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सुख-दुख...

कोरमा बिरयानी और मुस्लिम पत्रकार

बात 1992 की है। संघ परिवारी बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर चुके थे जिसके विरोध में दिल्ली के जाफराबाद में लोग प्रदर्शन कर रहे थे। वहां कोई सरकारी सम्पत्ति नहीं थी। सड़क पर बसों का आवागमन बंद था। तभी पुलिस ने आकर गोली चला दी जिसमें तीन लोग मारे गए और कई घायल हो गए। गोली चलने पर भीड़ गलियों में चली गई तो तुरंत कर्फ्यू का ऐलान कर दिया गया। मेरे तथा कई अन्य पत्रकारों के रिश्तेदार जाफराबाद में रहते थे। पता चला कि रात में तलाशियां होंगी। यह सुन कर सब चिंतित हो गए क्योंकि तलाशी में पुलिस लूटपाट तो करती ही है, साथ ही महिलाओं की जो बेइज्जती करती है, वह असहनीय होती है।

बात 1992 की है। संघ परिवारी बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर चुके थे जिसके विरोध में दिल्ली के जाफराबाद में लोग प्रदर्शन कर रहे थे। वहां कोई सरकारी सम्पत्ति नहीं थी। सड़क पर बसों का आवागमन बंद था। तभी पुलिस ने आकर गोली चला दी जिसमें तीन लोग मारे गए और कई घायल हो गए। गोली चलने पर भीड़ गलियों में चली गई तो तुरंत कर्फ्यू का ऐलान कर दिया गया। मेरे तथा कई अन्य पत्रकारों के रिश्तेदार जाफराबाद में रहते थे। पता चला कि रात में तलाशियां होंगी। यह सुन कर सब चिंतित हो गए क्योंकि तलाशी में पुलिस लूटपाट तो करती ही है, साथ ही महिलाओं की जो बेइज्जती करती है, वह असहनीय होती है।

केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह को फोन मिलाया तो उन्होंने शाम को बुला लिया। शाम तक हिंदी उर्दू अंग्रेजी और एजेंसियों के बीसेक पत्रकार जमा हो गए। मंत्री के आवास पर गए। पुलिस द्वारा बेमतलब गोली चलाए जाने से सभी गुस्से में थे। माहौल काफी उत्तेजक था। सभी जोर-जोर से बोल कर सरकार की आलोचना कर रहे थे। अर्जुन सिंह ने टेप रिकार्डर बीच में रख कर बताया कि अभी वह मंत्री परिषद की बैठक में जाने वाले हैं आपकी बातें वहां सबको सुनाएंगे ताकि लोगों के गुस्से का सब को पता चल सके। हमारी तथा जाफराबाद के लोगों की दो मांगें थीं। पहली कि तालाशी न ली जाए और दूसरी कि इलाके के डी. सी. पी. को तुरंत हटाया जाए। सवेरे पता चला कि तलाशी नहीं ली गई और इलाके के डी. सी. पी. का भी तबादला कर दिया गया। सब बहुत प्रसन्न हुए और तय पाया कि सब समय-समय पर मिलते रहेंगे। इस प्रकार मुस्लिम पत्रकारों का यह एक अनौपचारिक संगठन बन गया जो समय-समय पर मंत्रियों से मिल कर मुसलमानों की समस्याओं पर बात करता रहता था। मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनीवर्सिटी इसी अनौपचारिक संगठन का ही ब्रेन चाइल्ड थी।

अब सुनिए वह कहानी जिसके कारण यह अनौपचारिक संगठन न केवल भंग हो गया बल्कि बदनाम भी हो गया और इस सबके पीछे कोरमा बिरयानी ने खासा रोल अदा किया। तब एक जुमला बहुत मशहूर हुआ वह यह कि मुसलमान और खास तौर पर मुस्लिम पत्रकार दिमाग से नहीं पेट से सोचते हैं। पेट में माल जाते ही सोच बदल जाती है। यह बातें एक दूसरे से मजाक में कहते रहते थे। अब सुनिए कहानी। एक थे कारी मुहम्मद मियां मजहरी। नरसिंह राव के काफी निकट थे। राव साहब ने उन्हें अल्पसंख्यक वित्त विकास निगम का अध्यक्ष बना रखा था। एक दिन उनका निमंत्रण मिला कि वह मुस्लिम पत्रकारों की दावत करना चाहते हैं। मेरी समझ में यह दावत नहीं आई। कई मित्र बहुत उत्साहित थे। कोरमा बिरयानी इसटू और कबाब जो मिलने वाले थे। मुझे दाल में काला नजर आ रहा था सो मैंने इस दावत में जाने से कई मित्रों को मना किया। मगर कोई माना नहीं। दावत से लौट कर बताया गया कि दावत बहुत शानदार रही आप तो बेमतलब परेशान थे। दावत के दौरान कारी ने सबके फोटो खींच लिए थे। पूछने पर बताया था कि यादगार के लिए हैं।

कारी मियां का अपना एक साप्ताहिक अखबार था। दावत के बाद कारी मियां ने अखबार में सब के फोटो छाप दिए और हैडिंग लगाया– प्रधानमंत्री नरसिंह राव के समर्थन में जुटे मुस्लिम पत्रकार। अखबार पढ कर सब हक्का बक्का रह गए मगर अब हो भी क्या सकता था। सब एक दूसरे से मुंह छुपाते फिर रहे थे। अखबार काफी संख्या में छापा गया था। अन्य पत्रकारों को भी पता चल गया तो बदनामी में और इजाफा हो गया। इनमें कई पत्रकार घोषित रूप से कांग्रेस के विरोधी थे। उन्हें बहुत परेशानी हो रही थी। चूंकि लोग उन्हें कटघरे में खड़ा कर रहे थे।

इस बीच एक संघी पत्रिका ने एक रिपोर्ट छाप दी कि अब पत्रकारों में भी साम्प्रदायिकता का प्रवेश हो गया है। दावत के कारण सब अपराध बोध से ग्रस्त तो थे ही, इस रिपोर्ट ने और परेशान कर दिया। इसके बाद सब लोग फिर मिलने का साहस नहीं कर सके और यह अनौपचारिक संगठन कोरमा बिरयानी के चक्कर में अपनी मौत मर गया।

संगठन भले ही बिखर गया मगर कारी साहब का खेल पूरा हो गया था। उन्होंने दावत और अखबार का कई गुना खर्च प्रधानमंत्री के कोष से वसूल लिया था जिसका प्रबंध उनके एक खास एनके शर्मा करते थे। उस समय मुसलमानों के नाम पर कई लोग सक्रिय थे। कोई पेश इमामों का सम्मेलन राव के समर्थन में कर रहा था तो कोई पीरों के सज्जादा नशीनों का। ऐसे में मुस्लिम पत्रकारों का सम्मेलन कारी मियां का हिट प्रोग्राम था। अंत में कई लोग मेरे पास आए और कहा कि इस संगठन को दोबारा मैं ही खड़ा कर सकता हूं। मगर मैंने साफ कह दिया कि अब यह नहीं हो पाएगा क्योंकि फिर अगर कहीं से कोरमा बिरयानी की दावत आ गई तो फिर कई लोग दिमाग के स्थान पर पेट से सोचना आरंभ कर देंगे।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

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