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क्‍या राणा यशवंत को रजनीश कुमार से सीख नहीं लेनी चाहिए?

खबर है कि महुआ न्यूज लाइंन बंद हो गया है। एक और चैनल जो हुआ है मैनजमेंट के कोप का शिकार। महुआ से पहले सीएनईबी चैनल भी बंद हो चुका है। तकरीबन 300 से ज्यादा कर्मचारी अब तक सड़कों की खाक छान रहे हैं। लगातार बंद हो रहे चैनल कई सवालों को खड़ा करता है। बड़े बड़े उद्योग घराने बड़े ही ताम झाम के साथ चैनल खोलते हैं। मैनजमेंट को लगता है कि चैनल के खुलते ही ही उनके बिजनेस में चार चांद लग जाएगा और समाजिक रूतबा अगल से। लेकिन उन्हे ये सफलता चंद दिनों में ही चाहिए होती है। 

खबर है कि महुआ न्यूज लाइंन बंद हो गया है। एक और चैनल जो हुआ है मैनजमेंट के कोप का शिकार। महुआ से पहले सीएनईबी चैनल भी बंद हो चुका है। तकरीबन 300 से ज्यादा कर्मचारी अब तक सड़कों की खाक छान रहे हैं। लगातार बंद हो रहे चैनल कई सवालों को खड़ा करता है। बड़े बड़े उद्योग घराने बड़े ही ताम झाम के साथ चैनल खोलते हैं। मैनजमेंट को लगता है कि चैनल के खुलते ही ही उनके बिजनेस में चार चांद लग जाएगा और समाजिक रूतबा अगल से। लेकिन उन्हे ये सफलता चंद दिनों में ही चाहिए होती है। 

जब उनका ये भ्रम टूटता है तो गाज गिराए जाते हैं चैनल में काम करे कर्मचारियों पर। ये वो कर्मचारी होते हैं जो पत्रकार कहे जाते हैं। समाज के ऐसे लोग जिन्हें इस बात का गुमान है कि वे समाज को बदलने का दम रखते हैं। लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है। चैनल के मालिकाना कहर के सामने ये सभी बौने हैं। सरकार बदलने की माद्दा रखने वालों पर जब खुद गाज गिरती है तो इन्हें सहारा नसीब नहीं होता। सरकार तो छोडिए इन्हें अपनों का सहारा भी नसीब नहीं है।
 
समाज में बड़े बड़े पत्रकार हैं। समाज और सरकार को बदलने का दम रखते हैं। लेकिन जब बात अपने जमात की आती है तब ये कहीं गुम नजर आते हैं। आखिर इन्हें इसकी फिक्र हो भी क्यूं। इन्हें इसका क्या सरोकार। ये बड़े बड़े उद्योगघराने के विरोध में आखिर खड़े क्यूं दिखें। लेकिन सभी बड़े पत्रकारों और एडिटरों को इस सांचे में नहीं ढाला जा सकता है। कई एडिटर हैं जो अपने कर्मचारियों के लिए हदें तक पार कर जाते हैं। कुछ एडिटर तो ऐसे हैं जो अपने पत्रकार के हित में खुद की नौकरी तक की परवाह नहीं करते। 
 
महुआ के बंद होने पर राणा यशवंत जी का ये बयान कि वे न्यूज मैन हैं और अपने कर्मचारियों के साथ खड़े रहेंगे चौंकाने वाली है। अब कर्मचारियों का साथ देकर कौन अपने भविष्य को दांव पर लगाता है। छोटे पत्रकार तो छोटे हैं। उन्हे कभी मैनजमेंट के मार का शिकार होना पड़ता है तो कभी अपने वरिष्ठों के कोप-भाजन। आज के दौर में कौन किसके लिए लड़ता दिखाई देता है।
 
राणा यशवंत जी को सीईनईबी के वरिष्ठ, अनुभवी, कद्दावर एडिटर इन चीफ रजनीश कुमार से सीख लेनी चाहिए। सीईनईबी बंद हो गया लेकिन उनके मुंह से ऊफ तक नहीं निकला। आखिर वे मैनजमेंट से बैर कैसे लेते। रजनीश कुमार मीडिया के काफी अनुभवी पत्रकार हैं। स्टार न्यूज, सहारा, आईबीएन जैसे चैनलों में इन्होंने काम किया है। अनुभव कुट कुट कर भरा हुआ है। पिछले साल मई-जुन में सीईनईबी में इनका पदार्पण हुआ। चैनल उस वक्त ठीक ठाक कर रहा था। लेकिन उनके आते ही चैनल ने कई बुलंदियों को पार कर गया। जहां पहले लोग इस चैनल को देखा करते थे। उन्हें ये चैनल नागवार गुजरने लगा। दिनों दिन अपनी काबिलियत से चैनल को इन्होंने इस मुकाम तक पहुंचा दिया कि मैनजमेंट को चैनल बंद करने की नौबत आ गई। ये इनके प्रतिभा का ही कमाल था। 
 
इनकी प्रतिभा यहीं खत्म नहीं हो जाती। जब मैनेजमेंट ने चैनल को बंद करने का एलान कर दिया। तब ये अपने कर्मचारियों के साथ खड़े ना होकर मैनजमेंट के साथ खड़े होने का फैसला किया। रजनीश कुमार आज के पत्रकार है, अनुभवी है। उन्हें इस बात का बखुबी पता है कि कर्मचारियों और छोटे पत्रकारों के साथ खड़े होने से आखिर क्या नसीब होने वाला। कर्मचारियों के साथ खड़े होते तो वे भी आज सड़क पर होते। नौकरी के लिए उन्हें भी जद्दोजहद झेलनी पड़ती। लेकिन वे समझदार हैं सो वे मैनजमेंट के दुलारू रहने में अपने फायदा देखा। उनके इंटेलीजेंस को देखिए आज उनकी मौज है। मैनजमेंट के आज काफी करीबी हैं और एचबीएन में उनकी खुब कट कट रही है। राणा यशवंत जी को वाकई इनसे सीख लेनी चाहिए। छोटे कर्मचारियों और पत्रकारों का साथ देकर उन्हें आखिर क्या हासिल होने वाला है। ये तो पत्रकार हैं जिन्हे कदम कदम पर मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।
 
लेखक अनूप गुप्ता पत्रकार हैं तथा सीएनईबी से जुड़े रहे हैं. 
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