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क्या बड़े व्‍यक्ति के खिलाफ अवमाना याचिका दायर करना अपराध है?

मैंने माह में दो समाचार पत्रों (इंडियन एक्सप्रेस तथा द संडे गार्जियन) में प्रकाशित भारतीय सेना के बिना बताए दिल्ली कूच करने तथा यह खबर केन्द्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा साजिशन छपवाए जाने सम्बंधित अलग-अलग समाचारों के सम्बन्ध में उच्चस्तरीय जांच कराये जाने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में पीआइएल दायर किया गया.

मैंने माह में दो समाचार पत्रों (इंडियन एक्सप्रेस तथा द संडे गार्जियन) में प्रकाशित भारतीय सेना के बिना बताए दिल्ली कूच करने तथा यह खबर केन्द्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा साजिशन छपवाए जाने सम्बंधित अलग-अलग समाचारों के सम्बन्ध में उच्चस्तरीय जांच कराये जाने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में पीआइएल दायर किया गया.

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित समाचार विवादास्पद थी जिसे तत्काल ही प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने पूरी तरह गलत बताया था. इसके बाद द संडे गार्जियन में इससे जुडी एक खबर प्रकाशित हुई जिसमें कहा गया था कि इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर पूर्णतया गलत और भ्रामक थी और इसे सेनाध्यक्ष को बदनाम करते हुए उन्हें हटवाने की सोची समझी साजिश के तहत छपवाई गयी थी. यह कार्य केन्द्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा की गयी थी क्योंकि उनके परिवार के लोग रक्षा सौदे की दलाली में संलिप्त हैं. खबर के मुताबिक़ मंत्री को यह विश्वास था कि इस खबर के कारण सेनाध्यक्ष को उनके पद से हटा दिया जाएगा और उनके परिवार वालों की दलाली का काम सुगम हो जाएगा.

मैंने उच्च न्यायालय से यह प्रार्थना की थी कि ये दोनों मामले बहुत ही गंभीर हैं और अतः इन दोनों मामलों की तुरंत उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की जानी चाहिए. मैंने इसमें प्रमुख सचिव, प्रधान मंत्री कार्यालय को प्रतिवादी बनाया था. मैंने अपनी रिट याचिका में यह कहा था कि चूँकि सेना की कूच से सम्बंधित खबर देश की अखंडता और एकता से सम्बंधित है, अतः यदि उच्च न्यायालय चाहे तो इस जांच की रिपोर्ट को गोपनीय रखे जाने का आदेश दे सकती है. लेकिन यदि यह बात सामने आती है कि सेना के कूच की बात बेबुनियाद थी तो खबर का खंडन करना मात्र पर्याप्त नहीं होगा बल्कि उस अखबार के खिलाफ इस तरह के अतिसंवेदनशील मामले पर झूठी खबर प्रकाशित करने के विषय में कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए. इसी तरह से मैंने यह भी कहा था कि एक केन्द्रीय मंत्री द्वारा रक्षा सौदों में दलाली कर सकने के उद्देश्य से सेनाध्यक्ष को हटाये जाने हेतु खबर प्रकाशित कराने की बात सीधे-सीधे उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है. यदि यह खबर सही है तो उस वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री के विरुद्ध तत्काल कार्यवाही होनी चाहिए और यदि वह खबर गलत है तो सम्बंधित अखबार के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए.

मेरे द्वारा दायर इस पीआइएल संख्या 2685/2012 (एम/बी) में इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में सुनवाई 10 अप्रैल 2012 (मंगलवार) को हुई. हाई कोर्ट में जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस वी के दीक्षित की बेंच ने यह आदेश किया कि प्रिंट और इलेक्टोनिक मीडिया में सेना के मूवमेंट की खबर नहीं आनी चाहिए. कोर्ट ने यह कहा कि वे मीडिया की स्वतंत्रता को रोक नहीं रहे हैं और यह भी देख रहे हैं कि पूर्व में ही सेना की मूवमेंट को ले कर तमाम खबरें मीडिया में आ चुकी हैं, अतः अब यह आवश्यक हो गया है कि इस तरह से सेना के मूवमेंट की खबरों पर रोक लगे. कोर्ट ने यह कहा कि सेना की टुकडियों के मूवमेंट का मामला अत्यंत संवेदनशील और गोपनीय होता है. अतः इसे अधिक चर्चा में ला कर देश की सुरक्षा और सेना की गोपनीयता के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता.

कोर्ट ने सचिव, गृह मंत्रालय एवं सचिव, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार एवं प्रमुख सचिव (गृह), उत्तर प्रदेश को इस आदेश का तत्काल ही अनुपालन कराने का आदेश दिया. इसके लिए इस आदेश की प्रति अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल तथा मुख्य स्थायी अधिवक्ता को दिये जाने के भी आदेश दिये गए. इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस आदेश पर भारत की प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्केडेय काटजू द्वारा इस फैसले को गलत बताते हुए इस को बहुत जल्द सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही गयी. इस पर मैंने इस फैसले के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट में एक कैविएट दायर कर दिया ताकि मुझे सुने जाने का अवसर मिले. मुझे सुप्रीम कोर्ट में दायर स्पेशल लीव पेटिशन संख्या 9411/ 2012 प्राप्त हुआ. इस एसएलपी को पढ़ने के बाद यह मालूम हुआ कि हाई कोर्ट के 10 अप्रैल 2012 के आदेश के अनुपालन में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव खुर्शीद अहमद गनई ने 11 अप्रैल 2012 को प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया की सचिव विभा भार्गव को पत्र लिख कर इस आदेश का अनुपालन कर सूचित किये जाने को कहा था.

