल से एक दूसरे पर कीचड़ भी उछाला जा रहा है। हमारे कई साथियों में इस बात की भी चर्चा चल रही है कि आखिर चुनाव 2012 इस बार होंगे या फिर नहीं?

लखनऊ। यूपी मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव को लेकर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक घमासान मचा हुआ है। कोई विशेष एजीएम की बैठक बुला रहा है तो कोई उसे असंवैधानिक दर्जा देकर अपना मेल अपने मित्र पत्रकारों को भेजने में लगा है। मेल से एक दूसरे पर कीचड़ भी उछाला जा रहा है। हमारे कई साथियों में इस बात की भी चर्चा चल रही है कि आखिर चुनाव 2012 इस बार होंगे या फिर नहीं?

चुनाव को लेकर आपसी मारा-मारी आखिर क्यों हुई इसकी पृष्ठ भूमि में हमारे प्रिय साथियों को जाना होगा। क्योंकि हर बार संगठन के नाम पर पंचम तल की परिक्रमा करने वाले कुछ मुठ्ठी भर पत्रकार पिछले 40 सालों से गरिमामई रही यूनियन का सत्यानाश करने में जुटे हुए है। आपसी निहित स्वार्थ के चलते इस समिति का स्वरूप ही अब खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है। सरकार से समिति के नाम पर अपनी दलाली करने का इसे पूरा एक ऐसा शस्त्र बना लिया है मानो इस समिति का अध्यक्ष या फिर सचिव बनने वाला व्‍यक्ति किसी सरकार का कैबिनेट मंत्री बन गया हो। इसी लालच के चलते इस चुनाव में कई गुट उभर कर सामने आ रहे हैं। कुछ सीनियर, जो कभी इस समिति के अध्यक्ष व सचिव भी रह चुके हैं, उनके ही गुप्त एजेन्डे के कारण यूपी की मान्यता समिति खतरे में पड़ती दिखाई दे रही है। किसी ने एक ऐसी कुण्डली बनाने का काम किया है जो हमारे लगभग 280 पत्रकारों, जिसमें प्रिंट मीडिया से लेकर फोटोग्राफर व चैनल के भाई हैं, उनकी साख दॉव पर लग चुकी है।

नियमावली के नाम पर चुनाव स्थिगत कराकर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने की कुछ मुट्ठी भर पत्रकारों का मिशन अब तक जारी है। लगभग 25 से 30 मुट्ठी भर पत्रकार भाई ऐसे होंगे जो पिछले पन्द्रह वर्षों से इस समिति को अपने इशारे पर चला रहे हैं। मेरी किसी से जाती दुशमनी नहीं है। लेकिन मुझे अफसोस होता है कि मेरे उन 250 भाइयों का क्या दोष है जो इस समिति के सम्मानित मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। इन 26 से 30 लोगों के गलत आचरण के कारण उन्हें भी गालियां मिल रही हैं। सरकार से लेकर समाज के सामने हमारी साख खराब हो रही है। इसकी चिंता किसी भी सीनियर पत्रकार को नहीं है। सिर्फ अपनी दुकान किस तरह से चले इसकी चिंता है। मेरा मानना है कि यूपी मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति का चुनाव अपने सही समय में हो जाता, एक सीनियर पूर्व अध्यक्ष ने अपनी मनमानी के चलते, जिन्‍होंने नियमावली बनाने का काम किया है जो ऐसी है कि शायद किसी को स्वीकार हो, इस पूरे बबाल को जन्म दिया है। वह काफी काबिल हैं इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन वह उन लोगों का भविष्य तय करने में जुटे हैं जो दो जून की रोटी कमाने के लिए सुबह से शाम तक परिश्रम करते हैं।

