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सुख-दुख...

क्या ‘गीता’ वाकई अतिवादी विचारों का ग्रंथ है?

गीता में है क्या? क्या इसमें असहिष्णुता की हिमायत की गयी है? क्या इसमें धार्मिक भेदभाव की गुंजाइश है? गीता को अपने-अपने ढंग से समझने की तमाम लोगों ने कोशिश की है। किसी ने इसे ज्ञान का ग्रंथ कहा तो किसी ने जीवन में स्वतंत्रता के मूल्यों के लिए संघर्ष का? मैंने भी इसे समझने की कोशिश की, अभी भी कर रहा हूं। कहते हैं यह कृष्ण के उपदेश हैं पर कृष्ण के पास उस समय इतने लंबे उपदेश का वक्त कहाँ था, जब दोनों पक्षों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं और अर्जुन विषादग्रस्तता और हताशा में डूब रहा था।

गीता में है क्या? क्या इसमें असहिष्णुता की हिमायत की गयी है? क्या इसमें धार्मिक भेदभाव की गुंजाइश है? गीता को अपने-अपने ढंग से समझने की तमाम लोगों ने कोशिश की है। किसी ने इसे ज्ञान का ग्रंथ कहा तो किसी ने जीवन में स्वतंत्रता के मूल्यों के लिए संघर्ष का? मैंने भी इसे समझने की कोशिश की, अभी भी कर रहा हूं। कहते हैं यह कृष्ण के उपदेश हैं पर कृष्ण के पास उस समय इतने लंबे उपदेश का वक्त कहाँ था, जब दोनों पक्षों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं और अर्जुन विषादग्रस्तता और हताशा में डूब रहा था।

नहीं, गीता कृष्ण द्वैपायन यानी वेद व्यास की प्रतिभा से उपजी रचना है। अर्जुन, भीष्म, द्रोण, दुर्योधन इसके पात्र हो सकते हैं, कृष्ण का राजनीति कौशल इसकी प्रेरणा हो सकता है लेकिन इसका विराट रचनात्मक वैभव व्यास की उत्कट प्रतिभा का परिणाम है। गीता का कृष्ण एक असाधारण विवेकशील मनुष्य है, जिसने स्वयं को खोज लिया है, जिसके जीवन में पराजय के लिए कोई जगह नहीं है, जो युद्ध को जय या पराजय की दृष्टि से नहीं बल्कि युद्ध की दृष्टि से देखता है।

समूचा जीवन ही युद्ध है। युद्ध से कैसे भाग  सकते हो। युद्ध से भागने का मतलब जीवन से भागना है। मेरे ख्याल से यह कृष्ण असामान्य तो है पर अलौकिक नहीं। यह कृष्ण या तो उस मिथकीय कृष्ण से अलग है, जिसके पैदा होते ही कारागार के ताले खुल जाते हैं, जो बाँसुरी की धुन पर पेड़ों, पशुओं को नचाता है, जो सैकड़ों ग्राम्य युवतियों के साथ महारास करता है या फिर व्यास ने स्वयं उसे अलग कर दिया है। व्यास ने गीता के नायक के रुप में जिस कृष्ण को चुना, वह जीवन की बाँसुरी में हवा फूंकता है, उसकी सम-विषम धुनों को पहचानता है, मनुष्य के विकास की संभावनाओं को अनेक स्तरों पर समझता है। जब व्यास अपने कृष्ण को रचते हैं तो वे हर मनुष्य में उसके होने की संभावना के साथ रचते हैं। मनुष्य का तर्क, उसका विवेक और उसका चैतन्य ही व्यास का कृष्ण है।

