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क्योंकि आम आदमी पार्टी उतनी भी आम नहीं

Mitra Ranjan : ये सही बात है कि ''आप'' ने दिल्ली में कांग्रेस-बीजेपी के खिलाफ एक नया मोर्चा खोला है और यथास्थितिवाद के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश का बड़ा फायदा उसको जरूर मिला है. लेकिन जैसा कि कुछ विद्वान् लोग कह रहे हैं, क्या उसके खाते में जो तथाकथित जनअसंतोष की लहर है उसको एक सही राजनीतिक दिशा दे दी जाये तो भारतीय राजनीति का मौजूदा स्वरुप बदलने में और फासीवादी शक्तियों के उभार को रोकने में मदद मिल जायेगी? यहाँ सवाल महज स्थापित सत्ता-ध्रुवों के खिलाफ 'आप' के समर्थन-विरोध का नहीं है, सवाल देश की व्यवस्था में बुनियादी बदलाव का है.

Mitra Ranjan : ये सही बात है कि ''आप'' ने दिल्ली में कांग्रेस-बीजेपी के खिलाफ एक नया मोर्चा खोला है और यथास्थितिवाद के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश का बड़ा फायदा उसको जरूर मिला है. लेकिन जैसा कि कुछ विद्वान् लोग कह रहे हैं, क्या उसके खाते में जो तथाकथित जनअसंतोष की लहर है उसको एक सही राजनीतिक दिशा दे दी जाये तो भारतीय राजनीति का मौजूदा स्वरुप बदलने में और फासीवादी शक्तियों के उभार को रोकने में मदद मिल जायेगी? यहाँ सवाल महज स्थापित सत्ता-ध्रुवों के खिलाफ 'आप' के समर्थन-विरोध का नहीं है, सवाल देश की व्यवस्था में बुनियादी बदलाव का है.

हो सकता है अपने कुशल चुनावी प्रबंधन, जनता के एक हिस्से के आदर्शवादी रुझान और फौरी बदलाव की आकांक्षाओं की लहरों के सहारे 'आप' मौजूदा सत्ता संरचना में कुछ सेंध लगाने में सफल हो जाये, पर क्या वो वाकई सामाजिक-राजनितिक बदलाव की ताकत बन सकती है ? क्या कोरे रूमानी आदर्श के सपनों के अलावे उसकी कोई ठोस विचारधारा है? क्या उसने बदलाव के लिए आवशयक कोई जमीनी संघर्ष किया है? क्या ये कुछ अजीब नहीं कि आप के समर्थकों में से ऐसे लोगों की तादाद काफी है जो मोदी को पीएम देखना चाहते हैं? तो क्या ऐसे लोग वाकई देश और समाज को बदलते देखना चाहते हैं?

और अगर ये बदलाव है तो उसकी दिशा क्या होगी?मेरा साफ़ तौर पर मानना है कि आप के अधिकांश समर्थकों में मध्य वर्ग का वो हिस्सा है जो अपने वर्गीय /जातीय /आर्थिक हितों को सुरक्षित रखते हुए ही कोई बदलाव चाहता है उसकी कीमत पर नहीं। ये कुछ ऐसा ही है जैसे बिना वर्गीय/जातीय ढांचे पर चोट पहुंचाए दलितों /वंचितों /आदिवासियों /शोषितों के लिए सामाजिक न्याय और समता की बात करना।

"आप" की अहम् जीत के बावजूद मेरे लिए ये मान पाना मुश्किल है कि वो वाकई किसी महतवपूर्ण सामाजिक-आर्थिक बदलावों की वाहक बनेगी या फिर भारतीय राजनीती में कुछ क्रांतिकारी परिवर्तनों की पटकथा लिखेगी क्योंकि आम आदमी पार्टी उतनी भी आम नहीं। इस परिघटना को सरल तरीके से देखने के बजाय वस्तुगत आधारों पर उसका गहन विश्लेषण करना जरूरी है. खासकर वामपंथ के लिए. और उन वामपंथियों के लिए तो और भी जो ''आप '' की जीत से मुग्ध होकर उसको आम जनता की जीत बताने पर तुल गए हैं.और यहाँ तक कि देश के तमाम दबे-कुचले हाशिये के लोगों की आवाज बनने की जिम्मेदारी से बचते हुए इसी में खुद की जीत देखने लगे हैं…

युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मित्र रंजन के फेसबुक वॉल से.

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