जिया उल हक हत्याकांड में जब तक ये स्पष्ट नहीं हो जाता कि उत्तर प्रदेश में आखिर हुआ क्या है, तब तक किसी भी तरह की सीबीआई जांच बेमानी ही है। कानून व्यवस्था की धज्जियाँ किसने उड़ाई, किसने इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम दिया, किसने इतने बड़े पुलिस अधिकारी को यूँ सरेआम दौड़ा दौड़ा कर मार दिया, क्यों इस दौरान प्रशासन और सरकार सोती रही? इन सवालों को छोड़कर सीबीआई को तो सबसे पहले इसी काम पर लगाया जाना चाहिए कि आखिर सच में हुआ क्या है? तभी जाकर इस प्रदेश का कुछ भला हो पायेगा।
सच जानना इसलिए भी लाजिमी है क्योंकि हत्याकांड के बाद से ही इन दिनों फेसबुक भी ऐन उसी तर्ज पर बंटा नज़र आ रहा है, जैसे कि तथाकथित समाजवादी राजनीति के चलते उत्तर प्रदेश का समाज। एक तरफ तो बहुत ऐसे मुस्लिम भाई लोग हैं, जो इसे कानून व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाने वाले डीएसपी हत्याकांड की बजाय इस प्रदेश में अल्पसंख्यक होने की सजा के तौर पर प्रचारित कर रहे हैं। तो दूसरी तरफ हैं क्षत्रिय और सामंती दंभ भरने वाले ठाकुर बिरादरी के ढेर सारे लोग, जिन्हें जांच होने से पहले ही रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया महज इसलिए निर्दोष नजर आ रहे हैं, क्योंकि वो उत्तर प्रदेश की राजनीति में लुप्तप्राय हो चुकी क्षत्रिय आन-बान-शान के प्रतीक हैं।
इसी तरह एक और तबका है, अपने यादव कुल बंधुओं का, जिन्हें इस सारे काण्ड में न जिया उल हक से सहानुभूति है और न ही रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया से, बल्कि उनकी सारी हमदर्दी और तर्क केवल यादव कुल की तथाकथित समाजवादी सरकार की अंधभक्ति में ही उड़ेले जाते नज़र आ रहे हैं। जाहिर है, ऐसे माहौल में हिन्दू राष्ट्र के पैरोकार भाई भी भला कहाँ चूकने वाले हैं, उन्होंने भी फेसबुक में ही रघुराज प्रताप सिंह को प्रदेश में हिंदुत्व के नए मसीहा के रूप प्रचारित करने की संघ मार्का शाखा लगानी शुरू कर दी।
ऐसे में क्या कोई ये बता पायेगा कि आखिर सच में हुआ क्या है??? क्या इस प्रदेश में अल्पसंख्यक होना गुनाह है या क्षत्रिय आन-बान-शान पर सचमुच हमला किया जा रहा है? या फिर कुछ हुआ ही नहीं है क्योंकि यादव कुल की तथाकथित समाजवादी सरकार ने प्रदेश की व्यवस्था एकदम चाक चौबंद कर रखी है। या यूँ मान लें कि इस हत्याकांड के बहाने प्रदेश को हिंदुत्व का एक नया मसीहा मिल गया है?
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव दिल्ली और लखनऊ के 10 वर्ष के अपने पत्रकारिता करियर के दौरान नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान और बिज़नस स्टैण्डर्ड जैसे कई मीडिया संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। लेख इनके फेसबुक से लिया गया है।






