सरकारी दफ्तरों के भीतर दीवार पर धूल फांकते सत्यमेव जयते को क्या कभी आपने देखा है? मकड़ी के जाले के नीचे दम घुटते इस शब्द की व्यथा-वेदना को क्या आपने कभी महसूस किया है? यही नहीं लाठी लेकर पगडंडियों पर चलने वाले एक बुजुर्ग के दृश्य को आपने कभी गौर से देखा है। अगर नहीं तो मैं आप को अंधा नहीं कहूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि देखने के लिए सिर्फ आंखों की जरूरत नहीं होती। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि सत्य एवं अहिंसा के महान पुजारी महात्मा गांधी को राजघाट पर कभी सिसकते हुए सुना है? राष्ट्रपिता को किसी गांधी प्रतिष्ठान में आपने दुःखी महसूस किया है। अगर नहीं तो आप आंखों वाले अंधे हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से मेरे आरोप भले ही मिथ्या साबित हो जायें मानवीय दृष्टि से मैं सही साबित होउंगा। खैर, मेरा मूल बिंदु यह है कि सत्यमेव जयते के इस ध्येय वाक्य से आप परिचित हैं? आप इस शब्द को महसूस करते हैं? कि सत्य की विजय होती है। आप इस सवाल पर भावुक न हों। जरा सोचिए। समझिए एवं समझाइये, हमें भी बताइये कि सत्यमेव जयते का क्या करें। चटनी एवं मुरब्बा समझ कर खायें या किसी पत्र-पत्रिका का प्रेस जैसा स्टीकर समझकर अपनी गाड़ी पर (अगर है तो) चिपका लें। सत्यमेव जयते को महान गीता समझ लें या फिर टीवी पर प्रवचन करने वाले संत-महात्माओं का शब्द संबल। क्या करूं इस सत्यमेव जयते का?
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं सत्य की विजय होती है। मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम भी यही बताते रहे हैं लेकिन हम क्या करें। मान लें कि सत्य की ही विजय होती है। पिछले दिनों अपने अभिन्न मित्र एवं सहपाठी से यही सवाल कर बैठा। चाय के कप से उड़ते भांप के बीच बुदबुदाते हुए उन्हें देखकर मैं समझ गया कि वे क्या सोचते हैं लेकिन किसी बे-शर्म, बे-हया इन्सान की तरह जब दोबारा यही सवाल पूछा तो वे तिलमिला उठे। असहज हुए मेरे मित्र ने चाय का कप अपने बगल में कुछ पटकते हुए कहा कि बेकार की बातों के लिए यहां मत आया करो। मैंने हिम्मत नहीं हारी। पूछ बैठा- महज सवाल ही तो किया है इस पर आप आवेश क्यों प्रकट करते हैं।
हमारे संवाद को मित्र की धर्मपत्नी भी सुन रही थीं। दरवाजे से कमरे में लगभग घुस कर तुनकते हुए बोलीं- 7 साल की अपनी बीमार बच्ची को लेकर सरकारी अस्पताल गए थे हम! डॉक्टर के सिर के ठीक उपर दीवार पर लिखा था सत्यमेव जयते। हम अपनी बच्ची के इलाज के लिए डॉ. से मिन्नते करते रहे लेकिन उसने हमारी एक नहीं सुनी। गोल्फ खेलने चला गया। हम रोते रहे, बिलखते रहे, घिघियाते रहे लेकिन वह हमें रौंदता हुआ चला गया। उसी रात हमारी बेटी इस दुनिया से विदा हो गई।
मैं मौके की गंभीरता समझ कर धीरे से निकल लिया। मैं अपने आप से सवाल करता रहा। आपसे भी करता हूं कि एक दम्पति का अस्पताल जाना, एक डॉक्टर का इलाज नहीं करना एवं गोल्फ खेलने चले जाना, उसकी कुर्सी के उपर दीवार पर सत्यमेव जयते लिखा होना, बीमार बच्ची के माता-पिता का हृदय-विदारक चीत्कार एवं उस मासूम बच्ची का मौत को गले लगा लेने से सत्यमेव जयते का क्या सम्बन्ध है? मैं यह भी जानना चाहता हूं कि उस डॉक्टर की गलती क्या थी वह भी तब जब उसकी ड्यूटी का समय पूरा हो चुका था। क्या डॉक्टर रुक जाता तो सत्य की विजय होती, क्या बच्ची बच जाती तो सत्यमेव जयते हो जाता? सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि सत्य है क्या? कहीं बच्ची का मर जाना तो नहीं?
