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क्‍या कर रहे हैं आई नेस्‍क्‍ट, गोरखपुर के ”संपादक्‍स”?

क्‍या कर रहे हैं आई नेक्‍स्‍ट, गोरखपुर के ''संपादक्‍स'', यह अखबार लगातार गलतियां करते जा रहा है, पर इस पर किसी का ध्‍यान नहीं है. अखबार ने हिंदी के रंगरूट शब्‍द को रंगरूट्स बना दिया, अगर अंग्रेजी का शब्‍दी हिंदी में रिक्रूट्स लिख देते तो कुछ चला जाता क्‍या? संपादकीय को अब जरूर ध्‍यान देना चाहिए कि कम से कम भाषा को तो कचरा बनाकर न पेश करें. इस खबर में हर जगह रंगरूट्स का प्रयोग हुआ है.

क्‍या कर रहे हैं आई नेक्‍स्‍ट, गोरखपुर के ''संपादक्‍स'', यह अखबार लगातार गलतियां करते जा रहा है, पर इस पर किसी का ध्‍यान नहीं है. अखबार ने हिंदी के रंगरूट शब्‍द को रंगरूट्स बना दिया, अगर अंग्रेजी का शब्‍दी हिंदी में रिक्रूट्स लिख देते तो कुछ चला जाता क्‍या? संपादकीय को अब जरूर ध्‍यान देना चाहिए कि कम से कम भाषा को तो कचरा बनाकर न पेश करें. इस खबर में हर जगह रंगरूट्स का प्रयोग हुआ है.

भाषा के मिश्रण का प्रयोग सही कहा जा सकता है, किन्‍तु शब्‍दों को इस तरह से तोड़-मरोड़ कर पेश करना, क्‍या आपको नहीं लगता कि यह गलत परिपाटी की शुरुआत कर रहे हैं. इस अखबार में लगातार भाषाई गलतियां अखबार की विश्‍वसनीयता पर संदेह पैदा कर रही है. रंगरूट्स के बाद फिर गलती हुई. अब तो आई नेस्‍क्‍ट से बिल्‍कुल केयरफुल रहना पड़ेगा. अखबार केयरफुल की स्‍पेलिंग 'carefull' लिख रहा है. इसी तरह अखबार Interior Decorator की जगह Interior Decorater लिखा है.

एक खबर का शीर्षक 'दिल-विल, प्‍यार-व्‍यार मैं क्‍या जानू रे' लिखा गया है, जबकि इसमें पहला संज्ञा के तौर पर और दूसरा क्रिया के रूप में प्रयोग हुआ है, यहां पर सही शब्‍द 'जानूं' होना चाहिए था, पर अखबार के ''संपादक्‍स'' पता नहीं क्‍या करते रहते हैं कि अपने युवा पत्रकारों को कुछ सिखाते ही नहीं हैं. यही स्थिति रही तो इस अखबार का ही नहीं बल्कि पत्रकारिता पर से भी लोगों की विश्‍वसनीयता उठा जाएगी.

गोरखपुर से एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

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