हाई कोर्ट का आदेश उन्हें सही लगे या गलत लेकिन यदि यह आदेश प्रेस काउन्सिल को दिया गया तो उनका एकमात्र कर्तव्य था इसका पालन करना. पर इस आदेश का अनुपालन करने के स्थान पर मार्कंडेय काटजू, अध्यक्ष, प्रेस काउन्सिल ने 12 अप्रैल 2012 को अपना स्वयं का एक आदेश पारित कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट का यह आदेश सही नहीं है और वे इसके विरुद्ध एसएलपी में सुप्रीम कोर्ट जायेंगे. इस आधार पर प्रेस काउन्सिल ने उस आदेश का अनुपालन नहीं किया. यह स्पष्टतया कोर्ट की अवमानना जान पड़ती थी. यदि प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया को हाई कोर्ट के आदेश पर कोई आपत्ति थी तो उसे इस सम्बन्ध में स्पेशल रिट पेटिशन दायर करने का तो पूरा अधिकार था पर एक अनुपालन संस्था के रूप में हाई कोर्ट के निर्णय को गलत बताते हुए उसका अनुपालन करने से मना करने का अधिकार उन्हें कदापि नहीं था. मोत्तुर हाजी अब्दुल रहमान तथा कंपनी बनाम डिप्टी कॉमर्शियल टैक्स अफसर वनियमबड़ी, नोर्थ आर्कोट एआईआर 1969 मद्रास 232 में यह बार स्पष्ट तौर पर अंकित है. जाहिर है यदि सारी अनुपालक संस्थाएं इसी प्रकार से बर्ताव करने लगेंगी तो पूरी न्यायिक प्रक्रिया ही छिन्न-भिन्न हो जायेगी.

इस आधार पर मैंने मार्कंडेय काटजू और विभा भार्गव पर अवमानना की प्रक्रिया चलाने हेतु प्रार्थना की. अवमानना याचिका संख्या 1097 of 2012 में 16 मई 2012 को जस्टिस देवेन्द्र कुमार अरोरा की बेंच ने मूल रिट याचिका में जिन लोगों को आदेश निर्गत किया गया था उन लोगों को प्रतिवादी जाने का अवसर देते हुए पुनः याचिका दायर करने का अधिकार प्रदान कर दिया. मैंने इस पर पुनः सिविल अवमानना याचिका संख्या 1170/2012 बनाम यूके वर्मा, सचिव, सूचना और प्रसारण, मार्कंडेय काटजू, अध्यक्ष, प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया एवं अन्य दायर किया. इसमें 22 मई 2012 को मुझे कहा गया कि मैं ऐसे उद्धरण प्रस्तुत करूँ जिसमे इस आदेश की वास्तव में अवहेलना की गयी है. मुझे केस प्रस्तुत करने हेतु 24 घंटों का समय दिया गया. मैंने अगली तारीख को 26 अप्रैल को प्रकाशित ऐसी चार खबरों का भी हवाला दे दिया जिसमें सेना मूवमेंट की खबरें छपी थीं और इस प्रकार न्यायालय के आदेश की अवहेलना हुई थी. लेकिन इसके बाद भी अगले दिन अवमाननाकर्ता के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करते हुए उलटे खुली अदालत में अपने आदेश में मुझ पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया.

अब सवाल यह है कि कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट 1971, जिसके तहत अवमानना की कार्यवाही कर दंड निर्धारित किया जाता है, में कहीं पर भी याची या सूचनाकर्ता के ऊपर किसी भी दंडात्मक कार्यवाही का प्रावधान नहीं है. धारा 12 में अवमानना करने वाले पर भी जो दंड निर्धारित है वह मात्र अधिकतम 2000 रुपये का है. ऐसे में सूचना देने वाले पर एक लाख का दंड निर्धारित करना विधि के दृष्टि से एक अत्यंत विचारणीय प्रश्न है. इसी प्रकार धारा 23 के अंतर्गत बनाये गए इलाहाबाद हाई कोर्ट नियमावली 1952 के चैप्टर XXXIV ई में नियम 1 से 14 में कहीं पर भी सूचनाकर्ता पर जुर्माना लगाने का प्रावधान नहीं है. नियम 11 में तो यहाँ तक कहा गया है कि सूचनाकर्ता का कार्य सूचना देने के साथ ही समाप्त हो जाता है और उसे कोर्ट में तभी उपस्थित होना है यदि कोर्ट इस हेतु आदेशित करे.

इस प्रकार विधिक दृष्टि से मैं जुर्माने के इस आदेश से कदापि सहमत नहीं दिख पड़ती हूँ और निश्चित रूप से इस आदेश के पारित होने के बाद इसके विरुद्ध अपील करुँगी क्योंकि अव्वल तो मेरा यह दृढ मत है कि जिस प्रकार से मार्कंडेय काटजू ने प्रेस काउन्सिल के अध्यक्ष के रूप में हाई कोर्ट के आदेश को गलत ठहराते हुए उसका पालन नहीं किया वह स्पष्टतया कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट है और दूसरे यदि हाई कोर्ट को यह कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट नहीं लगता तब भी बिना किसी विधिक प्रावधान के सूचनाकर्ता को ही दण्डित करना अपने आप में एक गंभीर विचारणीय प्रश्न जान पड़ता है. यह भी दृष्टव्य है कि पहली बार इस कंटेम्प्ट याचिका दायर करने पर वह तकनीकी आधार पर खारिज किया गया था.

डॉ. नूतन ठाकुर

नेशनल आरटीआई फोरम की कन्वेनर

लखनऊ

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