फोटोग्राफर भाइयों को इस समिति से अलग करने व किसी को तीन साल के पहले चुनाव में भाग न लेने के लिए एक ऐसे नियम को जन्म देने की बात कर रहे हैं, जो किसी बिना रजिस्‍टर्ड समिति के लिए उपयुक्त नहीं है। अगर आपसी सहमति से कोई नियम बनाया जाता है तो उस पर लिखित रूप से कम से कम दो सौ पत्रकार भाइयों के हस्ताक्षर होने चाहिए, जिससे लगे कि इस नियम को बनाने में सभी की आम सहमति ली गई है। सिर्फ मेल से स्वीकृत ले लेना और करीब पचास लोगों की एजीएम बैठक बताकर उसको थोपना कहीं का न्याय नहीं है। आज जो भी सिर फुटौव्‍वल स्थिति मीडिया सेंटर के अंदर पिछले कई दिनों से बनी हुई है उसके लिए जिम्मेदार कुछ मुठ्ठी भर सीनियर पत्रकार भाई ही हैं।

यूपी मान्यता प्राप्त पत्रकार संवाददाता समिति का अचानक महत्व क्यों बढ़ गया कि इसके लिए सिर फुटौव्‍वल जैसी स्थिति मीडिया सेंटर व लखनऊ के अलग-अलग सीटियों व विधानसभा के मीडिया सेंटर तथा कथित प्रेस क्लब में मची हुई है। इसका खुलासा मैं उन साथियों के सामने रखना चाहता हूं जो वाकई में सुबह से शाम को सिर्फ अपनी खबर के लिए परिश्रम करके में जुटे होते हैं। ऐसे उन पत्रकारों को कोई सुविधा से मतलब नहीं। उन्हें तो सिर्फ मीडिया सेंटर में सकुनू से बैठकर एक गिलास पानी पीने को मिल जाए यही बहुत है। वह रोज होम की ब्रीफिंग में आते हैं और अपना काम करके चले जाते हैं। जिसके लिए होम विभाग ने एक कप चाय की व्‍यवस्था कर रखी है जो सभी को शायद नसीब भी नहीं हो पाती। रोज शाम को चार बजे से लेकर सात बजे तक मीडिया सेंटर में क्या होता है, उस पर अगर नजर डाली जाए तो उसका स्वरूप बिल्कुल अलग दिखाई देता है। मीडिया सेंटर खबरों के संकलन के लिए होना चाहिये लेकिन यहां पर खबर कम फालतू की बातें जादा होती हैं।

नाश्ता तो ऐसे होता है जैसे किसी का रोज बर्थ डे हो। नाश्ता होना एक अच्छे संकेत को जन्म देता है। लेकिन बहस इतनी अंतिम छोर पर पहुंच जाती है कि एक दूसरे साथी की कलई खोलने के लिए कोई पीछे नहीं हटता। कोई दो किलो चीनी की बात करता है तो कोई दलाली में किसने क्या कर लिया उसकी बात करता नजर आता है। तो कोई तबादले किसने कितने करा दिए इस पर बहस होती है। बात-बात में मारपीट की नौबत भी खड़ी हो जाती है। रोज पानी पी-पी कर सरकार को गाली दी जाती है। बेचार एक चपरासी सुबह से शाम तक पानी के गिलास भरते-भरते परेशान हो जाता है। बड़बोलेपन में कुछ पत्रकार मुख्यमंत्री अखिलेश को बच्चा कहकर संबोधित कर जाते हैं। मैं यह याद दिलाना चाहता हूं कि इसी मीडिया सेंटर में पिछले चार साल तक किसी की बोलती नहीं निकलती थी, कारण था मायावती सरकार का कड़ा रूख। निगरानी के लिए सूचना विभाग के लोग लगा दिए गये थे। तब यह पत्रकार अपनी पूरी हद में रहने लगे थे। लेकिन जब लोकतंत्र बहाल हुआ तो लोकतंत्र कि दुहाई देकर फिर मीडिया सेंटर को मछली बाजार बना दिया गया।