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जनपद में रह रहे एक परिवार के 6 सदस्यों ने मौत को गले लगा लिया। लोग कहते हैं कि एक दबंग ने पहले इस परिवार की जमीन पर कब्जा किया एवं बाद में सौदा करने के नाम पर बहू-बेटियों पर गंदी निगाह रखने लगा। परिवार शासन-प्रशासन से गुहार लगाकर थक गया। बाद में थक हार कर सामूहिक रूप से इस जहां से विदा हो गये। बिहार में भ्रष्टाचार से लड़ रहे इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे को यही यकीन था कि अंत में सत्य की विजय होती है लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि एक ईमानदार अफसर को सत्य की लड़ाई लड़ने के लिए ईनाम में मौत मिली, मौत। उनके परिजनों का आरोप है कि हत्यारे आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। इस सत्य के आप मायने तलाशेंगे तो निराशा हाथ लगेगी लेकिन इस डर से क्या हम ऐसा करना छोड़ दें। सत्येन्द्र दुबे की कुर्बानी चीख-चीख कर सवाल कर रही है कि क्या सच में सत्यमेव जयते है? हम सवालों को नजरअंदाज करते हैं, बहरे-गूंगे एवं अंधे बन जाते हैं क्योंकि ऐसे मामलों से डरते हैं। सत्यमेव जयते सवालों के घेरे में है, संदेह के दायरे में है, असमंजस के जाल में है। जरा सोचिए!
युवा आईपीएस नरेन्द्र कुमार मुरैना मध्य प्रदेश में अवैध खनन रोकने के लिए निकलते हैं। एक अभियान चलाते हैं, सत्य के लिए तत्पर रहते हैं लेकिन हश्र ऐसा कि रूह कांप जाये। खनन माफिया उन पर ट्रैक्टर चढ़ाकर मार डालता है। कुछ लोग कहते सुने गये कि सत्य मारा गया। आईपीएस ने अपने आप को मातृभूमि की बलिवेदी पर न्यौछावर कर दिया क्योंकि वे सत्यमेव जयते में यकीन रखते थे। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन को नक्सलियों ने अगवा किया एवं अपनी शर्तें मनवाने के बाद रिहा कर दिया। इस प्रकरण में यह तय करना मुश्किल है कि सत्य के साथ माओवादी थे अथवा राज्य सरकार। लेकिन एलेक्स पॉल अपना कर्तव्य निभा रहे थे यही सोचकर कि सत्य की विजय होती है। सत्य की विजय हुई या नहीं आप तय करें।
एक सवाल रह रह कर मन को कचोटता है कि सरकारी कार्यालयों में ही क्यों सत्यमेव जयते होता है। कहीं सत्यमेव जयते को किसी दायरे में तो नहीं ला दिया गया वैसे ही जैसे जन लोकपाल विधेयक को लोकपाल विधेयक के दायरे में बांध दिया गया। सरकारी दपतरों में सत्यमेव जयते कहीं इस लिए तो नहीं लिखा होता कि सरकार जो करती है वही सत्य होता है और उसी की विजय होती है। समझ में आ रहा है कि इस वाक्य को भी चश्मे में उतार लिया गया है। शायद यही वजह है कि बड़े-बड़े घोटालों की खबर उन्हीं के मन्त्रालयों से आती है जहां बड़े-बड़े अक्षरों में सत्यमेव जयते अंकित होता है। यहां से संदेह का दायरा बढ़ता जाता है, तस्वीर धुंधली होती जाती है, महात्मा गांधी के दुःखी होने का एहसास होता है, शर्म आती है एवं बोध होता है कि सत्यमेव जयते एक वाक्य मात्रा है, अक्षर मात्र है और कुछ नहीं। ठीक वैसा ही जैसे शरीर और आत्मा। आत्मा नहीं तो शरीर का क्या मतलब।
6 मई से एक निजी टेलीविजन चैनल पर महान अभिनेता आमिर खान सत्यमेव जयते को फिर से परिभाषित करने का प्रयास कर रहे हैं। देखते हैं क्या होता है। जो लोग आमिर खान को जानते हैं उनको पता है कि उनके कार्यक्रम से उम्मीद की रोशनी की किरण (उनकी पत्नी नहीं) आ सकती हैं। वे आग लगायेंगे तो धुंआ उठेगा जरूर। जब चुभेगी बात तो बनेगी बात के तर्ज पर आमिर के इस शो से इतनी उम्मीद है कि धूल फांकते सत्यमेव जयते से कुछ गंदी परतें जरूर साफ होंगी। मकड़ी के जाले जरूर हटेंगे। हम सोचेंगे जरूर- सत्यमेव जयते।
लेखक देवनाथ अमर भारती समाचार पत्र के मुख्य समाचार संपादक हैं.





