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क्या बीइए, एनबीए इसकी भर्त्सना करते हुए प्रेस रिलीज जारी करेंगे?

Vineet Kumar : अगर जन्म के पूर्व लिंग परीक्षण कानूनी अपराध है तो जी न्यूज की अल्का सक्सेना आखिर क्यों इतनी बेशर्मी से ये लाइन बार-बार दोहरा रही थी कि- सबको चाहिए कान्हा? क्या उस क्लिनिक पर तत्काल कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए और जी न्यूज से जवाब-सवाल तलब नहीं किए जाने चाहिए कि एक क्लिनिक और उसके डॉक्टर खुलेआम सजेरियन के जरिए निर्धारित समय से पूर्व डिलिवरी करा रहे हैं तो आपने इसे महिमामंडित करने के बजाय इस पर निगेटिव स्टोरी क्यों नहीं चलायी? 
 
Vineet Kumar : अगर जन्म के पूर्व लिंग परीक्षण कानूनी अपराध है तो जी न्यूज की अल्का सक्सेना आखिर क्यों इतनी बेशर्मी से ये लाइन बार-बार दोहरा रही थी कि- सबको चाहिए कान्हा? क्या उस क्लिनिक पर तत्काल कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए और जी न्यूज से जवाब-सवाल तलब नहीं किए जाने चाहिए कि एक क्लिनिक और उसके डॉक्टर खुलेआम सजेरियन के जरिए निर्धारित समय से पूर्व डिलिवरी करा रहे हैं तो आपने इसे महिमामंडित करने के बजाय इस पर निगेटिव स्टोरी क्यों नहीं चलायी? 
 
आपने यहां के डॉक्टरों से एक बार भी ये क्यों नहीं पूछा कि इन्हें कैसे पता कि कान्हा यानी लड़का ही होगा? इसका मतलब है कि इन्होंने पहले ही अल्ट्रसाउंड कराकर ये पता लगा लिया कि लड़का होगा..ये बात एक नेशनल चैनल से ग्लैमराइज करके हाइप क्रिएट करना किस हद तक सही है? मीडिया की नैतिकता और सामाजिक दायित्व पर अजगर जितनी लंबी-लंबी चर्चाएं करनेवाले हमारे मंहत इस पर कुछ बोलेंगे ? क्या बीइए, एनबीए इसकी भर्त्सना करते हुए प्रेस रिलीज जारी करेंगे या फिर इतनी बड़ी घोर अमानवीय और गैरकानूनी कदम पर यूं ही पर्दा डालकर चुप्प मार जाएंगे?
Vineet Kumar : अल्का सक्सेना जैसी सालों से टेलीविजन के लिए काम करती रही मीडियाकर्मी को अगर सजेरियन के जरिए निर्धारित समय से पूर्व इसलिए बच्चे को जन्म देने में कुछ भी गलत,अमानवीय और गैरकानूनी नहीं लगता क्योंकि ऐसा होने से कान्हा पैदा होंगे तो क्या आप किसी पाखंड़ी, अंधविश्वासी, और जादू-टोने की दूकान चलानेवाले से उम्मीद करते हैं कि समाज से ये सब खत्म हो जाएगा? 
 
अल्का सक्सेना जैसी पुराने पुराने मीडियाकर्मी को न्यूजरुम में इस तरह की कथा बांचने और इस घोर अमानवीय, गैरकानूनी करतूतों को सत्यनारायण स्वामी की कथा बनाकर,रस ले-लेकर बांचने में भले ही आनंद आता हो लेकिन वो इस बात का अंदाजा नहीं लगा पा रही हैं, कि नए मीडियाकर्मियों के लिए क्या देकर जाएंगी. न्यूजरुम डायवर्सिटी पर बात करते हुए अक्सर कुछ लोग इस बात पर उम्मीद जताते हैं कि अगर इसमें स्त्रियों की संख्या बढ़ती है तो स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता और न्याय का स्तर भी बढ़ेगा लेकिन अगर अल्का सक्सेना जैसे लोग ही हों तो क्या बढ़ सकेगा ? इनलोगों के पास तो पत्रकारिता की एक महान विरासत( हालांकि ऐसा मानने में मेरी असहमति है) लेकिन ये विरासत के नाम पर क्या देंगी, जरा सोचिए( जरा सोचिए पंचलाइन जी न्यूज से साभार)
 
युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.
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