कृष्ण की परम संभावना काल्पनिक नहीं है, वह हर व्यक्ति के भीतर निहित है। यह आप पर है कि आप अपनी संभावना को कितना जगा पाते हैं, आप स्वयं को कितना खोज पाते हैं। सबको अलग-अलग तरीके से खुद को खोजना पड़ता है। यह नितांत वैयक्तिक है। कोई भी दो आदमी एक रास्ते पर नहीं जाते। सबको अपना पथ स्वयं बनाना पड़ता है। व्यास का मानना है कि ये पथ आगे जाकर तीन बड़े राजपथों पर खुलते हैं। कर्म, ज्ञान और भक्ति। इनमें कौन सा श्रेष्ठ है, इस पर बहस होती रही है, हो सकती है। मेरी समझ में ये तीनों अलग-अलग रास्ते नहीं बल्कि मनुष्य के विकास के तीन चरण हैं। जाने-अनजाने सहज रूप से हर कोई इसी तरह विकसित होता है। जो इस प्रक्रिया को नहीं जानते, उनके भटकने की आशंका रहती है पर जो जानते हैं, वे भटकते नहीं, वे अपना विकास तेज कर सकते हैं। भक्ति पहले। यह उस बेचैनी का नाम है जो स्वयं की तलाश के लिए प्रेरित करती है। भजन अपना ही। मैं हूं क्या, कौन, किसलिए? मेरी अर्थवत्ता क्या है, मेरे जीवन का युद्ध क्या है, सरोकार क्या है? यह प्रेरणा ज्ञान तक ले जाती है। ज्ञान निर्णय तक पहुंचने, जीवन के लक्ष्य को निश्चित करने, युद्ध की दिशा तय करने का क्षण है। यह बहुत आसान काम नहीं है। इसमें समय लग सकता है। इस प्रक्रिया में कई बार भ्रम भी होता है कि ज्ञान हो गया इसलिए उसका परीक्षण भी जरूरी है। समाज, देश, काल की जरूरतों के सन्दर्भ में उसकी परीक्षा करनी होती है।

एक बार विवेकसम्मत और तार्किक ढंग से अपने दुश्मन और अपने युद्ध का निश्चय करने के बाद कर्म की बारी आती है। ज्ञान कोई एकरस और अंतिम निश्चय जैसी अवधारणा नहीं है, नये सन्दर्भ और नयी परिस्थितियां इसका परिष्कार भी करती रहती हैं। हाँ, उसके परिष्कार की भी दिशा होती है, यह निरुपाय या अनिर्दिष्ट नहीं होता। भक्ति और ज्ञान का परिपाक कर्म में होता है। व्यास के समय में कभी भक्ति या ज्ञान श्रेष्ठ रहा हो तो रहा हो पर जीवन की जटिलताएं जिस तरह बढ़ी हैं, संघर्ष का फलक जिस तरह विराट हुआ है, वंचना जिस तरह पूरे परिदृश्य पर छाती जा रही है, उसमें कर्म ही श्रेष्ठ पथ है। पर व्यास निष्काम कर्म की सलाह देते हैं। कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। व्यक्ति जब केवल अपने लिए कुछ करना चाहता है तो वह परिणाम से संचालित होता है। केवल परिणाम का चिंतन कर्म की गतिशीलता भंग  करता है और कई बार हताशा में भी ले जाता है। हम खड़े-खड़े परिणाम के बारे में ही सोचते रह जाते हैं, समय निकल जाता है। चूंकि परिणाम केवल  व्यक्ति के प्रयास, उसकी मेधा या उसकी क्रियाशक्ति की परिणति नहीं होता, उसमें कई अनजाने, अनाहूत कारक भी अपनी भूमिका अदा करते हैं, इसलिए प्रयास की निरंतरता परिणाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

एक बात और, अगर आप स्वार्थ संकल्प को स्थगित कर दूसरों के दुख, दर्द, पीड़ा, वंचना, समाज की बेहतरी के संकल्प से सक्रिय होते हैं तो अनायास आप परिणाम की चिंता से मुक्त हो सकते हैं। समाज के लिए आप के विचार और कर्म की उपयोगिता ही तय करती है कि आप का कर्म श्रेष्ठ है या नहीं। अगर आप निरंतर ज्ञान यानी विचार से लैस होकर सामाजिक विषमताओं को खत्म करने में जुटे हुए हैं तो आप के पास परिणाम की चिंता के लिए वक्त नहीं होगा। अतीत और भविष्य की चिंता किये बगैर हर परिणाम को स्वीकार करना और आगे बढ़ना ही कर्मयोग है। जो इस रास्ते पर चल रहा है वही गीता का सार तत्व समझ सकता है, कोई और नहीं। 

लेखक डा. सुभाष राय लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

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