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क्यों ऊब रहे हैं युवा सोशल साइटों से… दो पत्रकारों के विचार

: इनका नकलीपन खुल गया है : पत्रकार अमित कुश के विचार : एसोचैम के एक सर्वे में कहा गया है कि युवाओं को सोशल नेटवर्किंग साइटों से ऊब होने लगी है। सर्वे में शामिल 55 फीसदी युवाओं का कहना था कि उन्होंने जानबूझकर इन पर लॉग-इन करने का समय कम कर दिया है, जबकि 30 फीसदी युवाओं ने अपना अकाउंट ही डिएक्टिवेट कर दिया है। ये नौजवान किसी छोटे नगर-कस्बों के नहीं, बल्कि दिल्ली और लखनऊ जैसे महानगरों के हैं। अक्सर बड़े शहरों में ही तकनीक से जुड़े फैशन सबसे पहले और तेजी से फैलते हैं।

: इनका नकलीपन खुल गया है : पत्रकार अमित कुश के विचार : एसोचैम के एक सर्वे में कहा गया है कि युवाओं को सोशल नेटवर्किंग साइटों से ऊब होने लगी है। सर्वे में शामिल 55 फीसदी युवाओं का कहना था कि उन्होंने जानबूझकर इन पर लॉग-इन करने का समय कम कर दिया है, जबकि 30 फीसदी युवाओं ने अपना अकाउंट ही डिएक्टिवेट कर दिया है। ये नौजवान किसी छोटे नगर-कस्बों के नहीं, बल्कि दिल्ली और लखनऊ जैसे महानगरों के हैं। अक्सर बड़े शहरों में ही तकनीक से जुड़े फैशन सबसे पहले और तेजी से फैलते हैं।

ऐसे में इस बदलाव को एक आश्चर्य की तरह देखा जा रहा है। यह कहना सही नहीं होगा कि किसी तकनीकी जटिलता के कारण युवा इन साइट्स से दूर हुए हैं। आजकल के युवा तो खूब टेक-सेवी हैं। असल में यह बदलाव इन साइट्स पर बनने वाली दोस्ती के नकलीपन के उजागर होने के कारण हुआ है। ऐसी वेबसाइटों के जरिए होने वाली दोस्ती में चूंकि कोई आत्मीयता नहीं होती, इसलिए वह टिकाऊ भी नहीं होती है। इन पर तो हर खूबसूरत तस्वीर वाले अकाउंट को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने और एक्सेप्ट करने की होड़ लगी रहती है। यहां दोस्ती व्यवहार के बजाय तस्वीरें देखकर की जाती है।

ऐसी दोस्ती टाइम पास की तरह होती है। लिहाजा इसका हश्र भी किसी टाइम पास चीज की ही तरह होता है। जब युवा किसी जरूरी चीज में व्यस्त हो जाते हैं, जैसे नौकरी करने लगते हैं या किसी कंपीटीशन की तैयारी करने लगते हैं, तो टाइम पास साइट्स से किनारा कर लेते हैं। युवाओं को सोशल मीडिया में एक्टिव रहने के दौरान चिड़चिड़ेपन, डिप्रेशन, अनिद्रा और बेचैनी की शिकायत भी हुई। इनसे बचने के लिए उन्हें इंटरनेट की दोस्ती से दूर रह कर सामाजिक संपर्क बढ़ाने को कहा जाता है। जो ऐसा करते हैं वे एक्चुअल की अहमियत और वर्चुअल की खामियां समझ जाते हैं।


: अभी तो इनका दायरा और बढ़ेगा : भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के विचार : एसोचैम के सर्वे का नतीजा सचाई का एक पहलू है। आप इसका दूसरा पहलू देखेंगे तो इससे भी ज्यादा आश्चर्य सामने आएंगे। अभी तो हमारे देश के युवाओं का बहुत बड़ा हिस्सा सोशल नेटवर्किंग साइटों पर आया ही नहीं है। फिलहाल तो यह सिर्फ महानगर के पढ़े-लिखे युवाओं तक सीमित है। जरा सोचिए कि जब इनसे छोटे शहरों, कस्बों और गांवों का नौजवान जुड़ेगा तो क्या होगा। इसमें ज्यादा देर नहीं है। ये जो आकाश टैबलेट और 3जी जैसी क्रांति अपने देश में हो रही है, उसके असर से सोशल नेटवर्किंग का दायरा और बढ़ जाएगा। जब गांव-देहात के युवा को लगेगा कि वह इन वेबसाइटों के जरिए देश-विदेश में बैठे रिश्तेदारों और दोस्तों का हाल कुछ ही क्षणों में जान सकता है, तो वह इन्हें अपनाने में कोई देर नहीं लगाएगा।

वह इसके फायदे जान लेगा तो फेसबुक या ट्विटर से जुड़ने में उसे एक अलग ही आनंद आने लगेगा। जहां तक महानगरीय युवाओं में इन्हें लेकर पैदा हुई ऊब का सवाल है तो यह तो मनुष्य का स्वभाव है कि वह हर नई चीज से कुछ ही अरसे में ऊब जाता है। इस पर महानगरों में जो तनाव और काम का दबाव लोगों पर है, उसमें ऐसी ऊब कुछ जल्दी पैदा हो जाती है। ऐसे में लोग सिर्फ सोशल साइटों से ही नहीं ऊबते, अपनी पत्नी से ऊब जाते हैं, अपनी नौकरी से भी उनका मोहभंग हो जाता है।

मुद्दा ऐसी साइटों के उपयोगी पहलू की तरफ ध्यान देने का है। यदि लोग इन पर फेक अकाउंट बनाकर नकली रिश्ते बनाते हैं तो उनकी पोल खुलने पर घरों में झगड़े शुरू हो जाते हैं। कुछ दफ्तरों में इनके इस्तेमाल पर इसीलिए रोक लगाई गई है क्योंकि लोग अपने काम पर कम और फेसबुक आदि पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। अच्छा हो कि लोग तकनीक की एक अच्छी देन के उपयोगी इस्तेमाल के बारे में सोचें। और जब वे ऐसा करेंगे तो उन्हें कोई ऊब नहीं होगी।

साभार : नवभारत टाइम्स

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