आप खुद देखिये लगभग सभी समाचार चैनल स्पीड न्यूज़, शतक न्यूज़ ,न्यूज़ सेंचुरी जैसे बुलेटन में पच्चीस से तीस खबरों को सौ खबरें बनाकर पेश कर रहे हैं जबकि दावा शीर्षक में सौ खबरों का बड़े जोर शोर से किया जा रहा है. ये खबरें देखने वालों के साथ धोखा नहीं तो क्या है?
समझ नहीं आता कि मीडिया को लोकतंत्र का पहरेदार और चौथा खम्भा कहने वाला बुद्धिजीवी संपादक मंडल बुलेटिन के इस गिरते स्तर पर क्यों खामोश है? शायद इसलिए कि उनसे सवाल पूछने का साहस कोई नहीं दिखाता या फिर प्रबंधन सिस्टम में मुंह नहीं खोल पा रहे? आज किसी चैनल के पास एसआईटी टीम नहीं हैं और एएनआई के आ जाने से रिपोर्टरों की संख्या भी दिनोंदिन घटती जा रही है. कम खर्चे पर एएनआई से, बीस पच्चीस खबरें उठा कर उनका शतक बुलेटिन बनाकर खबरें दर्शको के आगे रख देने से दर्शक ठगा सा महसूस करता है. दर्शक क्या करे, मजबूर है यही देखने को. लेकिन क्या कर रहे हैं न्यूज़ चैनल वाले, चैनल में मोटी तनख्वाह लेने वाला सम्पादक इस पर नजर क्यों नहीं रखता? क्या उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह खबरों की गुणवत्ता बनाये? और तो और आखिर क्यों एनटीआरए नज़र नहीं रखता?
न्यूज़ चैनल अपनी गिरती टीआरपी के लिए खुद दोषी हैं, दर्शक खबरें चाहता है लेकिन खबरें खो सी गयी हैं. शाम होते ही खबर कि जगह बहस ने लेनी शुरू कर दी है. रिपोर्टर पैदल हो गए है, खबर के लिए सोच खतम होती जा रही है. कॉस्ट कटिंग के नाम पर, अपने फायदे के लिए चैनल प्रबंधन रोज गाज गिरा रहा है, न्यूज़ चैनल्स में छंटनी का दौर दो साल से यथावत जारी है. बड़ा सवाल ये भी है कि नई पीढ़ी जो इस लाइन में आना चाहती है वो दो राहे पर खड़ी हो गयी है.
बरहाल खबरों में खबरे दब गयी है, दर्शक निराश है और हैरान भी कि किस तरह के बुलेटिन ऊसके सामने दिखाए जा रहे हैं जिनका कोई सर पैर नहीं है. लेकिन उसके हाथ में कुछ नहीं है. लेकिन अब दर्शक का दम घुट रहा है और धीरे-धीरे भड़ास निकलना शुरू हो गई है.
लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं और एनडीटीवी से जुड़े हुए हैं.