सूचना निदेशक को अपनी उंगली में गिनने वाले कुछ पत्रकार तो उनको यहां पर लाने और ले जाने की लम्बी-लम्बी बातें करके अपने हित साधने में जुटे हैं। और मौका पाकर रोज किसी न किसी बहाने पंचम तल में चौथे तल के माध्यम से या फिर अपने किसी खास विशेष सचिव के कारण पंचम तल की परिक्रमा करने लगते हैं। और उनकी धड़ल्ले से दुकान चालू हो जाती है। जो वर्तमान में एक गुट को नहीं भा रही है। क्योंकि वहीं काम कुछ लोगों ने मायावती सरकार में किया था। इस लिए अब बारी दूसरे गुट की है तो एक गुट परेशान है कि कैसे अध्यक्ष या सचिव बनकर हम सरकार के नाक के बाल बन जाए। पूरी लड़ाई इसी बात की है। अगर मेरी यह बात गलत हो तो कोई मुझे मेल करके इसका खंडन तो करे। तब मैं उसको बताऊंगा कि तुम क्या और कैसे कर रहे हो। मेरा मानना है कि तभी यह चुनाव नहीं हो पा रहे हैं। और विवाद खड़े किए जा रहे हैं। मुझे तो यह दिखाई दे रहा है कि कहीं मारपीट इतनी न बढ़ जाए कि एक दूसरे के खून के प्यासे हम पत्रकार भाई हो जाएं।

मेरा मानना है कि जब से इस समिति के अध्यक्ष व सचिव को मान्यता समिति में भेजा जाने लगा है, तब से इस चुनाव को लेकर कडुवाहट आपस में पैदा हो गई है। इस वर्चस्व को खत्म करना होगा। दूसरा कारण यह है कि अगर कोई अध्यक्ष बनता है तो सरकार को उसको किसी भी सूरत में सूचना आयुक्त के पद पर नहीं भेजना चाहिए। सूचना आयुक्त पत्रकार कोटे से समाप्त कर देना चाहिए। पत्रकार अगर कोई सूचना आयुक्त की लाइन में लगा हो तो उसकी योग्यता को बारीकी से जांचा जाए कि उसका मीडिया व समाज में क्या योगदान है और उसकी क्या योग्यता है उस पर ध्यान देना चाहिए। मेरा तीसरा सुझाव यह है कि किसी भी ऐसे पत्रकार को पंचम तल की मोहर नहीं लगनी चाहिए जो सिर्फ दलाली करने पंचम तल में जाता हो। मोहर लगे तो सभी पत्रकारों के प्रेस कार्ड में मोहर लगे, अगर सभी के कार्ड में नहीं लग सकती तो किसी के पास में मोहर न लगे। प्रेस कार्ड की महता सभी की बराबर हो। इसके अलावा मुख्यमंत्री की प्रेस कवरेज में उन सभी पत्रकारों को बुलाया जाए जो पत्रकार किसी भी पत्र से या फिर चैनल से जुड़े हो। छोटा बड़ा मानक कोई नहीं होना चाहिए।

स्वतंत्र पत्रकारों को मुख्यमंत्री के भोज में सम्मानपूवर्क आमंत्रित करें लेकिन रोज होने वाली प्रेस कांफ्रेंस में नहीं। क्योंकि 280 लोगों को बैठने की पूरी व्‍यवस्था से प्रेस कांफ्रेंस में बुलाना जगह के अभाव में संभव नहीं है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व सूचना निदेशक को जल्द से जल्द प्रेस क्लब के मामले को भी संज्ञान में लेकर कार्रवाई करके निपटाना होगा। जिससे कोई और बड़ी अनहोनी होने से बच सके। क्योंकि इसको लेकर लोगों में काफी नाराजगी है। एक संगठन ने इस पर कई वर्षों से बलात कब्जा कर रखा है। सभी राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकार व लखनऊ जिले के मान्यता प्राप्त पत्रकार इसके अपने आप सदस्य बन सके। ऐसी ब्यवस्था सूचना निदेशक को करना चाहिए। मेरा मानना है कि यूपी प्रेस कलब में तत्काल सूचना निदेशक को रिसीवर के रूप में बैठा देना चाहिए जिससे सभी पत्रकारों का हित हो सके। सूचना निदेशक के हस्ताक्षर से प्रेस क्लब की सदस्यता का कार्ड जारी हो। यूपी में कोई ऐसा प्रेस क्‍लब नहीं है, जिसमें सभी सगंठन के लोग एक साथ बैठकर अपने परिवार के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम कर सकें। मुर्ग मुस्सलम की दुकान वहां से हटाई जाए जिससे प्रेस क्लब की साख को बचाया जा सके। प्रेस क्लब में जिस एक संगठन का कब्जा है उसके कब्जे को सरकार शीघ्र मुक्त कराये। जिससे सभी पत्रकार भाइयों में आम भावना सरकार के प्रति अच्छी बन सके।

मैं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारों के हितों की बात रखता आया हूं। तीन बार अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ चुका हूं। लेकिन जीत नहीं सका। मेरी लड़ाई जारी है। मैंने अप्रैल में 15 सुझाव पत्रकारों के हितों के लिए प्रेस परिष्द के अध्यक्ष काटजू जी को दिए थे। उस ज्ञापन को काटजू जी ने सचिव मुख्यमंत्री त्रिवेदी जी को जांच के लिए भेजे थे, जिस पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। उन ज्ञापन पर सचिव महोदय शीघ्र कार्रवाई करके प्रेस परिष्द व मुख्यमंत्री को बताएं। एक प्रति मुझे भी प्रेषित करें कि आखिर अब तक क्या किया गया। मेरी अपील है अपने उन पत्रकार भाइयों से जो किसी संगठन से जुडे नहीं है, लेकिन सुलझे दिमाग से काम लेते हैं। उन्हें अपने बीच के उन सीनियर लोगों से पूछना चाहिए, जो पिछले बीस वर्षों से अध्यक्ष बनते आए हैं या फिर अध्यक्ष बनाते हैं, कि उन्होंने पत्रकारों के लिए क्या ठोस काम किए हैं। सिर्फ दलाली करके करोड़ों रुपये की अकूत संपत्ति एकत्र करना ही उनका काम है। गोमतीनगर में आलीशान कोठी के मालिक बनना या अध्यक्ष या सचिव बनने की होड़ में लगे रहना है।

चुनाव के समय ही उन्हें पत्रकारों की याद क्यों आती है। किसी पत्रकार के निधन के बाद उसके परिवार को मदद दिलाने का प्रयास किया है इन लोगों ने कभी किसी के निधन पर एकत्र होकर दो मिनट का शोक मनाया है इस समिति ने। किसी को सरकारी मकान दिलाने में समिति ने उसकी मदद की है। किसी को मान्यता दिलाने में सहयोग किया हो, अगर किया है तो उसे फिर चुना जाना चाहिए। सिर्फ सोफा लगवा देना, मीडिया सेंटर में क्या होना चाहिए क्या नहीं यह कहना, गलत नियमावली बनाने की सलाह देना यही काम सिर्फ समिति का होना चाहिए इस पर इस बार हमारे पत्रकार भाई उनसे अहम सवाल अवश्य पूछे। और अपनी राय दें। मेरे इस सुझाव से अगर मेरे भाई सहमत हों तो इस बार खड़े हो जाएं एक ऐसे अध्यक्ष को चुनने के लिए जो वाकई में अपने भाइयों के हितों के लिए काम कर सके। कुल मिलाकर अब वक्त आ गया है कुछ नया करने का या तो समिति भंग कर दी जाए या फिर उसे एक सही स्वरूप में फिर से लाकर एक ऐसे चेहरे को सामने लाया जाए जो वाकई में पत्रकारों के हितों के लिए काम कर सके। उसमें मेरा चेहरा अगर ऐसा लगे तो मुझे एक मौका दिया जाए। कुल मिलाकर अध्यक्ष या सचिव बनने का यह मतलब नहीं होना चाहिए कि अपना निहित स्वार्थ का हित साधना हो। मेरे इस सुझाव पर अगर आप सहमति दें और मुझे मेल करके कहें कि मैं अध्यक्ष पद पर फिर चुनाव लडूं तो मैं अपनी सहमति से इस प्रयास में जुटने का काम करूंगा। कुल मिलाकर यूपी मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति का चुनाव जल्द होना चाहिए लेकिन उसमें मारा-मारी करने वाले लोगों को चिन्हित करके उसे उस फोरम से अलग करके बर्खास्त करने का काम सख्ती से किया जाना चाहिए।                                 

आपका अपना साथी                                                                                                                                       

प्रभात कुमार त्रिपाठी

राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता

लखनऊ


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